विश्व पर्यावरण दिवस: वनाधिकारों को जमीन पर उतारने की मांग को लेकर छत्तीसगढ़ के सैकड़ों गांवों में प्रदर्शन

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प्रदर्शन करते आदिवासी।

रायपुर। विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर आज छत्तीसगढ़ के आदिवासी अधिकार और वनाधिकार पर काम करने वाले संगठन अलग-अलग जिलों और गाँवों में वनाधिकार विशेषकर सामुदायिक अधिकार दिलाने की मांग पर सांकेतिक प्रदर्शन कर रहे हैं। कोरोना संक्रमण काल में सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करते हुए यह प्रदर्शन हो रहा है। 

“वन स्वराज्य आंदोलन” के बैनर तले आयोजित इस कार्यक्रम में पर्यावरण बचाने का संदेश है। आंदोलनकारियों का मानना है कि पर्यावरण तभी बच सकेगा जब ग्राम सभाओं को जंगल बचाने का अधिकार मिलेगा, वन संसाधनों पर उनका नियंत्रण होगा। ज्ञात हो कि छत्तीसगढ़ में वनाधिकार मान्यता कानून के तहत ग्राम सभाओं को अभी तक सामुदायिक अधिकार नहीं मिले हैं जबकि प्रदेश सरकार ने चुनाव पूर्व जन घोषणा पत्र में यह अधिकार देने का वादा किया था। इसके उलट कुछ दिन पूर्व वन विभाग को वनाधिकार मान्यता कानून क्रियान्वयन का नोडल विभाग बना दिया गया था, जिसे संगठनों के विरोध के बाद वापस लिया गया।  

वन-अधिकारों व आदिवासी अधिकारों में संलग्न सभी संगठनों की ओर से छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को लिखी चट्ठी में कहा गया है कि वन अधिकार कानून, 2006 एक महत्वपूर्ण जनवादी कानून है जो इस देश के आदिवासी एवं अन्य वन निर्भर समुदायों के साथ हुए “ऐतिहासिक अन्याय” को सुधारने तथा वन क्षेत्रों में व्यापक भू-सुधार (लैंड रिफार्म)  और लोकतांत्रिक प्रशासनिक व्यवस्था (ग्राम स्वराज) लागू करने के लिए लाया गया था।

छत्तीसगढ़ के 44% वन क्षेत्रों पर प्रदेश के 31% आबादी वाले आदिवासी तथा अन्य वन निर्भर समुदायों की आजीविका, अस्तित्व एवं अस्मिता वनों से जुड़ी हुई है। इसलिए जब छत्तीसगढ़ सरकार वन अधिकार के तहत सामुदायिक वन अधिकारों की मान्यता, विशेषकर ग्रामसभा द्वारा वन का प्रबंधन करने का अधिकार सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्धता की घोषणा करता है तो वह स्वागत योग्य कदम है। 

लेकिन इस महत्वपूर्ण कानून का क्रियान्वयन करने के लिए आदिवासी विभाग की तरफ से समन्वयन तथा समर्पित एवं केंद्रीकृत  प्रशासनिक संरचना ( एकल मुखिया के नेतृत्व द्वारा) की कमी के कारण विशेष प्रगति नहीं हो पायी। पिछले 17 महीने में आदिवासी विभाग का कोई एकल ज़िम्मेदार अधिकारी नेतृत्व में नहीं रहा। जबकि 6 अधिकारी अब तक आए और गए।

यह सर्व विदित है कि ग्राम सभा ही वन अधिकार मान्यता कानून के मुताबिक सच्ची और वाजिब अधिकार-धारक वैधानिक निकाय है। लेकिन, ग्राम सभाओं को सामुदायिक वन अधिकार मानने से पूर्व, सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यह ग्राम सभाएं, वन अधिकार मान्यता कानून और आदिवासी इलाकों में पेसा कानून के अनुसार बनायी जायें, न कि किसी विभाग का हित-साधन करने वाले हितधारक समूह के तौर पर। 

जब तक ग्राम सभा स्वशासन की सशक्त और स्वायत्त एजेंसी नहीं बनती, तब तक वनाधिकार कानून को अक्षरश: पालन नहीं किया जा सकता।

बहुत दिनों के बाद वन अधिकार कानून की मार्गदर्शिका छपी और कुछ अधिकारियों का प्रशिक्षण हुआ, लेकिन इसमें SLMC, DLC, SDLC एवं FRC सदस्यों का प्रशिक्षण नहीं हो पाया।

