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Thursday, September 16, 2021

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कोरोना संकटः पांच राज्यों की रैलियों में व्यस्त मोदी ने INSACOG की चेतावनी को किया अनदेखा

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केंद्र सरकार द्वारा बनाये गये वैज्ञानिक फोरम INSACOG के पांच वैज्ञानिकों द्वारा समाचार एजेंसी रॉयटर्स को दी गयी जानकारी और इस INSACOG के सदस्य डॉ. राकेश मिश्रा का द वॉयर के लिये किया गया करण थापर के इंटरव्यू से एक बात स्पष्ट निकलकर आयी है कि देश के वैज्ञानिकों ने समय रहते भारत सरकार को कोरोना की दूसरी लहर से आगाह कर दिया था। पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के चलते केंद्र की सत्ता में काबिज नरेंद्र मोदी सरकार ने इसे नज़रअंदाज किया, रिपोर्ट दबाये रखा और जानबूझकर मूल तथ्यों को छुपाते हुए रिपोर्ट को मिसरिप्रेजेंट किया।

भारत सरकार द्वारा स्थापित वैज्ञानिकों की एक सलाहाकर समिति ने मार्च की शुरुआत में ही कोरोना वायरस के एक नए और अधिक संक्रामक वेरिएंट की चेतावनी देते हुये बताया था कि कोरोना का नया वैरियंट कहर बरपाने वाला है। साथ ही विशेषज्ञों ने सख्त कदमों, मेडिकल सप्लाई बढ़ाने और लॉकडाउन लगाने की बात भी कही थी। 27 मार्च से शुरू हुये पश्चिम बंगाल समेत पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र वैज्ञानिक फोरम की सलाह को नज़रअंदाज कर दिया गया। इसकी परिणति ये है कि भारत इन दिनों कोरोना वायरस संक्रमण की दूसरी लहर के कारण अभूतपूर्व संकट का सामना कर रहा है।

सिर्फ़ अप्रैल महीने में भारत में 45,863 लोगों की कोरोना से मौत हुई, जबकि 66,13,641 कोविड केस अप्रैल महीने में दर्ज किये गये। आलम ये है कि अस्पतालों से लेकर श्मसानों तक में जगह नहीं है, हर जगह वेटिंग लाइन लगी हुयी है। न पर्याप्त ऑक्सीजन है, न रेमेडिसविर जैसी एंटी वायरल इंजेक्शन, न ही बेड, न वैंटिलेटर। भारत को दुनिया भर के 40 से अधिक देशों से ऑक्सीजन सिलेंडर, ऑक्सीजन कंसंट्रेटर मशीन, ऑक्सीजन सिलेंडर और वैंटिलेटर के लिये मदद लेनी पड़ रही है।

हमने मार्च में ख़तरे की चेतनावी दी थी- डॉ. राकेश मिश्रा
“विशेषज्ञों ने मार्च की शुरुआत में यह चिंता प्रकट की थी कि बल्कि यह एक तरह से चेतावनी दी थी कि हम एक बड़े ख़तरे की ओर बढ़ रहे हैं। विशेषज्ञ सलाहकार पैनल ने इसे ‘बहुत चिंताजनक’ बताते हुये औपचारिक रूप से सरकार को चेताया था कि कोरोनावायरस के नए और अधिक संक्रामक संस्करण देश को जकड़ रहा है और इसके परिणामस्वरूप, यह बहुत संभावना है कि कोविड के मामले और मौतें तेजी से बढ़ेंगे। यह बहुत स्पष्ट है कि हम एक बड़े वास्तविक ख़तरे की ओर बढ़ रहे हैं।”

उपरोक्त बातें डॉ. राकेश मिश्रा ने द वॉयर के लिए करण थापर को दिये गये एक इंटरव्यू में कही हैं, जोकि भारतीय SARS-CoV-2 जीनोम सीक्वेंसिंग कंसोर्टिया (INSACOG) के सदस्य और सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी, हैदराबाद के निदेशक हैं। डॉ. राकेश मिश्रा फोरम के सदस्य के तौर पर वायरस वेरिएंट पर सरकार को सलाह दे रहे हैं।

