Friday, October 29, 2021

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यूपी सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कप्पन की अवमानना याचिका

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उच्चतम न्यायालय ने गुरुवार को आर्थिक रूप से पिछड़ी श्रेणी (ईडब्ल्यूएस) घोषित करने के लिए आठ लाख रुपए वार्षिक आय को मानदंड के रूप में तय करने के कारण बताने के लिए कहा है। जस्टिस धनंजय वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने कहा कि आखिर आय के मानदंड को पूरे देश में समान रूप से कैसे लागू नहीं किया जा सकता है। पीठ ने केंद्र सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) केएम नटराज से पूछा कि आठ लाख रुपए का मानदंड तय करने के लिए आपने क्या अभ्यास किया? या आपने ओबीसी पर लागू होने वाली मानदंड को स्वीकार कर लिया।

पीठ ने कहा कि आखिर आय के मानदंड को पूरे देश में समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता है, क्योंकि मुंबई और बेंगलुरु जैसे बड़े महानगरों में रहने वाले व्यक्ति की वार्षिक आय को उत्तर प्रदेश के एक दूरस्थ गांव में रहने वाले लोगों के साथ तुलना नहीं की जा सकती है, भले ही उनकी आय एकसमान क्यों न हो। पीठ ने यह सवाल नील ऑरेलियो नून्स और अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए उठाया जिसमें देशभर के मेडिकल कॉलेजों में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रमों में वर्तमान शैक्षणिक सत्र से अखिल भारतीय कोटा में ओबीसी व ईडब्ल्यूएस कोटा को लागू करने के लिए केंद्र की 29 जुलाई की अधिसूचना को चुनौती दी गई है। नीट के माध्यम से चयनित उम्मीदवारों में से मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस में 15 फीसदी सीटें और एमएस व एमडी कोर्स में 50 फीसदी सीटें अखिल भारतीय कोटे से भरी जाती हैं।

एएसजी नटराज ने तर्क दिया कि आरक्षण लागू करना नीति का विषय है। इस पर पीठ ने पूछा कि आठ लाख रुपए के आंकड़े तक पहुंचने के लिए आपने क्या अभ्यास किया या आपने सिर्फ वही किया जो ओबीसी के लिए लागू था।

पीठ ने इंद्रा साहनी (मंडल मामला) के फैसले का जिक्र करते हुए कहा कि जिनकी आय आठ लाख रुपये से कम है वे शैक्षिक और सामाजिक रूप से पिछड़ेपन व आर्थिक पिछड़ेपन के मानदंड को पूरा करते हैं। पीठ ने नटराज से कहा कि यहां हम शुद्ध आर्थिक पिछड़ेपन से निपट रहे हैं। हम जानना चाहते हैं कि केंद्र ने क्या अभ्यास किया है? अधिसूचना में विशेष रूप से आठ लाख रुपए का जिक्र है। लेकिन अब आपके पास 17 जनवरी का कार्यालय ज्ञापन है जिसमें संपत्ति के साथ आठ लाख रुपये शामिल हैं। क्या आप संपत्ति सह आय को लागू कर रहे हैं।

नटराज ने इस संबंध में हलफनामा दाखिल करने के लिए समय मांगा। पीठ ने कहा कि जब हम पूछ रहे हैं कि ईडब्ल्यूएस पात्रता के लिए आठ लाख रुपए का आधार क्या है तो आप यह नहीं कह सकते कि यह नीति का मामला है। नटराज ने कहा कि इसके लिए विचार-विमर्श किया गया था। लेकिन पीठ ने उनसे डेटा या इसके लिए किए गए अध्ययन को प्रदर्शित करने के लिए कहा। पीठ अब इस मामले को 20 अक्टूबर को विचार करेगी।

यूपी सरकार के खिलाफ कप्पन की अवमानना याचिका

हाथरस मामले की कार्रवाई के दौरान गिरफ्तार हुए केरल के पत्रकार सिद्दीकी कप्पन ने उत्तर प्रदेश सरकार के अधिकारियों पर अपने ‘चिकित्सा अधिकारों’ के उल्लंघन का आरोप लगाया है। कप्पन ने याचिका में आरोप लगाया गया है कि सुप्रीम कोर्ट के 28 अप्रैल के निर्देश के अनुसार उसके ठीक होने के बाद ही उसे अस्पताल से छुट्टी दी जाएगी।लेकिन अधिकारियों ने उसे तब छुट्टी दे दी, जब वो कोविड-19 पॉजिटिव था।इस दौरान उसे मथुरा जेल में स्थानांतरित कर दिया गया। ये सुप्रीम कोर्ट के निर्देश का स्पष्ट उल्लंघन है।