वर्ष 2012-13 से पूरे प्रदेश में बहुत सारी ग्राम सभाओं के द्वारा प्रक्रियाओं का पालन करते हुए, सामुदायिक वन अधिकार के दावे भरे गए थे जो अब तक लंबित हैं।

कागजों में वर्ष 2012 से ही लघु वनोपज और निस्तार के अधिकार  दिए गए हैं लेकिन जंगल के प्रबंधन के अधिकार को स्वीकार नहीं किया गया है। सामुदायिक अधिकार ठीक से तो नहीं दिया गया और जो भी दिया गया वे संयुक्त वन प्रबंधन समिति के नाम पर दिया गया। सामुदायिक अधिकारों के नाम पर धारा 3(2) के तहत विकास मूलक कार्यों के लिए छोटे-छोटे भूखंडों में वन भूमि डायवर्जन दर्ज की जा रही है।

खदान एवं खनन को सुगम करने के लिए तथा अभयारण्य-राष्ट्रीय उद्यानों से कानून के प्रावधानों के विपरीत आदिवासियों का विस्थापन हो रहा है तथा उन्हें अधिकारों से वंचित किया जा रहा है। इसके साथ ही वन्यजीवों के विचरण स्थल को कब्जा कर  उन्हें नष्ट किया जा रहा है।

वन विभाग द्वारा कानून के विपरीत लोगों के व्यक्तिगत वनों तथा गांव के  सामुदायिक वनों का वनीकरण (कैम्पा) के नाम से कब्जा कर उनकी तार से फेंसिंग की जा रही है।

संगठनों ने मांग किया कि राज्य स्तर पर  कानून के मुताबिक आदिवासी विभाग के  कमिश्नर को वन अधिकार कानून के क्रियान्वयन की केंद्रीकृत एवं एकल ज़िम्मेदारी दे  दी जाए।  

SLMC को गठित कर कार्यक्षम किए जाएं।

3) मार्गदशिका के आधार पर SLMC,DLC, SDLC एवं FRC सदस्यों का प्रशिक्षण कर इस कानून के क्रियान्वयन को रूपायन किया जाए।

वर्ष 2012-13 से भरे गए तथा ग्राम सभा द्वारा पारित सामुदायिक दावे के अविलम्ब अधिकार-पत्र दिए जाने चाहिए। सामुदायिक वन संसाधनों के अधिकार सम्पूर्णता में वन अधिकार मान्यता नियम के परिशिष्ट में दिए उपबंध 3 और 4 के अनुसार ही दिए जाएं।

ग्राम सभा को एक स्वायत्त संस्था के रूप में मान्यता देते हुए और फिर ग्राम सभा द्वारा चुनी गयी वन अधिकार समिति और सामुदायिक वन प्रबंधन समितियों को मान्यता दिया जाना चाहिए।

प्रदेश सरकार, अगर आदिवासियों को वनोपज के बेहतर मूल्य दिलाने और वन संवर्धन कार्यों के लिए निधि उपलब्ध कराना चाहती है। तो लघु वनोपजों पर अधिकार, उस पर ग्राम सभा के स्वामित्व के रूप में होना चाहिए, ताकि समुदाय विक्रय, उपभोग और एकत्रीकरण की सीमा तय कर सके और महाराष्ट्र के तर्ज पर आवश्यकतानुसार नीलामी या रायल्टी पा सके। अभी व्यक्तिगत संग्रहकर्ता के रूप में उन्हें उचित मूल्य ही बमुश्किल मिलता है।

गांव में जो भी निधि किसी विभाग की तरफ से कार्यक्रम के रूप में खर्च होने के लिए प्रस्तावित है, उस सारी राशि को (कैम्पा निधि इत्यादि)  सम्मिलित कर ग्राम सभा को दिया जाए ताकि ग्राम सभा योजना बनाकर खर्च कर सके। यहाँ तक कि मनरेगा  राशि (60:40 मज़दूरी एवं सामान का अनुपात) की नीति को बदलकर उसे ग्राम सभा के निर्णय के ज़रिए खर्चा किया जाए।

 वन भूमि से विस्थापन, या धारित भूमि का अधिग्रहण या पुनर्वास पैकेज प्रस्ताव ग्राम सभा के  मुक्त, संसूचित सहमति के बिना नहीं होना चाहिए। कानून के किसी भी प्रावधान के उल्लंघन पर कड़ी कार्रवाई की जाए।

(बस्तर से जनचौक संवाददाता तामेश्वर सिन्हा की रिपोर्ट।)

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