एक साहसिक और मुखर साक्षात्कार में, भारत के सबसे अग्रणी वैज्ञानिकों में से एक और भारतीय SARS-CoV-2 जीनोम सीक्वेंसिंग कंसोर्टिया (INSACOG) के एक सदस्य ने पुष्टि की है कि मार्च की शुरुआत में, विशेषज्ञ सलाहकार पैनल जिसमें से एक वह भी थे, ने औपचारिक रूप से सार्स-कोव-2 के नये और अधिक संक्रामक भातीय वैरिएंट्स द्वारा तबाही मचाने की चेतावनी दी थी।

द वायर से मिश्रा ने कहा कि INSACOG की चिंताओं को सीधे नेशनल सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल के निदेशक डॉ. सुजीत कुमार सिंह को सूचित किया गया, जिनसे INSACOG ने रिपोर्ट की। उन्होंने आगे कहा, “मुझे लगता है कि यह स्वास्थ्य सचिव के पास गया था और यह असंभव है कि प्रधानमंत्री को नहीं बताया गया हो। गौरतलब है कि INSACOG की स्थापना सरकार द्वारा इसीलिये की गई थी ताकि वह सूचित होते रहें। ऐसे में यह मानना मुश्किल है कि इस तरह की चेतावनी प्रधानमंत्री को नहीं दी गई होगी। यह एक उच्च चिंता थी और इसमें कोई संदेह नहीं है। हम बहुत, बहुत चिंतित थे और INSACOG को लग रहा था कि कुछ बुरा घटित होने वाला है।”

मार्च के शुरू में INSACOG की आशंकाएं और चिंताएं क्या थीं, जो उन्होंने सरकार को चेतावनी भेजी? इस सवाल पर डॉ. मिश्रा ने कहा कि वेरिएंट बहुत विपुल थे। INSACOG उन मामलों की घातक वृद्धि के बारे में चिंतित था। जो बहुत अधिक मृत्यु दर के साथ बहुत खतरनाक होगा।

डॉ राकेश मिश्रा ने कहा, “कोरोना मामलों में घातक वृद्धि वायरस को उत्परिवर्तित करने के लिए अवसर प्रदान करेगी और संभवत: ऐसे उत्परिवर्तन हो सकते हैं जो न केवल अधिक संक्रामक हैं बल्कि अधिक प्रतिरक्षा प्रतिरोधी भी हैं, इस प्रकार टीका कार्यक्रम चल रहा है।”

उन्होंने कहा कि सरकार द्वारा न सिर्फ विशेषज्ञ सलाहकार पैनल की चेतवनी को नज़रअंदाज़ किया गया बल्कि प्रभावशाली ढंग से रिस्पांस भी नहीं दिया गया। हम मार्च में ही बहुत स्पष्ट थे कि एक सचमुच का ख़तरा और भयावह स्थिति आने वाली है।

क्या है INSACOG
केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार ने 25 दिसंबर 2020 को INSACOG गठित किया था। इसे वायरस के जीनोमिक वैरिएंट्स का पता लगाने का काम सौंपा गया था। इसके लिए देशभर की 10 लैबोरेट्रीज को एक साथ लगाया गया था ताकि अलग-अलग वैरिएंट्स का अध्ययन किया जा सके।

जीनोम सिक्वेंसिंग से कोरोना वायरस के जीन में कितने परिवर्तन आये हैं, इसका पता लगाया जाता है। इसे वायरस का बायोडाटा भी कहते हैं। यह कार्य भारतीय सार्स कोव-2 जीनोमिक्स कंसोर्टियम (आईएनएसएसीओजी) करती है, जो कि 10 राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं का एक समूह है। इसे INSACOG के शोधकर्ताओं ने पहली बार B.1.617 का पता लगाया, जिसे अब फरवरी के शुरू में वायरस के भारतीय संस्करण के रूप में जाना जाता है।

