हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज एसएन शुक्ला समेत तीन के खिलाफ सीबीआई केस, आय से अधिक संपत्ति का मामला

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इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ के सेवानिवृत्त न्यायाधीश जस्टिस श्रीनारायण शुक्ला जुलाई 2020 में रिटायर हुए थे। इस पूर्व जज के खिलाफ भ्रष्टाचार का यह दूसरा मामला है। इससे पहले सीबीआई ने 4 दिसंबर 2019 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश श्रीनारायण शुक्ला और अन्य के खिलाफ भ्रष्टाचार का केस दर्ज किया था। उन पर लखनऊ स्थित एक मेडिकल कॉलेज के पक्ष में पैसे लेकर आदेश देने का केस दर्ज किया गया था।

आय से अधिक संपत्ति मामले में श्रीनारायण शुक्ला और उनके परिजनों के खिलाफ सीबीआई ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धाराओं में केस दर्ज किया है। नई दिल्ली स्थित सीबीआई मुख्यालय की एंटी करप्शन यूनिट-टू शाखा ने श्रीनारायण शुक्ला के अलावा उनकी दूसरी पत्नी शुचिता तिवारी और पहली पत्नी केश कुमारी के भाई साईदीन तिवारी को नामजद किया है।

सीबीआई ने करीब तीन वर्ष पूर्व भी श्रीनारायण शुक्ला के खिलाफ केस दर्ज किया था। साथ ही, श्रीनारायण शुक्ला के साथ शुचिता तिवारी और साईदीन तिवारी के ठिकानों पर छापा मारकर कई अहम सुबूत एकत्र किए थे। इसकी जांच के दौरान उनके परिजनों के नाम आय से अधिक संपत्तियां होने के प्रमाण मिलने के बाद एक और नया केस दर्ज किया गया है।

दरअसल, जांच में पता चला कि शुचिता तिवारी वर्ष 2014-15 में जब श्रीनारायण शुक्ला के संपर्क में आई थीं तो उनके पास कोई चल-अचल संपत्ति नहीं थी।

सीबीआई के छापे में लखनऊ के सुशांत गोल्फ सिटी स्थित आवास से उनके और श्रीनारायण शुक्ला के नाम से 18 लाख रुपये की एफडीआर मिली थी। सीबीआई के मुताबिक यह रकम श्रीनारायण शुक्ला ने अवैध तरीके से अर्जित धन से कमाई थी। वहीं अमेठी के शिवशक्ति धाम ट्रस्ट से श्रीनारायण शुक्ला को शुचिता तिवारी के खर्चों के लिए धनराशि भेजने क प्रमाण मिले हैं।

श्रीनारायण शुक्ला के मोबाइल की छानबीन के बाद आशंका जताई जा रही है कि उन्होंने शुचिता तिवारी और साईदीन तिवारी के साथ मिलकर कई संपत्तियों में भी निवेश किया है। जांच में लखनऊ के हुसैनगंज स्थित स्टेट ऑफ इंडिया की शाखा से दस लाख भेजने के प्रमाण भी मिले हैं जिससे शुचिता तिवारी के नाम से फ्लैट खरीदा गया। शुचिता तिवारी की बेटी के स्कूल के आईकार्ड में पिता का नाम एसएन शुक्ला लिखा पाया गया।

जांच में सामने आया कि शुचिता तिवारी ने अपने पहले पति से हर्जाना पाने के लिए अदालत में दायर याचिका में अपनी आमदनी महज 40 हजार रुपये घोषित की थी। इससे साबित होता है कि इतनी संपत्तियां अर्जित करने की उनकी हैसियत नहीं थी। सीबीआई की जांच में शुचिता तिवारी की अप्रैल, 2014 से दिसंबर 2019 के बीच करीब 1.87 करोड़ रुपये की चल-अचल संपत्ति अर्जित करने के प्रमाण मिले है।

