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महाआपदा के इस दौर में भी भूखों के मुँह से नेवाला छीन लेने पर उतारू है झारखंड की नौकरशाही

राँची। पूरी दुनिया कोरोना से जंग लड़ रही है, भारत भी इससे अछूता नहीं है। पूरे देश में 3 मई तक लॉकडाउन है। देश के करोड़ों गरीब-मजदूर रोजगार और भूख को लेकर भयभीत हैं। एक तरफ सरकार किसी को भूख से नहीं मरने देगी, की घोषणा पर घोषणा कर रही है। वहीं दूसरी ओर देश की नौकरशाही इस आपदा की घड़ी में भी अपनी संवेदनहीनता दिखाने से बाज नहीं आ रही है। खासकर आपूर्ति विभाग अपनी तिजोरी भरने की मशक्कत में भूखों के निवाले पर कुण्डली जमाये बैठा है। देश के कई राज्यों से गरीब-मजदूरों के भूख से बिलबिलाने की खबरें सुर्खियों में हैं। ऐसे में सवाल खड़ा होता है कि इस कोरोना के खौफनाक संकट में आम गरीब, भूख की समस्या से परेशान लोग अपनी फरियाद लेकर किसके पास जाएं?

24 ज़िलों के 260 प्रखंडों वाले आदिवासी बहुल झारखंड में अनाज को नीचे तक पहुँचाने के लिए पूरी व्यवस्था की गयी है। इसके 168 प्रखण्डों में खाद्य विभाग, सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामले तथा झारखण्ड सरकार के संयुक्त दिशा-निर्देशों के अनुसार प्रखण्ड स्तर पर अधिकारियों की नियुक्ति की गई है। और इन अधिकारियों को राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत गठित स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से लोगों को अनाज वितरित करने की ज़िम्मेदारी सौंपी गयी है। डाकिया योजना के तौर पर जानी जाने वाली इस स्कीम में एक परिवार को 35 किलो के खाद्यान्न का पैकेट मिलना है। और इसकी निचले स्तर पर जवाबदेही प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी की होगी।

मगर आलम यह है कि निजी डीलरों (जन-वितरण प्रणाली दुकानदार) की तरह ही  सरकारी डीलर प्रखण्ड आपूर्ति पदाधिकारी को न तो सरकार के आदेश की चिंता है और न ही अपने उच्चाधिकारियों का खौफ, इन्हें चिंता है तो बस इस आपदा का लाभ येन-केन प्रकारेण लाभ उठाने की।

आपको बता दें कि पलामू जिले के डाल्टनगंज सदर प्रखंड अंतर्गत सुआ पंचायत के बिन्हुआ टोला में करीब 35 आदिम जनजाति से जुड़ा परहिया परिवार रहता है। जो पहले से ही अत्यन्त गरीबी की हालत में जिन्दगी गुजार रहा है। अब इस कोरोना महामारी के संकट और इसके मद्देनजर होने वाले लॉकडाउन से इनकी हालत और खराब हो गई है।

इस टोले के परहिया परिवारों को एमओ द्वारा अप्रैल एवं मई 2020 का खाद्यान्न मुहैया कराया जाना था, लेकिन लाभुकों को सिर्फ एक माह का राशन दिया गया है, जबकि उनके कार्ड में जून 2020 तक राशन की मात्रा दर्ज कर दी गई है। इसकी जानकारी वहां के लोगों कों तब हुई, जब झारखंड नरेगा वाच के राज्य संयोजक जेम्स हेरेंज ने अपनी टीम के साथ वहां जाकर यह जानने की कोशिश की कि उन्हें सरकारी सुविधा का लाभ मिल रहा है या नहीं? वैसे भी यहां के इस परहिया समुदाय के लोगों में साक्षरों की संख्या तकरीबन नगण्य है। उनको जब कार्ड में दर्ज मात्रा की जानकारी मिली तो सभी बेहद आक्रोशित हो गए। लेकिन इस संकट की घड़ी में ये लोग इस डर से शिकायत दर्ज कराने से पीछे हट गए, क्योंकि उन्हें इस बात का डर सताने लगा है कि कहीं उनको जो कुछ खाने के लिए मिल रहा है, वह भी न बंद हो जाए।

टीम द्वारा जब एक-एक कार्ड की जांच की गई, तो राशन चोरी के कई अन्य मामले भी सामने आए। यहां दो ऐसे आदिम जनजाति परिवार मिले जिनके नाम से दो-दो राशन कार्ड बने हैं, जबकि इन्हें एक कार्ड से खाद्यान्न दिया जा रहा है। मनोहर बैगा, पिता गिरवर बैगा के नाम से 2 राशन कार्ड बनाया गया है जिसका नंबर 202005051112 व 202005574268 है। जबकि लाभुक को एक कार्ड से खाद्यान्न दिया जा रहा है। ऑनलाइन रिकॉर्ड के अनुसार दूसरे कार्ड से प्रत्येक माह राशन का उठाव किया जा रहा है। इसी प्रकार कार्ड संख्या – 202005574126 है, यह अन्छू परहिया के नाम से दर्ज है। लेकिन इसकी हक़ीक़त यह है कि अन्छू बहुत पहले ही हो मर चुका है। इस मामले का सबसे भ्रष्टतम और शर्मनाक पहलू यह है कि उसके नाम से भी हर माह 35 किलो का राशन उठाया जा रहा है।

