Sunday, June 26, 2022

सांप्रदायिक नफरत के नगाड़े पर बज रहा है शर्मिंदगी का डंका

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देश में पिछले आठ साल से सत्ता और संगठन के स्तर पर जारी सांप्रदायिक नफरत फैलाने के अभियान को लेकर पहली बार केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार और भारतीय जनता पार्टी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बचाव की मुद्रा में दिखाई दे रही है। सत्ता और संगठन को अपने बचाव के लिए देश के उसी संविधान का सहारा लेना पड़ रहा है, जिसे बदल कर देश को हिंदू राष्ट्र बनाने की वकालत आरएसएस और भाजपा से जुड़े संगठनों के लोग आए दिन करते रहते हैं। भाजपा के जिन दो प्रवक्ताओं ने पैगंबर हजरत मुहम्मद को लेकर अपमानजनक टिप्पणी और भड़काऊ बयान दिए, उन्हें भी पार्टी से निलंबित/निष्कासित कर भाजपा को आधिकारिक तौर पर सफाई देते हुए परोक्ष रूप से उसी धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत की दुहाई देनी पड़ रही है, जिसकी वह पिछले कई दशकों से खिल्ली उड़ाती आ रही है। इतना नहीं, पार्टी को अपने चुनिंदा नेताओं और केंद्रीय मंत्रियों को भी नसीहत देनी पड़ रही है कि वे संभल कर मुंह खोलें और भड़काऊ बयानबाजी से बाज आएं।

दरअसल मोदी सरकार की यह शुरू से रणनीति रही है कि अगर कोई उसकी किसी गलती या नाकामी को लेकर सवाल उठाता है तो वह उसके जवाब में सामने वाले की गलती या कमजोरी गिना कर सवाल को रफा-दफा करने की कोशिश करने लगती है। देश में लंबे समय से जारी सांप्रदायिक हिंसा और नफरत फैलाने के संगठित अभियान को लेकर भी उसका रुख यही रहा है। अभी पिछले हफ्ते अंतरराष्ट्रीय धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर अमेरिकी विदेश मंत्रालय की वार्षिक रिपोर्ट को लेकर भी उसने इसी तरह की प्रतिक्रिया दी। भारत सरकार की ओर से कहा गया कि अमेरिका को भारत के बारे में चिंता करने के बजाय अपने यहां होने वाली नस्लीय हिंसा, रंगभेदी अपराध और बढ़ रही बंदूक संस्कृति पर ध्यान देना चाहिए।

इससे पहले भी कई अंतरराष्ट्रीय संस्थानों और समाचार पत्र-पत्रिकाओं ने भी जब-जब भारत में सांप्रदायिक हिंसा और नफरत फैलाने वाली गतिविधियों की चर्चा की, तब-तब सरकार और भाजपा की ओर से यही कहा गया कि यह भारत को बदनाम करने की साजिश है। देश के अंदर जिन संगठनों और लोगों ने ऐसी घटनाओं पर चिंता जताते हुए प्रधानमंत्री से इन पर रोक लगाने के लिए सख्त कदम उठाने का अनुरोध किया, उन्हें सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी की ओर से देशद्रोही करार दे देकर उनका मुंह बंद करने की कोशिश की गई। इस बार भी शुरू में तो ऐसा ही हुआ।

सांप्रदायिक नफरत फैलाने के लिए कुख्यात एक टेलीविजन चैनल पर बहस के दौरान भाजपा की राष्ट्रीय प्रवक्ता नूपुर शर्मा द्वारा पैगंबर हजरत मुहम्मद पर की गई अपमानजनक टिप्पणी पर देश के भीतर प्रतिक्रिया हुई और कुछ जगहों पर हिंसक टकराव के हालात बने तो पार्टी की ओर से अपनी प्रवक्ता का बचाव ही किया गया। पार्टी के एक अन्य प्रवक्ता और दिल्ली प्रदेश भाजपा के मीडिया प्रभारी नवीन कुमार जिंदल ने नूपुर शर्मा के बयान को सही ठहराया।

लेकिन जब अरब देशों सहित समूची मुस्लिम दुनिया में भाजपा की प्रवक्ता के बयान का तीव्र विरोध शुरू हुआ, वहां भारतीय उत्पादों का बहिष्कार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीरों के साथ सार्वजनिक तौर पर भद्दा सुलूक होने लगा और वहां की सरकारों की ओर भारत सरकार से माफी मांगने को कहा जाने लगा तो भारत सरकार और भाजपा को होश आया। आनन-फानन में नूपुर शर्मा को छह साल के लिए पार्टी से निलंबित और नवीन कुमार जिंदल को पार्टी से निष्कासित कर दिया गया।

इस कार्रवाई के बाद पार्टी की ओर से एक बयान जारी किया गया जिसमें न तो इन दोनों का जिक्र किया गया और न ही इनके आपत्तिजनक बयानों का। बयान में सफाई दी गई कि भारत सभी धर्मों का सम्मान करने वाला देश है और भाजपा हर उस विचारधारा के खिलाफ है जो किसी भी धर्म का अपमान करती है। यही नहीं, कतर में भारत के राजदूत दीपक मित्तल ने भी बाकायदा एक बयान जारी कर कहा कि भारत के कुछ फ्रिंज एलिमेंट यानी इधर-उधर के छुटभैया लोगों या अराजक तत्वों ने पैगंबर हजरत मुहम्मद के बारे में जो बयान दिए हैं, उनका भारत सरकार से कोई लेना देना नहीं है और उन बयानों के आधार पर भारत के बारे में कोई धारणा नहीं बनानी चाहिए।

