Thu. Apr 9th, 2020

कस्टडी की लड़ाई में हमेशा बच्चे भुगतते हैं: सुप्रीम कोर्ट

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उच्चतम न्यायालय ने तलाक के एक मामले में सुनवाई के दौरान टिप्पणी की कि कस्टडी की लड़ाई में नुकसान हमेशा बच्चों का होता है और वे इसकी भारी कीमत चुकाते हैं। असली पीड़ित बच्चे होते हैं, जबकि इसमें उनका कोई कसूर नहीं होता। अदालतों को कस्टडी के केस में हमेशा बच्चों के हित को सबसे ऊपर रखना चाहिए।

उच्चतम न्यायालय ने कहा कि बच्चे इस दौरान अपने माता-पिता के प्यार और स्नेह से वंचित रहते हैं, जबकि इसमें उनकी कोई गलती नहीं होती है। उच्चतम न्यायालय ने बच्चों के अधिकारों का सम्मान करने की जरूरत पर जोर देते हुए कहा कि वे अपने माता-पिता दोनों के प्यार और स्नेह के हकदार होते हैं।

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उच्चतम न्यायालय ने कहा कि तलाक से माता-पिता की उनके प्रति जिम्मेदारी खत्म नहीं हो जाती है। जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस अजय रस्तोगी की पीठ ने कहा कि संरक्षण के मामले पर फैसला करते समय अदालतों को बच्चे के सर्वश्रेष्ठ हित को ध्यान में रखना चाहिए, क्योंकि संरक्षण की लड़ाई में वही पीड़ित है। बेंच ने कहा कि अगर मध्यस्थता की प्रक्रिया के माध्यम से वैवाहिक विवाद नहीं सुलझता है तो अदालतों को इसे जितना जल्दी हो सके सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि इसमें लगने वाले हर दिन के लिए बच्चा बड़ी कीमत चुका रहा होता है।

पीठ ने लंबे समय से वैवाहिक विवाद में उलझे एक दंपति के मामले में अपने फैसले में यह टिप्पणियां कीं। बेंच ने कहा, ‘संरक्षण के मामले में इसका कोई मतलब नहीं है कि कौन जीतता है लेकिन हमेशा ही बच्चा नुकसान में रहता है और बच्चे ही इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकाते हैं, क्योंकि जब अदालत अपनी न्यायिक प्रक्रिया के दौरान उनसे कहती है कि वह माता-पिता में से किसके साथ जाना चाहते हैं तो बच्चा टूट चुका होता है।

पीठ ने बच्चे के संरक्षण के मामले का फैसला करते हुए कहा कि बच्चे की भलाई ही पहला और सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा होता है और यदि बच्चे की भलाई के लिए जरूरी हो तो तकनीकी आपत्तियां इसके आड़े नहीं आ सकतीं। पीठ ने कहा, ‘हालांकि, बच्चे की भलाई के बारे में फैसला करते समय माता-पिता में से किसी एक के दृष्टिकोण को ध्यान में नहीं रखना चाहिए। अदालतों को बच्चे के सर्वश्रेष्ठ हित को सबसे ऊपर रखते हुए संरक्षण के मामले में फैसला करना चाहिए, क्योंकि संरक्षण की इस लड़ाई में पीड़ित वही है।

पीठ ने पेश मामले में कहा कि दिल्ली हाई कोर्ट ने पहले बच्चे के सर्वश्रेष्ठ हित को ध्यान में रखते हुए माता-पिता के बीच विवाद सुलझाने का प्रयास किया था, लेकिन अगर पति-पत्नी अलग होने या तलाक के लिए अड़े होते हैं तो बच्चे ही इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकाते हैं और वे ही इसका दंश झेलते हैं। 

पीठ ने कहा कि ऐसे मामले में फैसला होने में विलंब से निश्चित ही व्यक्ति को बड़ा नुकसान होता है और वह अपने उन अधिकारों से वंचित हो जाता है जो संविधान के तहत संरक्षित हैं और जैसे-जैसे दिन गुजरता है तो वैसे ही बच्चा अपने माता-पिता के प्रेम और स्नेह से वंचित होने की कीमत चुका रहा होता है। इसमें उसकी कभी कोई गलती नहीं होती है, लेकिन हमेशा ही वह नुकसान में रहता है।