हाईकोर्ट के सेवानिवृत्त न्यायाधीश श्रीनारायण शुक्ला के संपर्क में आने के बाद शुचिता तिवारी को करोड़पति बनने में वक्त ही नहीं लगा। सीबीआई जांच में पता चला कि अप्रैल 2014 से दिसंबर 2019 के बीच शुचिता तिवारी ने लखनऊ और फैजाबाद में 14 संपत्तियां खरीदीं, जिनकी कुल कीमत 1.87 करोड़ रुपये है। इनमें लखनऊ के सुशांत गोल्फ सिटी में फ्लैट, दुकान, फैजाबाद में एलआईजी मकान और कई कृषि भूमि शामिल हैं।

शुचिता तिवारी के बैंक खातों में 55.16 लाख रुपये जमा मिले। सीबीआई छापे में उनके फ्लैट से सात लाख रुपये के आभूषण, 30 लाख कीमत की दो गाड़ियां और करीब पांच लाख रुपये कीमत का घरेलू सामान पाया गया।

जांच में सामने आया कि शुचिता तिवारी फैजाबाद के अद्भुत इंडिया एकेडमिक फाउंडेशन ट्रस्ट और फैजाबाद के एंजेल ग्रुप ऑफ एजूकेशन ट्रेनिंग समाजसेवी संस्थान से बतौर डिप्टी रजिस्ट्रार तनख्वाह भी मिलती थी। दोनों संस्थानों के श्रीनारायण शुक्ला के साथ संबंधों की पड़ताल की जा रही है।

श्रीनारायण शुक्ला की पहली पत्नी के भाई साईदीन तिवारी के नाम 2014 से पहले महज तीन संपत्तियां होने का पता चला। ये संपत्तियां लखनऊ के सुशांत गोल्फ सिटी और मोहनलालगंज इलाके में हैं, जिनकी कीमत करीब 58 लाख रुपये है। साईदीन तिवारी, उनकी पत्नी और बच्चों के बैंक खातों में करीब 1.57 लाख रुपये पाए गये।

जब सीबीआई ने अप्रैल, 2014 से दिसंबर 2019 की अवधि के बीच साईदीन तिवारी की चल-अचल संपत्तियों की पड़ताल की तो इस दौरान लखनऊ में करीब 90 लाख रुपये कीमत की चार और संपत्तियां खरीदने का पता चला। साईदीन और उनके परिजनों के बैंक खातों में 8.13 लाख रुपये जमा मिले। जब सीबीआई ने साईदीन तिवारी की आमदनी का पता लगाया तो सामने आया कि 2015-16 से 2020-21 की अवधि में उनकी कुल आय 19.26 लाख रुपये ही थी।

श्रीनारायण शुक्ला की 2014 में कुल 75.93 लाख रुपये की चल-अचल संपत्ति थी। वहीं दिसंबर, 2019 में उनके पास कुल 1.32 करोड़ रुपये की चल-अचल संपत्ति होने के प्रमाण मिले। सीबीआई ने जब तीनों आरोपियों की कुल आमदनी और व्यय का परीक्षण किया तो पता चला कि उन्होंने अपनी आमदनी से 165 प्रतिशत अधिक चल-अचल संपत्तियों में निवेश किया।

यूपी के एक निजी मेडिकल कॉलेज की तरफदारी कर संस्थान के हक में फैसला देने के मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट के रिटायर जज श्रीनारायण शुक्ला पर सीबीआई का शिकंजा पहले से कसा हुआ है। बता दें कि प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज को केंद्र ने मई 2017 में मानदंड पूरे न करने की वजह से छात्रों को दाखिला देने से रोक दिया था।

जस्टिस शुक्ला पर आरोप है कि उन्होंने कॉलेज को फायदा पहुंचाया। 2017-18 बैच के छात्रों के प्रवेश की डेडलाइन गलत तरीके से बढ़ाई जो सुप्रीम कोर्ट के आदेश और मौजूदा नियमों का स्पष्ट उल्लंघन है। सीबीआई जांच में उन्हें कथित तौर पर अनियमितता और प्राइवेट मेडिकल कॉलेज को अनुचित फायदा पहुंचाने का दोषी पाया गया था।

