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बाबा रामदेव के कोरोना की “असत्यापित दवा” पर केन्द्र सरकार ने लगायी रोक

क्या आप जानते हैं की जब कोरोना संक्रमण का भारत सरकार ने आधिकारिक रूप से संज्ञान भी नहीं लिया था तब बाबा रामदेव और उनके सहयोगी आचार्य बालकृष्ण की पतंजलि ने कोरोना की औषधि पर शोध शुरू कर दिया था। यह जनचौक नहीं कह रहा है बल्कि आचार्य बालकृष्ण ने दावा किया है कि पतंजलि अनुसंधान संस्थान में पांच माह तक चले शोध और चूहों पर कई दौर के सफल परीक्षण के बाद दवा तैयार करने में सफलता मिली है। अर्थात पतंजलि अनुसंधान संस्थान ने जनवरी/फरवरी से ही इसपर शोध शुरू कर दिया था। भारत सरकार ने मार्च 20 में कोरोना संक्रमण का आधिकारिक रूप से संज्ञान लिया था।

केंद्रीय आयुष मंत्रालय ने कोविड-19 के उपचार के लिए पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड द्वारा विकसित आयुर्वेदिक की दवाइयों के बारे में आई मीडिया रिपोर्ट पर स्वतःसंज्ञान लिया है। मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि इन कथित वैज्ञानिक अध्ययन के दावों और विवरणों के तथ्य के बारे में उनको जानकारी नहीं है और वह अप्रमाणित हैं। इसलिए उन्होंने कंपनी से कहा है कि वह ऐसे दावों के विज्ञापन पर रोक लगाए। मंत्रालय ने कंपनी से कहा है कि जब तक संबंधित अधिकारियों इस बात का कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है कि यह दवा कोविड-19 के इलाज में कारगर है, न ही स्वास्थ्य मंत्रालय और न ही आईसीएमआर द्वारा इसे स्वीकृत किया गया है। जब तक विधिवत रूप से इन दावों को सत्यापित नहीं कर लिया जाता है,तब तक कंपनी ऐसे दावे करने से परहेज करें।

मंत्रालय ने कंपनी को यह भी सूचित किया है कि आयुर्वेदिक दवाओं सहित दवाओं के ऐसे विज्ञापन को ड्रग्स एंड मैजिक रेमेडीज (अब्जेक्शनबल एडवर्टइज्मेंट) एक्ट, 1954 के प्रावधानों और इसके तहत बनाए गए नियमों के तहत विनियमित किया जाता है। मंत्रालय ने उत्तराखंड सरकार के संबंधित राज्य लाइसेंसिंग प्राधिकरण से भी अनुरोध किया है कि वह COVID 19 का उपचार करने का दावा करते हुए बनाई गई इन आयुर्वेदिक दवाओं के लाइसेंस और उत्पाद अनुमोदन के विवरण उनको उपलब्ध कराएं।

मंत्रालय ने बाबा रामदेव की कंपनी से दवा के बारे में पूरी जानकारी उपलब्ध कराने को कहा है। पूछा है कि उस हॉस्पिटल और साइट के बारे में भी बताएं, जहां इसकी रिसर्च हुई है। मंत्रालय ने बयान में कहा है कि पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड हरिद्वार की ओर से कोविड 19 के उपचार के लिए तैयार दवाओं के बारे मे उसे मीडिया से जानकारी मिली। दवा से जुड़े वैज्ञानिक दावे के अध्ययन और विवरण के बारे में मंत्रालय को कुछ जानकारी नहीं है।

गौरतलब है कि मंत्रालय ने 21 अप्रैल, 2020 को एक गजट अधिसूचना जारी की थी। जिसमें यह बताया गया था कि आयुष के हस्तक्षेप/ दवाओं के साथ कोविड- 19 के संबंध में की जाने वाली रिसर्च स्टडी के लिए क्या-क्या आवश्यकताएं पूरी करनी होंगी और इस तरह की स्टडी को करने के तरीके भी निर्धारित किए गए थे।

