Saturday, October 16, 2021

Add News

प्रतिनियुक्ति से आए अक्षम और अप्रशिक्षित अफसरों की जांच एजेंसी है सीबीआईः मद्रास हाईकोर्ट

ज़रूर पढ़े

पहले गौहाटी हाई कोर्ट ने सीबीआई को कानूनन जारज यानि अवैध घोषित कर दिया था और अब मद्रास हाई कोर्ट ने सीबीआई को अक्षम और अप्रशिक्षित जांच एजेंसी घोषित करके सीबीआई में प्रतिनियुक्तियों पर सवाल खड़ा कर दिया है। जस्टिस एन किरुबाकरन और बी पुगलेंधी की खंडपीठ ने कहा है कि सीबीआई प्रतिनियुक्तियों पर भरोसा नहीं कर सकती है, क्योंकि जब सीबीआई गंभीर सफेदपोश अपराधों की जांच कर रही है, तो राज्य पुलिस/ सीआईएसएफ/सीआरपीएफ के प्रतिनियुक्त अधिकारियों पर इन मामलों को संभालने के लिए निर्भर नहीं रहा जा सकता, क्योंकि ऐसे मामलों की जांच के लिए ये उचित रूप से प्रशिक्षित नहीं होते।

देश की प्रमुख एजेंसी केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) की साख पर लगातार सवाल खड़े होते रहे हैं। अभी तक का रिकार्ड तो यही दर्शाता है कि हर हाई प्रोफाइल केस में सीबीआई सजा दिलाने में विफल हो जाती है। इससे यह वाजिब सवाल उठता है कि क्या वास्तव में राजनीतक दृष्टि से संवेदनशील मामलों की जांच की जिम्मेदारी मिलते ही तमाम आधुनिक तकनीक और संसाधनों से सुसज्जित इस एजेंसी के हाथ-पांव फूल जाते हैं। सवाल यह भी है कि राजनीतिक दृष्टि से संवेदनशील मामलों में सीबीआई आरोपियों को सजा दिलाने में क्यों नहीं कामयाब होती है? अब यही सवाल मद्रास हाई कोर्ट ने उठाया है।

मद्रास हाई कोर्ट ने कहा है कि आखिर क्यों सीबीआई द्वारा जांच किए गए कई मामलों में दोष साबित नहीं हो पाता और आरोपी बरी हो जाते हैं? मदुरै खंडपीठ के जस्टिस एन किरुबाकरन और जस्टिस बी पुगलेंधी की खंडपीठ सीबीआई द्वारा भर्ती के लिए अपनाए गए तरीकों की जानकारी मांगते हुए चिंता व्यक्त की कि कई मामलों को केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) को सौंप दिया जाता है, जिसमें अदालत में आरोप सिद्ध नहीं हो पाता और आरोपी के बरी होने से मामला समाप्त हो जाता है।

अपने आदेश में जस्टिस एन किरुबाकरन और बी पुगलेंधी की खंडपीठ ने टिप्पणी की कि सीबीआई के मामलों में बरी होने के कारणों का पता नहीं है। हालांकि यह पता नहीं है कि क्या सीबीआई स्वतंत्र रूप से अपने अधिकारियों की भर्ती कर रही है या यह अन्य बलों से आए अधिकारियों पर निर्भर है।

इस पृष्ठभूमि में, न्यायालय ने कहा कि सीबीआई प्रतिनियुक्तियों पर भरोसा नहीं कर सकती है, क्योंकि जब सीबीआई गंभीर सफेदपोश अपराधों की जांच कर रही है, तो राज्य पुलिस/सीआईएसएफ/ सीआरपीएफ के प्रतिनियुक्त अधिकारियों पर इन मामलों को संभालने के लिए निर्भर नहीं रहा जा सकता, क्योंकि ऐसे मामलों की जांच के लिए ये उचित रूप से प्रशिक्षित नहीं होते।

खंडपीठ ने कहा कि सीबीआई द्वारा विशेष रूप से प्रशिक्षित अधिकारियों को एक भर्ती प्रक्रिया के माध्यम से भर्ती किया जाना चाहिए, ताकि एक प्रमुख जांच एजेंसी के रूप में इसका नाम रह सके। खंडपीठ ने कहा कि सफेदपोश अपराधों, विशेष रूप से बैंक-संबंधी या वित्तीय अपराधों की जांच के लिए, सीबीआई अधिकारियों को एसीएस, आईसीडब्ल्यूए या सीए प्रशिक्षण जैसी प्रासंगिक योग्यताएं होनी चाहिए। अन्यथा, जांच का उद्देश्य पराजित होगा।

खंडपीठ ने कहा कि सीबीआई का मतलब है कि इसकी एक अलग भर्ती होनी चाहिए, वे अपराध जांच में विशेषज्ञ होने चाहिए। प्रतिनियुक्ति पर्याप्त नहीं है। यही कारण है कि सीबीआई को सौंपे गए सभी महत्वपूर्ण मामले बरी हो जाते हैं। सीआरपीएफ और सीआईएसएफ से प्रतिनियुक्ति पर सीबीआई निर्भर न हो। जांच में इन दोनों एजेंसियों के पास क्या विशेषज्ञता है? यही कारण है कि सीबीआई द्वारा जांच किए गए अधिकांश मामलों में आरोपी बरी हो जाते हैं। उनके पास जांच कौशल की कमी है। वे प्रशिक्षित नहीं हैं।

जस्टिस किरुबाकरन ने कहा कि सीबीआई मामलों में बरी दर और दोष सिद्धि दर देखें! अधिकारियों की भर्ती का स्रोत क्या है? आप सीधी भर्ती क्यों नहीं करते? एक व्यक्ति जो सीआरपीएफ और सीआईएसएफ में सेवारत है, वे जांच में कैसे सहायक हो सकते हैं? वे आपकी मदद यानि जांच में मदद कैसे कर सकते हैं?

