Sat. Dec 14th, 2019

विश्वसनीयता खोती जा रही है कॉलेजियम प्रणाली

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सुप्रीम कोर्ट। साभार-गूगल।

उच्चतम न्यायालय और देश के उच्च न्यायालयों  में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा स्वयं बनाई गयी कॉलेजियम प्रणाली अपारदर्शिता ,पक्षपात , भाई भतीजावाद और राजनीतिक पूर्वाग्रहों के कारण लगातार अपनी विश्वसनीयता खोती जा रही है ,जिस पर न्यायपालिका के अंदर से भी आवाजें उठनी शुरू हो गयी हैं। स्थिति की गंभीरता का अंदाजा सिर्फ एक तथ्य से लगाया जा सकता है कि कॉलेजियम की सिफारिशों पर कभी बिहार तो कभी ओडिशा तो कभी तमिलनाडु से वकीलों के विरोध की खबरें आ रही हैं। अब क्या ऐसा सम्भव है कि एक उच्च न्यायालय के कॉलेजियम द्वारा वर्ष 2011 से 2013 के बीच जिन नामों को उच्चतम न्यायालय कॉलेजियम द्वारा रद्द कर दिया गया हो उन्हीं चार नामों को वर्ष 2019 में संबंधित उच्च न्यायालय कॉलेजियम द्वारा उच्चतम न्यायालय को भेजा गया और उच्चतम न्यायालय ने उसे मंजूरी देकर नियुक्ति के लिए केंद्र सरकार के पास भेज दिया। यह मामला पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय से जुड़ा हुआ है।

उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम ने 26 जुलाई 2019 को 20 वकीलों के नामों की सूची केंद्र सरकार को भेजी। इन सभी को हाईकोर्ट में जज बनाने की सिफारिश की गई है। सरकार से मंजूरी मिलने पर इन सभी को पंजाब व हरियाणा, राजस्थान, कलकत्ता, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के हाईकोर्ट में नियुक्त किया जाएगा। उच्चतम न्यायालयकी वेबसाइट पर अपलोड की गयी जानकारी के मुताबिक, चीफ जस्टिस रंजन गोगोई की अध्यक्षता में जस्टिस एसए बोबडे और एनवी रमाना की मौजूदगी वाले कॉलेजियम ने इन हाईकोर्ट में नियुक्ति के लिए 35 नामों पर विचार किया था। इन 35 में से 20 के नाम सरकार को नियुक्ति के लिए भेज दिए गए हैं, जबकि 12 नाम संबंधित हाईकोर्ट को वापस लौटा दिए गए हैं। तीन अन्य नामों पर विचार को स्थगित कर दिया गया है।

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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के लिए जसगुरुप्रीत सिंह पुरी, सुवीर सहगल, गिरीश अग्निहोत्री, अलका सरीन और कमल सहगल  का नाम भेजा गया है । इनमें से जसगुरुप्रीत सिंह पुरी(जे.एस.पुरी )का नाम वर्ष 2011 में भी उच्च न्यायालय द्वारा भेजा गया था जिसे उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम द्वारा रद्द कर दिया गया था। इसी तरह सुवीर सहगल (आत्मज जस्टिस धर्मवीर सहगल) का नाम भी  वर्ष 2011 की सूची में था जिसे उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम द्वारा रद्द कर दिया गया था। इसी तरह वर्ष 2012 में हरियाणा के तत्कालीन एडवोकेट जनरल कमल सहगल और वर्ष 2013 में गिरीश अग्निहोत्री का नाम पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के कॉलेजियम ने भेजा था और उसे उच्चतम न्यायालय के कॉलेजियम द्वारा रद्द कर दिया गया था। अब इसे क्या कहा जाय कि यह पक्षपात , भाई-भतीजावाद ,राजनीतिक प्रतिबद्धता या न्यायपालिका को प्रतिबद्ध न्यायाधीश देने का अप्रत्यक्ष प्रयास है या ईमानदारी है?