यहां गौर करने वाली बात है कि कोरोना वायरस की पहली लहर के दौरान देश भर में तबलीगी जमात के बहाने समूचे मुस्लिम समुदाय के खिलाफ व्यापक अभियान चलाया गया था। सरकार और भाजपा समर्थक संगठनों के साथ मीडिया का एक बड़ा हिस्सा भी भारत में कोरोना फैलाने के लिए मुसलमानों को जिम्मेदार ठहरा रहा था। इस अभियान में सरकारी मशीनरी भी बहुत हद तक शामिल थी। उसको लेकर भी अरब देशों और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने सख्त नाराजगी जताई थी। लेकिन भारत सरकार पर इसका कोई असर नहीं हुआ था। नफरत फैलाने का वह अभियान लंबे समय तक चला था।

सवाल है कि जब उस समय भारत सरकार ने उस अभियान को रोकने की कोई कोशिश नहीं की थी तो अब ऐसा क्या हो गया कि आपत्तिजनक बयान देने वाले अपने प्रवक्ताओं को पार्टी ने न सिर्फ बाहर का रास्ता दिखा दिया, बल्कि भारतीय राजदूत के माध्यम से उन्हें फ्रिंज एलिमेंट करार भी दिलवा दिया। दरअसल इसकी वजह यह है कि उस समय देश भले ही बदनाम हो रहा था लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की छवि पर कोई आंच नहीं आ रही थी। उनके खिलाफ विदेशों में कहीं प्रदर्शन नहीं हो रहे थे, जबकि इस बार अरब देशों में सीधे-सीधे मोदी को निशाने पर लिया जा रहा था। इसलिए उनकी छवि पर आ रही आंच को रोकने के लिए सरकार और पार्टी तुरत-फुरत हरकत में आ गई। जाहिर है कि मोदी को उनकी सरकार और पार्टी देश से ऊपर मान कर चलती है। खुद मोदी भी ऐसा ही मानते हैं और इसीलिए वे अपनी विदेश यात्राओं के दौरान भी विपक्षी नेताओं और अपने पूर्ववर्ती प्रधानमंत्रियों और निशाना साधते हुए प्रकारांतर से अपने देश का अपमान करने से नहीं चूकते हैं।

गौरतलब यह भी है कि हजरत मुहम्मद के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने वाले भाजपा के आधिकारिक प्रवक्ताओं को फ्रिंज ऐलिमेंट करार दिए जाने संबंधी कतर स्थित भारतीय राजदूत के बयान पर सरकार और भाजपा ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। यानी सरकार और भाजपा भी राजदूत के बयान से सहमत है। लेकिन सवाल है कि भारतीय राजदूत का यह बयान किसे मूर्ख बनाने का प्रयास है? दुनिया के तमाम देशों की तरह सभी मुस्लिम देशों के भी नई दिल्ली में दूतावास हैं, जिनमें काम करने वाला स्टाफ अपने-अपने देशों की सरकारों को रिपोर्ट भेजता रहता है कि भारत में क्या चल रहा है। इसलिए नूपुर शर्मा और नवीन कुमार जिंदल को फ्रिंज ऐलिमेंट करार देकर उन देशों को मूर्ख नहीं बनाया जा सकता।

यहां सवाल यह भी है कि कोई फ्रिंज ऐलिमेंट सत्तारूढ़ दल का आधिकारिक प्रवक्ता कैसे हो सकता है? अगर भाजपा के ये दोनों प्रवक्ता फ्रिंज ऐलिमेंट हैं तो फिर कथित उपद्रवियों को उनके कपड़ों से पहचानने और श्मशान बनाम कब्रिस्तान वाले बयान देने वाले शख्स को किस श्रेणी में रखा जाएगा? सरकार के मंत्रियों और सत्तारूढ़ पार्टी के उन नेताओं को क्या कहा जाएगा जो बात-बात में अपने विरोधियों को पाकिस्तान जाने की सलाह देते हैं और सार्वजनिक सभाओं में एक समुदाय विशेष को गद्दार करार देते हुए उन्हें गोली मारने के नारे लगवाते हैं?

बहरहाल मुद्दा यह है कि अगर मोदी सरकार को अपनी और देश की छवि की फ्रिक है तो उसे अपने गिरेबां में झांकने की दरकार है। उसके लिए यह सोचने और चिंता करने की बात है कि तमाम सरकारी और गैर सरकारी वैश्विक संस्थानों की रिपोर्टों में लोकतंत्र, मीडिया की आजादी, मानवाधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, टिकाऊ विकास, खुशहाली सूचकांक, बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी, पेंशन सिस्टम, पासपोर्ट रैंकिंग आदि के पैमानों पर भारत की लगातार खराब छवि क्यों सामने आ रही है? अगर उसे छवि की चिंता नहीं है तो फिर वे बेशक इन रिपोर्टों को नजरअंदाज कर या इन्हें तैयार करने वाले संस्थानों को कुतर्कों के सहारे आईना दिखाने की रणनीति पर आगे बढ़ सकती है। लेकिन यह बात ध्यान में रखी जानी चाहिए कि सच को मीडिया के जरिए हमेशा के लिए छुपाया या दबाया नहीं जा सकता। छवि की चिंता के तहत सिर्फ चंद नेताओं को संभल कर बोलने की हिदायत देने से ही काम नहीं चलेगा बल्कि सरकार और पार्टी के शीर्ष पर बैठे लोगों को भी विभाजनकारी और नफरत भरे बयानों पर लगाम लगानी होगी, अन्यथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आगे भी ऐसी ही शर्मिंदगी झेलनी पड़ती रहेगी।

(अनिल जैन वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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