जस्टिस शुक्ला पर केस दर्ज करने के लिए सीबीआई ने सीजेआई को एक चिट्ठी लिखी थी। एजेंसी ने अपनी चिट्ठी में बताया था कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व सीजेआई दीपक मिश्रा की सलाह पर उसने जस्टिस शुक्ला के खिलाफ एक जांच बिठाई थी। एजेंसी के मुताबिक, जस्टिस शुक्ला की अनियमितताओं का मामला तत्कालीन सीजेआई दीपक मिश्रा के संज्ञान में लाया गया था।

ये चिट्ठी मिलने के बाद तत्कालीन सीजेआई रंजन गोगोई ने सीबीआई को जस्टिस शुक्ला के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की अनुमति दी थी। जस्टिस गोगोई ने जनवरी, 2018 से ही उनकी न्यायिक सेवाओं पर रोक लगाने का आदेश दिया था।

गोगोई ने पीएम नरेंद्र मोदी से ये सिफारिश भी की थी कि जस्टिस शुक्ला को उनके पद से हटा दिया जाए। हालांकि, पहले भी ऐसी घटनाएं हुईं हैं जब जजों पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे और सरकारों को उन्हें महाभियोग के जरिए हटाने की सिफारिशें की गई लेकिन किसी जज को हटाया नहीं गया।

दरअसल, भारत में जुलाई, 1991 तक सुप्रीम और हाईकोर्ट के जजों पर मुकदमा चलाने की अनुमति नहीं थी। लेकिन इसके बाद 25 जुलाई, 1991 को सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के एक मामले की सुनवाई के दौरान एक ऐतिहासिक फैसले में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जजों पर भी केस दर्ज करने का आदेश दिया था।

सीबीआई के मुताबिक उच्च न्यायालय में सेवानिवृत्त न्यायाधीश के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा चलाने की अनुमति के लिए आवेदन किया था।सीबीआई ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ के न्यायमूर्ति शुक्ला के अलावा छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश आईएम कुद्दूसी, प्रसाद शिक्षा न्यास के भगवान प्रसाद यादव और पलाश यादव, स्वयं ट्रस्ट और निजी व्यक्तियों भावना पांडे और सुधीर गिरी को नामजद किया है।

आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता (आपराधिक साजिश) की धारा 120बी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत आरोप लगाए गए हैं।

अधिकारियों के अनुसार, ट्रस्ट ने कथित तौर पर प्राथमिकी में नामित एक आरोपी को एक अनुकूल आदेश प्राप्त करने के लिए अवैध रूप से रिश्वत दी। उनके मुताबिक, सीबीआई ने एफआईआर दर्ज करने के बाद लखनऊ, मेरठ और दिल्ली में कई जगहों पर तलाशी ली।

अधिकारियों के अनुसार, प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज को मई 2017 में केंद्र द्वारा 46 अन्य मेडिकल कॉलेजों के साथ-साथ घटिया सुविधाओं और आवश्यक मानदंडों को पूरा करने में विफलता के कारण छात्रों को प्रवेश देने से रोक दिया गया था।

केंद्रीय जांच एजेंसी ने प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) दर्ज करने के बाद दिसंबर 2019 में शुक्ला के आवास पर छापा मारा, जब वह न्यायाधीश की कुर्सी पर मौजूद थे। उन पर ओडिशा उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश आईएम कुद्दूसी, भगवान प्रसाद यादव और प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट के पलाश यादव, भावना पांडे और एक अन्य कथित बिचौलिया सुधीर गिरी के साथ आपराधिक साजिश, भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम की धाराएं, जो रिश्वत स्वीकार करने से संबंधित हैं, और आपराधिक कदाचार के तहत मामला दर्ज किया गया था।

आरोप है कि शुक्ला और कुद्दूसी, जिन्हें सीबीआई ने सितंबर 2017 में गिरफ्तार किया था, ने मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा अपने कॉलेज के डिबारमेंट से संबंधित मामले में राहत देने का वादा करते हुए प्रसाद एजुकेशन ट्रस्ट से रिश्वत लेने की साजिश रची थी। सीबीआई ने जस्टिस कुद्दूसी को जुलाई 2019 में चार्जशीट दी थी। वह फिलहाल जमानत पर बाहर हैं। सितंबर 2017 में ही, केंद्रीय एजेंसी ने शुक्ला के खिलाफ एक प्रारंभिक जांच (पीई) शुरू की।