खंडपीठ ने केंद्र से जवाब मांगा है कि क्या सीबीआई अधिकारियों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए?, क्योंकि गंभीर मामलों में सीबीआई जांच के लिए हमेशा एक ग्लैमर होता है। खंडपीठ ने कहा कि चूंकि सीबीआई ने एक प्रमुख जांच एजेंसी की विश्वसनीयता हासिल कर ली है, यदि इसकी कार्यबल शक्ति में वृद्धि की जाए तो यह अधिक मामलों की जांच कर सकती है।

खंडपीठ ने केंद्र से विभिन्न प्रश्नों पर जवाब देने को कहा है, जिसमें पूछा गया है कि क्या सीबीआई अपने कर्मचारियों की भर्ती स्वतंत्र रूप से या किसी एजेंसी के माध्यम से करती है विशेषकर उनकी जांच टीमों के लिए? क्या सीबीआई केवल राज्य पुलिस, सीएसएफ और सीआरपीएफ जैसी एजेंसियों से प्रतिनियुक्त पुलिस अधिकारियों पर निर्भर है? सीबीआई का कार्यबल क्या है, खासकर इसकी जांच टीम? जांच के लिए अधिकारियों की संख्या क्यों नहीं बढ़ाई गई, जबकि अधिक संख्या में मामले सीबीआई को भेजे जा रहे हैं? सीबीआई, आईसीडब्ल्यूए, एसीएफ आदि जैसी योग्यता वाले उम्मीदवार भर्ती क्यों नहीं करती, फिर वह बैंक धोखाधड़ी से जुड़े मामलों से कैसे निपटती  है?

खंडपीठ ने पूछा है कि पिछले 20 वर्षों में कितने मामलों को सीबीआई को भेजा गया है? उन मामलों की स्थिति क्या है? बरी/दोष सिद्धि में कितने मामले समाप्त हुए? सजा की दर क्या है? सीबीआई को धन का आवंटन क्यों नहीं बढ़ाया गया, क्योंकि यह दर्शाया गया है कि सीबीआई के पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। सीबीआई द्वारा जांच पूरा करने में अत्यधिक विलंब के कारण क्या हैं?

खंडपीठ ने इस मामले का संज्ञान इसलिए लिया कि सीबीआई जांच के लिए एक याचिका दायर हुई, जिसका सहायक सॉलिसिटर जनरल ने इस आधार पर विरोध किया था कि एजेंसी के पास हर मामले की जांच करने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। केंद्रीय गृह मंत्रालय को खंडपीठ ने इस मामले में एक पक्ष के रूप में शामिल कर लिया है।

गौरतलब है कि पिछले दिनों पूर्व मुख्य न्यायधीश रंजन गोगोई ने कहा था कि जांच एजेंसी में मानव संसाधन की भारी कमी है। 15 फीसदी पद एक्जीक्यूटिव, तकनीकी स्टॉफ के 28 फीसदी और कानूनी विभाग में 50 प्रतिशत पोस्टें खाली हैं। उन्होंने कहा था कि एजेंसी की कानूनी स्थिति पर शंका, ट्रेनिंग के लिए पर्याप्त निवेश और जवाबदेही का अभाव तथा राजनीतिक दखलंदाजी से एजेंसी बुरी तरह ग्रस्त है। वर्ष 2013 में गुवाहाटी हाई कोर्ट ने सीबीआई को अवैध घोषित कर दिया था। फिलहाल एजेंसी की जांच सुप्रीम कोर्ट के स्टे आदेश के आधार पर जीवित है।

वे हाई प्रोफाइल केस जिनमें सीबीआई विफल हुई है, उनमें बोफोर्स तोप सौदा केस (2005): हाईकोर्ट ने सभी को बरी कर दिया। कुल 65 करोड़ की दलाली की जांच में 250 करोड़ रुपये खर्च कर दिए गए। टू जी स्पेक्ट्रम आवंटन घोटाला (2018): सभी आरोपी बरी, लाखों पन्नों के सबूत बेकार साबित हुए। पूर्व मंत्री ए राजा और टेलिकॉम कम्पनियां एस्सार और लूप बरी, आरुषि-हेमराज हत्याकाण्ड (2017): इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि एजेंसी सबूत जुटाने में बुरी तरह से फेल हुई, तलवार दंपति बरी तथा कर्नाटक का लौह अयस्क खनन घोटाला (2016) मुख्य्मंत्री समेत सभी अभियुक्त बरी, शामिल है। राजीव गांधी हत्याकांड, बड़ी साजिश की जांच में कोई प्रगति नहीं। पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सीबीआई की जांच अंतहीन को सकती है, क्योंकि 1991 से लेकर अब तक कोई प्रगति नहीं की है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

जलवायु सम्मेलन से बड़ी उम्मीदें

जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र का 26 वां सम्मेलन (सीओपी 26) ब्रिटेन के ग्लास्गो नगर में 31 अक्टूबर से...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This

- Advertisement -

Log In

Or with username:

Forgot password?

Forgot password?

Enter your account data and we will send you a link to reset your password.

Your password reset link appears to be invalid or expired.

Log in

Privacy Policy

Add to Collection

No Collections

Here you'll find all collections you've created before.