INSACOG के शोधकर्ताओं ने कोरोना के B.1.617 वैरिएंट्स की जानकारी स्वास्थ्य मंत्रालय को इस चेतावनी के साथ दी थी कि यह वैरिएंट कोरोना के मामले बढ़ा सकता है। स्वास्थ्य मंत्रालय को जानकारी देने के साथ ही INSACOG ने स्वास्थ्य मंत्रालय के लिए बयान का ड्राफ्ट तैयार करना शुरू कर दिया। इसमें लिखा गया था कि वायरस में हुए E484Q और L452R म्यूटेशन ‘बहुत चिंताजनक’ हैं। यह म्यूटेड वायरस पहले से ज्यादा आसानी से इंसानी कोशिकाओं में प्रवेश कर सकता है और यह इंसान के इम्यून सिस्टम का सामना करने में भी सक्षम है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने दो सप्ताह बाद इसकी जानकारी देश को दी।

केंद्र सरकार ने INSACOG की चेतावनी को खारिज किया
3 मई को प्रकाशित रॉयटर्स की एक न्यूज स्टोरी में INSACOG में शामिल पांच वैज्ञानिकें ने बताया है कि मॉर्च के महीने में उनकी चेतावनी को केंद्र सरकार ने नज़रअंदाज कर दिया।रॉयटर्स के अनुसार, इंडियन SARS-CoV-2 जेनेटिक कंसोर्टियम (INSACOG) ने वायरस के अधिक संक्रामक वैरिएंट को लेकर एक शीर्ष अधिकारी को जानकारी दी थी, जो सीधा प्रधानमंत्री मोदी को रिपोर्ट करता है। अभी तक यह पता नहीं चल पाया है कि उस अधिकारी ने यह जानकारी प्रधानमंत्री तक पहुंचाई या अपने तक ही रखी। प्रधानमंत्री कार्यालय की तरफ से अभी तक इस मामले में कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है।

इन पांच में से चार वैज्ञानिकों ने बताया कि चेतावनी के बावजूद केंद्र सरकार ने वायरस के प्रसार पर रोक लगाने के लिए कोई बड़ी पाबंदी लागू नहीं की। हजारों की संख्या में लोग बिना मास्क लगाए धार्मिक कार्यक्रमों और राजनीतिक दलों की रैलियों में शामिल होते रहे। मोदी, उनके कुछ शीर्ष लेफ्टिनेंट, और विपक्षी दलों के दर्जनों अन्य राजनेताओं ने मार्च और अप्रैल में स्थानीय चुनावों के लिए देश भर में रैलियां कीं। कुंभ मेले का आयोजन किया गया और विज्ञापन देकर लाखों लोगों को मेले में बुलाया गया।

राज्य-विज्ञान संस्थान के निदेशक अजय परिडा और INSACOG के एक सदस्य ने रायटर को बताया कि INSACOG के शोधकर्ताओं ने पहली बार B.1.617 का पता लगाया, जिसे अब फरवरी के शुरू में वायरस के भारतीय संस्करण के रूप में जाना जाता है। उत्तरी भारत अनुसंधान केंद्र के निदेशक ने रायटर को बताया कि INSACOG ने 10 मार्च से पहले स्वास्थ्य मंत्रालय के नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (NCDC) के साथ अपने निष्कर्षों को साझा किया, यह चेतावनी देते हुए कि संक्रमण देश के कुछ हिस्सों में बढ़ सकता है। यह निष्कर्ष तब भारतीय स्वास्थ्य मंत्रालय को दिया गया था। स्वास्थ्य मंत्रालय ने टिप्पणी के अनुरोधों का जवाब नहीं दिया।

