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कॉमरेड सतपाल डांग: राजनीति का अनूठा सिपाही

जो लोग आतंकग्रस्त पंजाब के उस दौर के अवाम की तरफ खड़ी शख्सियतों से रत्ती भर भी वाकिफ हैं, यकीनन उन्हें कॉमरेड सतपाल डांग का नाम नहीं ही भूला होगा। उन्होंने फिरकापरस्त आतंकवाद और सरकारी आतंकवाद के बीच अडिग खड़े रहकर निर्भीकता से अथाह संघर्ष किया। उस कालेकाल में रोशनी की अनूठी मिसाल बने। आतंकवादियों ने उन्हें अपनी हत्यारी हिटलिस्ट में शिखर पर रखा तो हुकूमत भी उनसे खौफजदा रहती थी। ऐसे रहनुमा विरले हुए हैं जिनका समूचा जीवन सियासतदानों के लिए प्रेरणा स्रोत है। वह सीपीआई (भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी) के कार्ड होल्डर थे लेकिन धुर दक्षिणपंथी आरएसएस, भाजपा, कांग्रेस और अकाली दल के दिग्गज भी उनका गहरा सम्मान करते थे और उनके तर्कों में आस्था रखते पाए जाते थे।                                       

सतपाल डांग आतंकवाद के काले साए वाले पंजाब के सही मायनों में लोकनायक थे। साहस की अद्भुत जिंदा इबारत। सूबे में हिंसक अलगाववादियों ने पैर पसारने शुरू किए थे तो उसी वक्त सतपाल डांग ने उन्हें बेखौफ ललकारना शुरू किया था और पंजाबी समाज पर भविष्य में आने वाले खतरों से आगाह करना भी। वह पहले सियासतदान थे जिन्होंने साफ लफ्जों में कहा था कि हत्या, असहिष्णुता और सांप्रदायिकता की नीतियों पर चलने वाले कतिपय एक ‘नीले चोले वाले हत्यारे संत’ को तत्काल नहीं रोका गया तो यह भस्मासुर बन जाएगा और भारतीय राज्य व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती। इतिहास गवाह है कि ऐसा ही हुआ। आतंकियों ने उन्हें अपनी हिटलिस्ट में तभी शुमार कर लिया था।

खतरे के मद्देनजर पुलिस और सुरक्षाबलों ने उन्हें तगड़ी सुरक्षा- छतरी मुहैया करवाई लेकिन वह इस सबसे बेपरवाह रहे। अलबत्ता इन पंक्तियों को लिखने वाले पत्रकार से बातचीत में उन्होंने इतना जरूर कहा था कि जानबूझकर फिरकापरस्त तत्वों के हाथों मर जाना समझदारी नहीं है बल्कि जिंदा रह कर और मस्तिष्क का इस्तेमाल करके लोकहित में उनका मुकाबला अपरिहार्य है। बहुतेरे राजनेता तब भी हासिल सुरक्षाा व्यवस्था को घमंडी तमाशे तथा रौब-दाब का जरिया माना करते थे। जीवन भर कॉमरेड डांग के पास खुद का कोई वाहन नहीं रहा। कभी था तो एक साइकिल। बावजूद इसके कि पंजाब सरकार में प्रभावशाली महकमे के मंत्री रहे और दशकों नगर पालिका की अगुवाई की। पहले-पहल उनकी हिफाजत सुनिश्चित करने का ऑर्डर लेकर उनके यहां गए सुरक्षाकर्मी हैरान रह गए कि जिस शख्स को उन्हें ‘गॉर्ड’ करना है, उसके पास अपना कोई निजी वाहन तक नहीं।

बाद में उन्हें समझ आया कि कॉमरेड ‘अति विशिष्ट’ तो हैं लेकिन सरकारी अर्थों वाले ‘वीवीआइपी’ कतई नहीं। सतपाल डांग और उनकी पत्नी कॉमरेड विमला डांग पहले से अंतिम दिन तक सुरक्षाकर्मियों के साथ उनकी जीप में पीछे बैठते रहे। तब भी जब उन्हें रोजाना सौ के करीब जानलेवा धमकियों की चिट्ठियां मिलती थीं और बीसियों फोन आते थे। फोन के करीब होने पर हर कॉल वह खुद सुनते थे। हर धमकी के जवाब में वह कहा करते थे कि खौफजदा करके उन्हें खामोश करना नामुमकिन है। हर खत का जवाब देना उनकी फितरत थी। लेकिन धमकी-पत्रों का जवाब इसलिए नहीं दे पाते थे कि प्रेषक-पता गायब होता था। हालांकि ऐसे बेनामी पत्रों का जवाब वह अखबारों मे लेख लिखकर या सार्वजनिक मंचों से भाषणों के जरिए दिया करते थे।                       

सतपाल डांग ऐसे विलक्षण नेता थे जो हर हत्याकांड के बाद मौके पर सपत्नीक पहुंचते थे। खतरा और मौसम कैसा भी हो। दिन हो या रात। यह सिलसिला नहीं टूटा। कभी-कभी एक घटनास्थल से लौटकर छर्हटा, अमृतसर स्थित अपने आवास पहुंचते तो दूसरी किसी वारदात की खबर मिल जाती। उसी वक्त उधर के लिए कूच कर देते। शेव का समय नहीं मिल पाता था, इसलिए दाढ़ी रख ली। पंजाब में आतंकवाद के दौर में सामुदायिक तनाव नहीं फैला तो इसके पीछे डांग दंपति की इन ‘शोक-यात्राओं’ का बहुत बड़ा योगदान है। ऐसा कोई दूसरा सियासतदान न तब था, न अब है जो पीड़ित लोगों के बीच इतना ज्यादा विचरा हो। जख्मों पर मरहम लगाने के लिए।                                           