दूसरी तरफ बसन्ती कुंवर जिनकी कार्ड संख्या- 20200557426863 है, को कार्ड रहने के बावजूद अप्रैल 2018 के बाद से खाद्यान्न वितरित नहीं किया गया है, जबकि उनके कार्ड में भी ऑनलाइन रिकॉर्ड बताता है कि उन्हें नियमित राशन वितरित किया गया है।

जब डाल्टनगंज सदर प्रखंड के प्रखंड आपूर्ति पदाधिकारी से इन आदिम जनजातियों के अनाज वितरण में गड़बड़ी के मामले के बारे में पूछा गया तो उनका कहना था कि आदिम जनजाति को डाकिया योजना के तहत मिलने वाले अनाज के लिए कोई दुकानदार नियुक्त नहीं है। इसे प्रखण्ड आपूर्ति पदाधिकारी ही देखते हैं। मतलब कि वे खुद इसे देखते हैं।

परहिया परिवार।

जब एक परिवार के दो-दो राशन कार्ड के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि मेरे संज्ञान में नहीं है, मैं मामले को देखता हूं और उसकी जांच करता हूं।

राशन लाभुकों के घर तक पहुंचाने के सवाल पर उनका एक और बयान काफी गैरजिम्मेदाराना था। जिसमें उन्होंने कहा कि राशन लाभुकों के घर तक पहुंचाने का काम स्वयंसेवक उपेन्द्र करते हैं। अगर कोई गड़बड़ी हो रही है तो वही कर रहे होंगे।

अब आते हैं गुमला जिले के ग्राम नरेकेला पर। ग्राम नरेकेला से 35- 40 किलोमीटर दूर टोलोंग्सेरा गांव। नरेकेला के ललित साहू का राशन कार्ड संख्या 202006623478 टोलोंग्सेरा गांव के राशन डीलर रामावतार साहू के पास था। मतलब कि ललित साहू को अपना पीडीएस का राशन लेने के लिए जाना पड़ता था 35-40 किलोमीटर दूर टोलोंग्सेरा गांव। जिसके कारण उसका पूरा दिन राशन लाने में लग जाता था। 35-40 किलोमीटर के सफर में किराया खर्च के अलावा ललित की दैनिक मजदूरी भी मारी जाती थी। आज उसका वह राशन कार्ड भी रद्द हो गया है।

दरअसल जिला आपूर्ति पदाधिकारी कार्यालय में बैठे कम्प्यूटर ऑपरेटर ने नरेकेला में रहने वाले ललित साहू के कार्ड संख्या 202006623478 को उनके घर से 35 – 40 किलोमीटर दूर टोलोंग्सेरा गांव के राशन डीलर रामावतार साहू के साथ टैग कर दिया था। लाभुक उक्त डीलर से बात करके हरेक दो महीने पर एक बार राशन लेने जाता था। दो महीने का 30 किलो राशन लेने के लिए उसे दिनभर की मजदूरी भी गंवानी पड़ती थी। साथ ही इसके लिए वह बसिया सिमडेगा रोड में पुटरी टोली तक बस से जाता और फिर वहां से तोलोंग्सेरा गांव 15 किलोमीटर अपनी साइकिल से जाकर राशन लेकर वापस आता।

ललित साहू अपनी परेशानी बताते हुए।

पुन: बस से बसिया तक आकर अपने घर आता था। पिछले वर्ष मई जून का राशन लेने वह नहीं जा सका था। क्योंकि वह गंभीर रूप से बीमार हो गया था। जब वह जुलाई में राशन लेने गया तो मशीन में अंगूठा मिलान नहीं होने के कारण डीलर ने उसे राशन नहीं दिया। डीलर रामावतार ने शंका जाहिर करते हुए बताया था कि शायद उसका कार्ड उसके ही गांव को हस्तांतरित हो गया हो। डीलर के यह कहने पर उसने बसिया एमओ को आवेदन दिया। आज जब लॉकडाउन में उसके परिवार में खाद्य संकट गहरा गया है, उसका परिवार भूखों मरने के कगार पर है, तब जाँच करने पर पता चला कि उसका कार्ड रद्द हो गया है। आज उसके पास न कोई रोजगार है और न ही कोई सरकारी राहत सामग्री उस तक पहुंची है। उसके परिवार में कुल 6 सदस्य हैं, जिसमें पत्नी और चार छोटे बच्चे शामिल हैं। आज उसे जब ज़रूरत है तो कोई सरकारी मदद नहीं मिल पा रही है।

बताते चलें कि गढ़वा जिला मुख्यालय से करीब 55 किमी दूर और भण्डरिया प्रखण्ड मुख्यालय से करीब 30 किमी उत्तर पूर्व घने जंगलों के बीच बसा है 700 की आबादी वाला आदिवासी बहुल कुरून गांव। इसी गांव की 70 वर्षीय सोमारिया देवी की पिछली 2 अप्रैल, 2020 को भूख से मौत हो गई थी।

(राँची से वरिष्ठ पत्रकार विशद कुमार की रिपोर्ट।)

This post was last modified on April 24, 2020 9:19 pm

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