Monday, January 24, 2022

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कृषि कानूनों में काला क्या है -7: तीसरे संविधान संशोधन की एंट्री 33 बनी कृषि कानूनों के विवाद की जड़

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किसान कृषि कानूनों को काला मानते हैं और कानून के जानकार भी कहते हैं कि कृषि से जुड़े मुद्दों पर कानून बनाने का अधिकार राज्य की सरकारों को फिर इस सीमा का उल्लंघन करके मोदी सरकार ने तीन कृषि कानून क्यों बनाये? क्या कांग्रेस नेता राहुल गाँधी का यह आरोप कि मोदी सरकार कार्पोरेट्स परस्त सरकार है सही है? क्या कारपोरेटों के हितों के लिए मोदी सरकार ने खेती किसानी और किसानों को दांव पर लगा दिया ? कृषि को संविधान में राज्य सूची में रखा गया है| इसका सीधा अर्थ ये है कि कृषि से जुड़े मुद्दों पर कानून बनाने का अधिकार राज्य की सरकारों को है| फिर सवाल उठता है कि क्या मोदी सरकार ने कृषि पर कानून बनाकर गलती की है?

उच्चतम न्यायालय में दायर याचिका के मुताबिक नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा पारित तीनों कृषि कानून संविधान के अनुच्छेद 246 का उल्लंघन है| संविधान के दायरे में ये कानून कितना सही है, इस पर  सुप्रीम कोर्टमें अंतिम बहस होना बाकी है| अधिवक्ता मनोहर लाल शर्मा ने इन तीनों कृषि कानूनों की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे रखी है| एमएल शर्मा का तर्क है कि केंद्र को संविधान के तहत इन कानूनों को बनाने का अधिकार नहीं है|  कृषि कानूनों की संवैधानिक वैधता को चुनौती देती हुई कम से कम 6 याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट के सामने लंबित हैं|    

याचिकाओं में देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू द्वारा 66 साल पहले 1954 में किए गए संविधान के तीसरे संशोधन को चुनौती दी गयी है| याचिका में दावा किया गया है कि 1954 में किया गया संविधान का तीसरा संशोधन ही गलत और अनुचित है|  कृषि जैसे विषय को समवर्ती सूची में शामिल करना असंवैधानिक है|  

देश के संविधान की सातवीं अनुसूची राज्यों और संघ के बीच के अधिकारों का वर्णन करती है|  इस अनुसूची में तीन लिस्ट हैं| इन्हें संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची कहते हैं|  संघ सूची में वे विषय हैं जिन पर सिर्फ केंद्र यानी कि संसद ही कानून बना सकती है|, राज्य सूची में वे विषय हैं जिन पर राज्य की विधायिका कानून बना सकती है, लेकिन समवर्ती सूची में ऐसे मुद्दे हैं जिन पर संसद और राज्य की विधायिका दोनों ही कानून बना सकती है|  

अनुच्छेद 246 में उन विषयों का वर्णन है जिन पर केंद्र सरकार यानी कि संसद, राज्य सरकारें यानी कि राज्य विधानमंडल कानून बना सकती है|  समवर्ती सूची में आने वाले मुद्दों का जिक्र भी इसी अनुच्छेद में है. राज्य सूची की प्रविष्टि संख्या 14 में कृषि का जिक्र है|  इसका मतलब साफ है कि राज्य को कृषि से जुड़े मुद्दों पर कानून बनाने का अधिकार है| राज्य सूची में ही आगे प्रविष्टि संख्या 26 में जिक्र है कि विधानसभा राज्य की सीमा के अंदर व्यापार और वाणिज्य से जुड़े नियम बना सकेगी|

संविधान की राज्य सूची की प्रविष्टि संख्या 27 कहती है कि राज्य की सीमा के अंदर वस्तुओं और सेवाओं के प्रोडक्शन, सप्लाई और डिस्ट्रीब्यूशन यानी कि उत्पादन, आपूर्ति और वितरण और को लेकर कानून बनाने का अधिकार उस राज्य की विधायिका को है|  इन वस्तुओं में कृषि के उत्पाद भी आते हैं|

अब तक साफ हो चुका है कि कृषि और कृषि उपज के व्यापार विपणन पर कानून बनाने का हक राज्यों को ही था| 26 जनवरी 1950 को जब देश का संविधान लागू हुआ तो मूल संविधान में प्रावधान ऐसा ही था| लेकिन 4 साल तक संविधान के विभिन्न धाराओं के कार्यान्वयन को परखने के बाद नेहरू को कई अनुभव हुए| आजादी के बाद पंडित नेहरू के सामने देश में कई चुनौतियां थीं| उन्हीं में प्रमुख थीं भूमि सुधार, खाद्य संकट, अनाज का विपणन और वितरण, अनाज की कालाबाजारी, जमाखोरी मूल्य वृद्धि. देश में तब खाद्य पदार्थों की आपूर्ति सीमित थी, कालाबाजारी के जरिए कुछ लोग इसका फायदा उठा रहे थे|

नेहरू इन समस्याओं का प्रभावी तरीके से समाधान कर सकें इसलिए ये जरूरी था कि इससे जुड़े कानून का नियंत्रण वह केंद्र के पास रखना चाहते थे| एक बात और थी, समाजवादी विचारधारा से प्रभावित नेहरू भूमि सुधार लागू करना चाहते थे, लेकिन कई राज्य सरकारें इसके लिए तैयार नहीं थीं|

आखिरकार तत्कालीन पीएम नेहरू के काल में संविधान का तीसरा संविधान संशोधन हुआ। इस संशोधन के जरिए समवर्ती सूची की प्रविष्टि संख्या 33(एंट्री३३) में एक प्रावधान डाला गया| इसके अनुसार उत्पादन, आपूर्ति, वितरण, व्यापार और वाणिज्य पर केंद्र सरकार भी कानून बना सकती है| इस कानून के उपबिंदुओं में खाद्य पदार्थ, खाद्य तेल, समेत कई चीजें शामिल हैं| यानी समवर्ती सूची की प्रविष्टि संख्या 33 के आधार पर कृषि से जुड़े उत्पादन, आपूर्ति, वितरण, व्यापार और वाणिज्य पर केंद्र सरकार भी कानून बना सकती है| केंद्र सरकार इन मुद्दों पर उत्पादन एवं आपूर्ति को लोकहित में समझने पर इस पर नियंत्रण लगा सकती है| ये संविधान संशोधन 22 फरवरी 1954 को किया गया|

नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले साल सितंबर में जो तीन कृषि कानून बनाए हैं, वो इसी समवर्ती सूची की प्रविष्टि संख्या 33 के आधार पर बनाए हैं|

किसानों का मानना है कि एंट्री 33 केंद्रीय सरकार को खाद्य संबंधी कानून बनाने का हक देती है ना कि अनाज संबंधी| एंट्री 33 में फूड ग्रेन अर्थात अनाज का जिक्र ही नहीं है| इसलिए केंद्र सरकार का यह तीनों कानून संवैधानिक तौर पर नहीं बना सकती थी| लेकिन गुजरात हाईकोर्ट तथा सुप्रीम कोर्ट ने आवश्यक वस्तुएं कानून 1995 की व्याख्या में फूड स्टफ में फूड ग्रेन को शामिल माना है पर शब्दकोश में या दोनों अलग-अलग शब्द हैं| इस पर निर्णय बहस और सुप्रीम कोर्ट का संवैधानिक निर्णय आना बाकी है|  ऐसे में यह कानून पूरी तरह विवादास्पद है|

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह का लेख।)

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