उस तारीख के आसपास, INSACOG ने स्वास्थ्य मंत्रालय के लिए एक मसौदा मीडिया स्टेटमेंट तैयार करना शुरू किया। रायटर्स द्वारा देखे गए उस मसौदे के एक संस्करण ने फोरम के निष्कर्षों को निर्धारित किया। नए भारतीय संस्करण में वायरस के हिस्से में दो महत्वपूर्ण उत्परिवर्तन थे, जो मानव कोशिकाओं से जुड़ते हैं, और यह 15% से 20% नमूनों में पता लगाया गया था। महाराष्ट्र, भारत का सबसे प्रभावित राज्य है। चार वैज्ञानिकों ने रॉयटर्स को बताया कि चेतावनी के बावजूद केंद्र सरकार ने वायरस के प्रसार को रोकने के लिए प्रमुख प्रतिबंध लगाने की प्रमुख मांग नहीं मानी।

INSACOG के मसौदा बयान में कहा कि E484Q और L452R नामक उत्परिवर्तन ‘उच्च चिंता’ के थे। इसमें कहा गया है, “संस्कृतियों में अत्यधिक तटस्थ एंटीबॉडी से बचने के लिए E484Q उत्परिवर्ती वायरस का डेटा है, और वहां डेटा है कि L452R उत्परिवर्तन बढ़े हुए पारगम्यता और प्रतिरक्षा भागने दोनों के लिए जिम्मेदार था।”

दूसरे शब्दों में, अनिवार्य रूप से, इसका मतलब था कि वायरस के उत्परिवर्तित संस्करण मानव कोशिका में आसानी से प्रवेश कर सकते हैं और किसी व्यक्ति की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का मुकाबला कर सकते हैं।

मंत्रालय ने INSACOG के निष्कर्षों को दो सप्ताह बाद 24 मार्च को सार्वजनिक किया, लेकिन सरकार द्वारा मीडिया को जारी किये गये बयान में ‘चिंता का विषय’ शब्द शामिल नहीं किया गया था। बयान में केवल कहा गया है कि अधिक समस्याग्रस्त वैरिएंट के लिए पहले से चल रहे परीक्षण और संगरोध बढ़ाने के उपायों की आवश्यकता है और इस पर सरकार ने मीडिया को जानकारी देते हुये कहा था कि हमने टेस्टिंग लगभग दोगुना कर दिया है 1.9 मिलियन परीक्षण एक दिन में।

उत्तर भारत के अनुसंधान केंद्र के निदेशक ने रायटर को बताया कि मीडिया मसौदा देश के सबसे वरिष्ठ नौकरशाह, कैबिनेट सचिव राजीव गौबा को भेजा गया, जो सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करता है। वहीं गौबा ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। सरकार ने कोरोना वायरस के नए वैरिएंट के प्रसार में तेजी को रोकने के लिए कोई कदम नहीं उठाया, और ठीक एक महीने बाद पहली अप्रैल से नए संक्रमण ने तबाही मचानी शुरू कर दी।

सरकार ने मीडिया को दिए बयान से हटाया ‘बहुत चिंताजनक’ शब्द
24 मार्च को स्वास्थ्य मंत्रालय ने देश में डबल म्यूटेंट स्ट्रेन मिलने की बात कही, लेकिन बयान में कहीं भी ‘बहुत चिंताजनक’ शब्द का जिक्र नहीं था। जब INSACOG के वैज्ञानिक सलाहकार समूह के प्रमुख शाहिद जमील से पूछा गया कि सरकार ने इन चेतावनियों पर जोरदार प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी तो उन्होंने कहा कि वो इस बात को लेकर खुद चिंतित थे कि सरकार इन पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे रही है।

जमील ने रॉयटर्स से कहा कि नीति को सबूत पर आधारित होना चाहिए। उन्होंने कहा, “मैं चिंतित हूं कि नीति बनाने के लिए विज्ञान का ध्यान नहीं रखा गया। बतौर वैज्ञानिक हम सिर्फ सबूत दे सकते हैं, नीति बनाने का काम सरकार का है।”