पीठ ने कहा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने विवाद का सर्वमान्य हल खोजने का प्रयास किया लेकिन माता-पिता का अहंकार आगे आ गया और इसका असर उनके दोनों बच्चों पर पड़ा। बेंच ने पति-पत्नी के बीच छिड़ी तलाक की जंग पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इस दौरान उनके माता-पिता अपने बच्चों के प्रेम और स्नेह से ही वंचित नहीं हुए बल्कि वे अपने पोते-पोतियों के सानिध्य से भी वंचित होकर इस संसार से विदा हो गए। बेंच ने कहा कि बहुत ही थोड़े ऐसे भाग्यशाली होते हैं जिन्हें अपने जीवन के अंतिम क्षणों में जिनके बच्चों को अपने दादा-दादी का सानिध्य मिलता है।

पीठ ने कहा कि सितंबर, 2017 में उसके अंतरिम आदेश में की गई व्यवस्था और बाद के निर्देश जारी रहेंगे। पीठ ने इस अंतरिम आदेश में बताया था कि दशहरा, दिवाली और शरद अवकाश में ये बच्चे किस तरह से अपने माता पिता के साथ रहेंगे। पीठ ने संबंधित पक्षकारों को नाबालिग बच्चे के संरक्षण के लिए अलग से सक्षम अदालत में कार्रवाई शुरू करने की छूट प्रदान की।

पीठ ने कहा कि पति द्वारा संबंधित अदालत में दायर तलाक की याचिका पर 31 दिसंबर, 2020 तक फैसला किया जाए। इस मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने मार्च, 2017 में आदेश दिया था कि बच्चों को बोर्डिंग स्कूल में रखा जाए, क्योंकि उनका अपने माता-पिता में से किसी एक के पास रहना उनके लिए फायदेमंद नहीं है।

गौरतलब है कि तलाक के बढ़ते मामलों के साथ-साथ बच्चों की कस्टडी का सवाल भी गंभीर होता जा रहा है। माना तो यही जाता है कि बच्चे मां के पास ही ज्यादा सुरक्षित रहेंगे पर अब अदालतें इसे अंतिम और इकलौता प्रमाण नहीं मानतीं। आज के दौर में तब स्थितियां और भी गंभीर हो जाती हैं जब तलाकशुदा दंपति में जिसके साथ भी बच्चे रहें उसका पुनर्विवाह हो जाता है। वैसे मां बच्चों का नैसर्गिक लगाव होता है पर तलाक के मामलों में बच्चों को जो भावनात्मक चोट लगती है उससे उनका पूरा जीवन प्रभावित हो जाता है।

भारतीय कानून के अनुसार फिजिकल और लीगल कस्टडी के लिए गार्जियन एंड वार्डस एक्ट 1890, द कस्टडी फॉर द चाइल्ड फॉर हिंदूज और और हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट 1956 के तहत कस्टडी दी जाती है। अदालत का साफ आदेश है कि ‘वेलफेयर ऑफ माइनर टू बी पैरामाउंट कंसीडरेशन’। हर जिला लेवल पर गार्जियन कोर्ट बनी हुई है। 90% याचिकाओं में पिता ने कहा कि उनकी आय पत्नी से ज्यादा है, इसलिए बच्चे उन्हें मिलें।

वहीं 85% याचिकाओं में पत्नी के व्यवहार को लेकर एक जैसी बातें कही गईं। ये सभी याचिकाएं भी लगभग एक जैसी ही थीं। 10 साल तक उम्र के बच्चों की कस्टडी के करीब 98 फीसदी मामलों में मां को ही कस्टडी सौंपी जाती है। करीब दो फीसदी मामलों में ही कस्टडी पिता को मिल पाती है। 10 वर्ष से बड़े बच्चे की मर्जी को भी कोर्ट प्रमुखता देता है। यही कारण है कि पिता कोर्ट में बच्चे की कस्टडी हासिल करने के लिए हर संभव कोशिश करता है।

आमतौर पर लीगल कस्टडी मां को ही दी जाती है, लेकिन अब ज्वाइंट लीगल कस्टडी का ट्रेंड बढ़ा है। अदालतें भी इसे प्रमोट कर रही हैं। अब अदालत बच्चे के फिजिकल और साइकोलॉजिकल डेवलपमेंट में पिता को महत्व दे रही हैं। दस लाख में से किसी एक केस में ही पांच साल से छोटे बच्चे की कस्टडी पिता को दी जाती है, क्योंकि मां नेचुरल गार्जियन है। अब पिता का रोल बच्चों के लालन-पालन में बढ़ा है। इसलिए अदालतें पिता के प्रति कुछ सॉफ्ट हुई हैं। मां के पास बच्चों के रहने पर पिता चाइल्ड और वाइफ मेंटिनेंस देते हैं।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं। वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

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