उन्होंने सरकारी आतंकवाद और पुलिसिया जबर की भी खुलकर मुखालफत की। जमकर बोले और लिखा। उनका मानना था कि आतंकवाद किसी भी लिबास में हो, निंदनीय और अस्वीकार्य है। सीपीआई की एक कार्यकर्ता अमृतसर के करीब ग्रामीण इलाके के सरकारी अस्पताल में नर्स थी। पुलिस एक नौजवान की देह लेकर आई कि यह आतंकवादी है, मुठभेड़ में मारा गया, पोस्टमार्टम किया जाए। एसएचओ दो घंटे के बाद रिपोर्ट लेने आने की बात कहकर चला गया। मौके के डॉक्टर ने पाया कि नौजवान की सांसें चल रही थीं। पोस्टमार्टम की बजाए इलाज शुरू हो गया। सीपीआई कार्यकर्ता नर्स ने अस्पताल के फोन से कॉमरेड डांग को घटना की बाबत बताया।

उसी वक्त डांग साहब ने टेलीग्राम और फोन के जरिए अपनी इस आशंका के साथ राज्यपाल (पंजाब में तब राष्ट्रपति शासन था), हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस, मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक और अमृतसर के पुलिस- प्रशासनिक अधिकारियों को सूचित किया कि कहीं पुलिस उस नौजवान को मार न दे। आधी रात का समय था। किसी ने तत्काल गौर नहीं किया और उधर थानेदार अस्पताल में पोस्टमार्टम रिपोर्ट तथा ‘शव’ लेने आ गया। कथित आतंकी नौजवान को जिंदा पाकर उसने उसी वक्त अपनी रिवाल्वर की तमाम गोलियां जिंदा बचे नौजवान की छाती में उतार दीं और अस्पताल स्टाफ से पोस्टमार्टम करने को कहा। यह एक हौलनाक असाधारण घटना थी। सतपाल डांग ने ‘सिस्टम’ के खिलाफ मोर्चा खोला और कई ख्यात अखबारों में इस प्रकरण पर लिखा।

अंग्रेजी दैनिक ‘द ट्रिब्यून’ में प्रकाशित उनकी टिप्पणी का हाईकोर्ट ने गंभीर संज्ञान लिया और न्यायिक आदेश की हिदायत जारी की। शायद देश में यह अपने किस्म का पहला मामला था कि किसी अखबारी लेख या रिपोर्ट के आधार पर सर्वोच्च अदालत कार्यवाही करे। बाद में ऐसे कितने ही मामले हुए। सतपाल डांग जहां विपथगा आतंकवादियों के मुकाबिल थे वहीं सरकारी आतंकवाद का भी उन्होंने डटकर विरोध किया। ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ के लिए दिए गए एक लंबे इंटरव्यू में उन्होंने इन पंक्तियों के लेखक से कहा था कि, ‘एक किस्म का आतंकवाद दूसरे किस्म के आतंकवाद बल देता है।’ उन दिनों पंजाब में इतनी तार्किकता और मुखरता से बोलने वाले इक्का-दुक्का ही थे।                           

डांग दंपति ने लोक प्रतिबद्धता के चलते संतान उत्पत्ति नहीं की। निजी जायदाद नहीं बनाई। सतपाल डांग पंजाब की संयुक्त सरकार में खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री थे। राजधानी चंडीगढ़ से अमृतसर आने-जाने के लिए बस में सफर करते थे। वह खुद और उनकी पत्नी कई बार विधायक रहीं। दोनों को जो वेतन, भत्ते और पेंशन मिलती थी, उसे वे पार्टी (सीपीआई) को दे देते थे। फिर पार्टी उस पैसे में से उन्हें गुजारा-भत्ता देती थी, जिसे वामपंथी पार्टियों में ‘मिनिमम वेज’ कहा जाता है। इस दंपति को यों ही ‘दरवेश सियासतदान’ नहीं कहा जाता!                                   

सतपाल डांग महज सियासतदान ही नहीं थे बल्कि आला दर्जे के चिंतक, विद्वान और लेखक भी थे। पंजाब समस्या, आतंकवाद और कुछ अन्य विषयों पर उनकी कई किताबें नई रोशनी देती हैं और सदा प्रासंगिक रहेंगीं। उनकी आवाज पंजाब की सबसे बुलंद आवाज थी लेकिन जीवन संध्या में यह आवाज कई साल खामोश रही और वह कोमा की हालात में बिस्तर पर रहे। एक पार्टी कार्यकर्ता ने अपने घर रखकर यथासंभव संभाला। 7 बरस पहले के 15 जून को कॉमरेड सतपाल डांग का जिस्मानी अंत हुआ।

(लेखक अमरीक सिंह पंजाब के वरिष्ठ पत्रकार हैं।)     

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This post was last modified on June 15, 2020 5:51 pm

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