हुआ यह कि योगगुरु बाबा रामदेव ने मंगलवार को प्रेस कांफ्रेंस कर पतंजलि द्वारा निर्मित कोरोना वायरस से बचाने वाली आयुर्वेदिक दवा कोरोनिल की खोज के बारे में जानकारी दी तो कुछ ही घंटे बाद अब केंद्र सरकार के आयुष मंत्रालय ने इस पर जांच बैठा दी है। आयुष मंत्रालय ने दवा की जांच होने तक पतंजलि की ओर से तैयार दवा कोरोनिल के विज्ञापन पर रोक लगा दी है।

आयुष मंत्रालय ने कहा कि दावों के सत्यापन के लिए पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड को कोविड 19 के उपचार की दवाओं के नाम और उसके कम्पोजीशन का जल्द से जल्द विवरण उपलब्ध कराने के लिए कहा गया है। खासतौर से उस साइट और हॉस्पिटल के बारे में भी पूछा गया है, जहां इससे जुड़ी रिसर्च हुई। मंत्रालय ने दवा के रिसर्च से जुड़े प्रोटोकॉल, सैंपल साइज, इंस्टीट्यूशनल एथिक्स कमेटी क्लियरेंस, सीटीआरआई रजिस्ट्रेशन और रिसर्च का रिजल्ट डेटा मांगा है।

बालकृष्ण के मुताबिक, कोविड-19 आउटब्रेक शुरू होते ही साइंटिस्ट की एक टीम इसी काम में लग गई थी। पहले स्टिमुलेशन से उन कम्पाकउंड्स को पहचाना गया तो वायरस से लड़ते और शरीर में उसका प्रसार रोकते हैं। बालकृष्ण के अनुसार, सैकड़ों पॉजिटिव मरीजों पर इस दवा की क्लीनिकल केस स्टडी हुई जिसमें 100 प्रतिशत नतीजे मिले। उनका दावा है कि कोरोनिल कोविड-19 मरीजों को 5 से 14 दिन में ठीक कर सकती है।कोरोनिल में गिलोय, अश्वगंधा, तुलसी, श्‍वसारि रस और अणु तेल का मिश्रण है। उनके मुताबिक, यह दवा दिन में दो बार- सुबह और शाम को ली जा सकती है।

बालकृष्ण के अनुसार, अश्व गंधा से कोविड-19 के रिसेप्टर-बाइंडिंग डोमेन को शरीर के ऐंजियोटेंसिन-कन्वसर्टिंग एंजाइम से नहीं मिलने देता। यानी कोरोना इंसानी शरीर की स्व स्य्दवा कोशिकाओं में घुस नहीं पाता। वहीं गिलोय कोरोना संक्रमण को रोकता है। तुलसी कोविड-19 के आरएनए पर अटैक करती है और उसे मल्टीपप्लाई होने से रोकती है। आचार्य बालकृष्ण ने दावा किया कि पतंजलि अनुसंधान संस्थान में पांच माह तक चले शोध और चूहों पर कई दौर के सफल परीक्षण के बाद दवा तैयार करने में सफलता मिली है।

आयुष मंत्रालय आयुर्वेदिक दवा, जड़ी-बूटी इन सब तमाम चीजों पर रिसर्च करती है। कोरोना कोई साधारण बीमारी नहीं है और ये बिल्कुल नया वायरस है। इसकी दवा और वैक्सीन बनाने में देशभर के वैज्ञानिक जुटे हुए हैं। कोरोना महामारी के लिए दवा बनाने के लिए कंपनी को मंत्रालय से अनुमति लेनी होती है। कोई भी कंपनी बाजार में जाकर ये दावा नहीं कर सकती कि ये कोरोना की दवा है। कोई भी नई वैक्सीन या दवा के लिए सरकार कंपनियों को अनुमति देती है। उसके बाद ही वो कंपनी उस दवा को बना सकती है। कोई भी कंपनी बाजार में जाकर ये दावा नहीं कर सकती कि ये कोरोना की दवा है।

भारत में आयुष मंत्रालय के तहत दवाओं के विकास, क्वालिटी चेक, प्री क्लीनिकल प्रयोग और क्लीनिकल रिसर्च का काम कई स्तरों पर किया जाता है। परंपरागत दवाओं के मामले में आयुष के अधीन रिसर्च काउंसिल के अलावा अकादमिक स्तर पर, आईसीएमआर, सीएसआईआर जैसे रिसर्च संस्थाओं के साथ ही ईएमआर ग्रांट के तहत भी रिसर्च सहायता दी जाती है। किसी दवा के ट्रायल के लिए अव्वल तो उन लोगों को छांटना होता है, जिन पर दवा का प्रयोग किया जाना हो। आयुर्वेदिक दवा के मामलों में सिर्फ लक्षणों के आधार पर मरीज़ नहीं छांटे जा सकते। मौसम, वातावरण, मरीज़ों की पूर्व स्वास्थ्य स्थितियां, परहेज़ आदि कई चीज़ों को ध्यान में रखकर प्रयोग में भाग लेने वालों को छांटा जाता है।