दरअसल पिछले वर्षों में पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के कॉलेजियम द्वारा भेजे गए एक दर्जन से अधिक अधिवक्ताओं के नामों को  उच्चतम न्यायालय के  कॉलेजियम द्वारा खारिज किए जाने से उच्च न्यायालय के कॉलेजियम की कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े हो गए हैं। इस बार उन्हीं रद्द (रिजेक्टेड) नामों को फिर से भेजने और उच्चतम न्यायालय के  कॉलेजियम द्वारा नियुक्ति के लिए केंद्र सरकार को भेजने से पूरी न्यायपालिका की शुचिता पर ही गंभीर सवाल उठ खड़े हुए हैं।

इसके पहले दिल्ली हाईकोर्ट के जस्टिस संजीव खन्ना को उच्चतम न्यायालय  के जज के तौर पर नियुक्त करने की सिफारिश पर पूर्व चीफ जस्टिस  आरएम लोढ़ा ने कॉलेजियम की सिफारिश पर ही सवाल उठा दिए थे । जस्टिस लोढ़ा ने कहा था कि कॉलेजियम के काम में पारदर्शिता होनी चाहिए, यह एक संस्था की तरह काम करती है। जस्टिस लोढ़ा ने कहा हर फैसले को एक तर्क के साथ उसके अंत तक पहुंचना चाहिए, इसलिए यह जरूरी है कि फैसला बदलने के बाद उसके कारणों को भी सार्वजनिक किया जाना चाहिए। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट में जज जस्टिस संजय किशन कौल भी कॉलेजियम के फैसले पर सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने चीफ जस्टिस रंजन गोगोई को खत लिखकर अपनी आपत्ति दर्ज की थी। जस्टिस कौल ने कहा कि राजस्थान हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस प्रदीप नंदराजोग ज्यादा वरिष्ठ हैं, ऐसे में जस्टिस खन्ना को वरीयता देना ठीक नहीं होगा। फैसले से गलत संदेश जाएगा। इससे पहले दिल्ली हाईकोर्ट के रिटायर्ड जज जस्टिस कैलाश गंभीर भी इस पर आपत्ति दर्ज कर चुके हैं। उन्होंने राष्ट्रपति को पत्र लिखकर कॉलेजियम के फैसले को गलत बताया था।

बिहार के अधिवक्ताओं ने 6 अगस्त 2019 को पटना हाईकोर्ट के  कोलेजियम द्वारा जातिगत आधार पर जजों के नामों की सिफारिश के विरोध में पटना में प्रदर्शन किया। अधिवक्ताओं ने पटना हाईकोर्ट कोलेजियम पर आरोप लगाया कि जातिगत भेदभाव के आधार पर कोलेजियम द्वारा जजों के नाम प्रेषित किए गए हैं। इस दौरान विरोधस्वरूप उक्त आदेश की सांकेतिक प्रतियों का दहन किया गया। अधिवक्ताओं ने सिफारिश की  सूची का विरोध किया जिसमें  जातिगत आधार पर 15 नामों की सिफारिश की गई है।

जून 2019  में जजों की नियुक्ति के लिए ओडिशा उच्च न्यायालय कॉलेजियम द्वारा की गई सिफारिशों पर असंतोष व्यक्त करते हुए उड़ीसा हाईकोर्ट एडवोकेट एसोसिएशन ने मुख्य न्यायाधीश और कॉलेजियम में शामिल 2 जजों की अदालतों का बहिष्कार किया था। एसोसिएशन के अनुसार जिनकी सिफारिश की गई है वो उच्च न्यायालय में नियमित वकालत नहीं करते हैं। एसोसिएशन ने ओडीशा के राज्यपाल, भारत के मुख्य न्यायाधीश, केंद्रीय कानून मंत्री और प्रधानमंत्री से मांग की थी कि अवैध सिफारिशों को स्वीकार न किया जाए।

(लेखक जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और अमृत प्रभात से लेकर हिंदुस्तान तक तमाम अखबारों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं। आप आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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