कप्पन ने याचिका में कहा है कि 6 मई, 2021 की मध्यरात्रि में उसे अस्पताल से छुट्टी देने और यहां तक कि उसे नींद से वंचित करने का काम अदालत की अवमानना है। याचिका में कहा गया है कि दो नोटिस दिए जाने के बावजूद, एक 9 मई को और दूसरा 25 मई को, अधिकारियों ने इस संबंध में कोई सुधारात्मक कदम नहीं उठाया। इस तरह यह निष्कर्ष निकलता है कि ये जानबूझकर किया गया है।

इससे पहले पत्रकार सिद्दीकी कप्पन की पत्नी रैहनत कप्पन ने उत्तर प्रदेश सरकार को अवमानना का नोटिस भेजा था, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के 28 अप्रैल के आदेश का पालन ना करने का आरोप लगाया गया था।साथ ही अदालत को उनकी चिकित्सा स्थिति के बारे में गलत/भ्रामक जानकारी प्रस्तुत करने का आरोप लगाया था।गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने 28 अप्रैल को केरल के पत्रकार सिद्दीकी कप्पन को उत्तर प्रदेश की मथुरा जेल से इलाज के लिए दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया था।

बच्चे को केन्या से भारत वापस लाने का सीबीआई को निर्देश

उच्चतम न्यायालय सीबीआई को केन्या से एक बच्चे को भारत वापस लाने का निर्देश दिया है। साथ ही पिता के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज करने के आदेश दिए हैं। मामले में पिता को अवमानना नोटिस भी जारी किया गया है। दरअसल, इस मामले में अदालत को गुमराह करबच्चे की कस्टडी ले ली गई थी। यह फैसला एक दंपति के बीच 11 साल के लड़के को लेकर कस्टडी की ‘लड़ाई’ के संबंध में आया है।अदालत ने फैसला सुनाया कि बच्चे के पिता ने धोखाधड़ी से गुमराह करके बच्चे की कस्टडी प्राप्त की थी और केन्या ले गया था। सुप्रीम कोर्ट ने पिता को अवमानना का नोटिस भी दिया है।

दरअसल, पेरी और स्मृति कंसाग्रा ने 2007 में शादी की और अप्रैल 2012 से अलग रह रहे हैं। केन्या और यूनाइटेड किंगडम की दोहरी नागरिकता प्राप्त बच्चा भारत का एक प्रवासी नागरिक है।पिछले साल 28 अक्टूबर कोउच्चतम न्यायालय ने उसके भारतीय मूल के पिता पेरी कंसाग्रा को बेटे की स्थायी कस्टडी प्रदान की थी जिसके पास केन्याई पासपोर्ट है। अदालत ने इस शर्त पर कस्टडी दी थी कि पिता केन्याई अदालत से मिरर ऑर्डर प्राप्त करेगा , जो माता-पिता – पेरी और स्मृति के बीच हुई शर्तों और आश्वासनों को दर्शाए।पेरी कंसाग्रा को इस मिरर ऑर्डर को सुप्रीम कोर्ट के सामने पेश करने का निर्देश दिया गया था।

दो महीने बाद दिसंबर 2020 में पेरी कंसाग्रा ने उच्चतम न्यायालय को बताया कि 9 नवंबर, 2020 को केन्याई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला दर्ज किया था लेकिन इसी साल 19 अगस्त को मां के वकील ने कोर्ट को बताया कि केन्या के हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश को मानने से इनकार कर दिया है।बच्चा अब भारतीय अधिकार क्षेत्र से बाहर है और पिता ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का स्पष्ट उल्लंघन किया है। कोर्ट ने भारत सरकार से मदद मांगी थी और केन्या के साथ राजनयिक स्तर पर मामले को उठाने के लिए कहा था। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को सूचित किया था कि विदेश सचिव इस मुद्दे से निपटने की स्थिति में होंगे।

अब मामले में फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस यू यू ललित, जस्टिस हेमंत गुप्ता और जस्टिस अजय रस्तोगी की पीठ ने आदेश दिया है कि केंद्रीय जांच ब्यूरो, अपने निदेशक के माध्यम से पेरी के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही दर्ज करके उचित कार्यवाही शुरू करेगी और बेटे आदित्य की कस्टडी सुरक्षित कर स्मृति को सौंपेगी।विदेश मंत्रालय के सचिव और केन्या में भारतीय दूतावास को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया है कि आदित्य की कस्टडी हासिल करने के लिए स्मृति को हर संभव सहायता प्रदान की जाए।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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