भारत के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा ने न्यायिक कदाचार का आरोप लगाते हुए उत्तर प्रदेश के तत्कालीन महाधिवक्ता राघवेंद्र सिंह की शिकायत पर शुक्ला के खिलाफ जांच का आदेश दिया। तत्कालीन मद्रास उच्च न्यायालय की मुख्य न्यायाधीश इंदिरा बनर्जी, तत्कालीन सिक्किम उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश एसके अग्निहोत्री और मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश पीके जायसवाल की तीन सदस्यीय समिति ने शुक्ला को जनवरी 2018 में न्यायिक अनियमितताओं का दोषी पाया जिसके बाद राष्ट्रपति से महाभियोग की सिफारिश की गई थी।

शुक्ला , जो उस समय इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच में सिटिंग जज थे, को कोर्ट परिसर में प्रवेश करने से रोक दिया गया और उनसे सभी न्यायिक और प्रशासनिक कार्य छीन लिए गए थे। बाद में, जुलाई 2019 में, तत्कालीन चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने सीबीआई को मामला दर्ज करने की अनुमति दी।

सीबीआई का आरोप है कि प्रसाद इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज को मई 2017 में एमसीआई द्वारा शैक्षणिक वर्ष 2017-18 और 2018-19 के लिए छात्रों को प्रवेश देने से वंचित कर दिया गया था, क्योंकि 46 अन्य मेडिकल कॉलेजों के साथ-साथ समान आधार पर घटिया सुविधाओं और आवश्यक मानदंडों को पूरा नहीं करने के कारण भी प्रतिबंधित कर दिया गया था। इस फैसले को प्रसाद इंस्टीट्यूट ने शीर्ष अदालत में एक रिट याचिका के जरिए चुनौती दी थी। बाद में, एक साजिश रची गई और अदालत की अनुमति से रिट याचिका को वापस ले लिया गया।

दरअसल मेडिकल प्रवेश घोटाले के नाम से जाने जाने वाले इस पूरे मामले की एसआईटी जांच की मांग करने वाली एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में आई, जिसकी सुनवाई 9 नवंबर, 2017 को जस्टिस एस अब्दुल नजीर और जस्टिस जे चेलामेश्वर की पीठ ने की। पीठ ने इसे गंभीर माना और इसे पांच वरिष्ठतम जजों की पीठ में रेफर कर दिया।

इस पीठ में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा को भी रखा गया और सुनवाई के लिए 13 नवंबर 2017 की तारीख तय की गई। इसी तरह के एक और मामले का जिक्र कैंपेन फॉर ज्यूडिशियल अकाउंटेबिलिटी एंड रिफॉर्म (सीजेएआर) नाम की संस्था ने भी 8 नवंबर 2017 को जस्टिस चेलामेश्वर की अगुवाई वाली पीठ के सामने रखा था। उस मामले में पीठ ने 10 नवंबर को सुनवाई की तारीख तय की थी।

10 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में हुए एक हाई वोल्टेज ड्रामे के बाद मुख्य न्यायाधीश की पीठ ने जस्टिस चेलामेश्वर की अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा 9 नवंबर को दिए गए उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें अदालत को रिश्वत देने के आरोपों में एसआईटी जांच की मांग वाली दो याचिकाओं को संविधान पीठ को रेफर किया गया था।

इस पूरी बहस के दौरान वकील प्रशांत भूषण और चीफ जस्टिस के बीच तीखी नोक झोंक हुई थी, जिसमें कहा गया था कि किसी भी रिपोर्ट या एफआईआर में किसी जज का नाम नहीं है।

(जे.पी.सिंह वरिष्ठ पत्रकार व कानूनी मामलों के जानकार हैं)

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