दवा के प्रयोग और पार्टिसिपेंट्स के डिटेल्स को सीडीआरआई के साथ साझा कर कोई संस्था अपनी दवा का परीक्षण शुरू कर सकती है। परीक्षण के लिए मंज़ूरी मिलने के लिए दवा के रिफरेंस यानी दवा के फॉर्मूले के स्रोत भी बताना होते हैं। फिर अप्रूवल के बाद तय समय में परीक्षण किए जाते हैं। क्लीनिकल टेस्टिंग में दवा का असर देखा जाता है और सकारात्मक परिणामों के बाद दवा निर्माता ज़रूरी अनुमतियों के बाद दवा बाज़ार में ला सकते हैं। साथ ही, प्रक्रिया का हिस्सा है कि क्लीनिकल टेस्टिंग का डॉक्युमेंट बनाया जाए, उसे स्कॉलर्स के पास भेजकर पुष्ट कराया जाए और फिर उसे प्रकाशित करने के बाद दवा को आधिकारिक मंज़ूरी मिले।

आयुष मंत्रालय ने आयुर्वेदिक पद्धति में क्लीनिकल प्रयोगों के लिए जो विस्तृत गाइडलाइन्स जारी की हैं, उनके मुताबिक क्लीनिकल ट्रायल चार चरणों में होता है। इसके बाद क्लीनिकल स्टडी का काम शुरू होता है यानी ट्रायल के परिणामों को लेकर विस्तार से अध्ययन किया जाता है।

पहले चरण में आयुर्वेदिक दवा का शुरूआती प्रयोग होता है जो सामान्य रूप से गैर थैरेपी प्रक्रिया है। यह अक्सर स्वस्थ लोगों या कुछ खास तरह के प्रतिभागियों पर ही होता है। दूसरे चरण के क्लीनिकल ट्रायल में दवा के असर को देखा जाता है और लक्षण या लक्षणों की रोकथाम के साथ ही इस दवा के साइड इफेक्ट्स को भी समझा जाता है। तीसरे चरण के ट्रायल में दवा के थैरेपी संगत लाभ को समझा जाता है। इसी फेज़ में यह भी तय किया जाता है कि दवा के ट्रायल को भारतीय मरीज़ों के अलावा भी ट्रायल किया जाना है या नहीं।हां तो लाइसेंसिंग अथॉरिटी से मंज़ूरी लेना होती है। आखिरी चरण यानी पोस्ट मार्केटिंग ट्रायल में प्रयोग की गई दवा को दूसरी दवाओं के इस्तेमाल के साथ प्रयोग किया जा सकता है।साथ ही, लाइसेंसिंग अथॉरिटी दवा के ज़्यादा से ज़्यादा फायदे जानने के लिए अन्य प्रयोग भी करवा सकती है

इस दवा के बारे में आइसीएमआर का कहना है कि आयुर्वेदिक दवाओं से जुड़े मामले आयुष मंत्रालय देखता है। जबकि आयुष मंत्रालय का कहना है कि यह आइसीएमआर का दायित्व है। उल्लेखनीय है कि सरकार द्वारा गठित आयुष शोध एवं विभागीय कार्यबल में जैव प्रौद्योगिकी विभाग तथा वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के विशेषज्ञों के अलावा आयुष विशेषज्ञों को भी शामिल किया गया है। मंत्रालय द्वारा 31 मार्च को आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी और होम्योपैथी पद्धति में कोरोना के संभावित इलाज से जुड़े प्रस्तावों को मांगा गया था। बताते हैं कि कार्यबल को अब तक इस प्रकार के दो हजार से अधिक प्रस्ताव मिल चुके हैं और दर्जनों प्रस्तावों को क्लिनिकल परीक्षण की अनुमति दी जा चुकी है।

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This post was last modified on June 24, 2020 2:07 pm

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