INSAGOC की इस चेतावनी के बाद भी प्रधानमंत्री मोदी समेत कई बड़े कई राज्यों में हजारों लोगों की रैलियों को संबोधित करते रहे और हरिद्वार में कुंभ का मेला नाममात्र की पाबंदियों के साथ चलता रहा।

 NCDC प्रमुख ने बताई थी लॉकडाउन की ज़रूरत
INSACOG स्वास्थ्य मंत्रालय के नेशनल सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल (NCDC) के तहत काम करता है। NCDC के प्रमुख सुजीत कुमार सिंह ने हाल ही में हुई एक निजी ऑनलाइन बैठक में बताया था कि स्थिति पर काबू पाने के लिए अप्रैल की शुरुआत में कड़े लॉकडाउन की ज़रूरत थी।

उन्होंने कहा था कि यह साफ-साफ बता दिया गया है कि अब अगर कड़े कदम नहीं उठाए गए तो कोरोना के कारण होने वाली मौतों को रोकना मुश्किल हो जाएगा।

INSACOG के वैज्ञानिकों की एक सलाहाकार समिति के पांच वैज्ञानिकों ने समाचार एजेंसी रॉयटर्स को बताया है कि उनकी चेतावनी को सरकार ने नजरअंदाज़ किया। चार वैज्ञानिकों ने कहा कि चेतावनी के बावजूद सरकार ने वायरस को फैलने से रोकने के लिए कड़ी पाबंदियां लगाने में कोई रुचि नहीं दिखायी। लाखों लोग बेरोक-टोक राजनीतिक रैलियों और धार्मिक आयोजनों में शामिल होते रहे। दस हजार से अधिक किसान नई दिल्ली की सीमा पर धरने पर बैठे रहे। नतीजा यह निकला कि भारत इस वक्त कोरोना वायरस की सबसे बुरी मार से गुज़र रहा है। देश में नए मामलों और मरने वालों की संख्या रोज नए रिकॉर्ड बना रही है।

2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश का यह सबसे बड़ा मानवीय संकट कहा जा रहा है, जिसमें 2.34 लाख लोगों की मौत हो चुकी है। देश में पिछले सात दिनों से 24 घंटे में कोरोना के नये केस चार लाख के पार जा रहे हैं, जबकि एक दिन में मरने वालों का आँकड़ा भी चार हजार के पार जा रहा है। देश में फिलहाल 37 लाख 23 हजार से ज़्यादा एक्टिव कोरोना केस हैं। 

भारत और ब्राजील वैज्ञानिकों की सलाह न मानने का खामियाजा भुगत रहे हैं
भारत और ब्राजील में नेता या तो विफल रहे हैं, या फिर उन्होंने रिसर्चर्स की सलाह पर काम करने में ढिलाई बरती है। इससे लाखों लोगों के जीवन को सीधा-सीधा नुकसान पहुंचा है। ये बातें ‘India, Brazil and the human cost of sidelining science’ नाम से 4 मई को प्रकाशित अपनी एक न्यूज स्टोरी में मशहूर पत्रिका ‘नेचर’ ने कही है।

नेचर मैगजीन ने चुनावी जनसभाओं को भारत में कोरोना विस्फोट के लिए जिम्मेदार बताते हुए कहा है कि भारत के नेताओं ने आवश्यकतानुसार निर्णायक रूप से कार्य नहीं किया है। उदाहरण के रूप में उन्होंने कोरोना वायरस के संक्रमण के बावजूद लोगों के इकट्ठा होने की अनुमति दी। कुछ मामलों में तो नेताओं ने इसे प्रोत्साहित भी किया। नेचर ने उदाहरण देते हुए बताया कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी कोविड के खतरों से निपटने में ढिलाई बरती थी। उन्होंने भी चुनावी जनसभाओं कर लोगों की खूब भीड़ बटोरी। इन रैलियों में सोशल डिस्टेंसिंग की जमकर धज्जियां उड़ाई गईं। इसका परिणाम पूरी दुनिया ने देखा। कई महीनों तक अमेरिका कोरोना वायरस के कहर से जूझता रहा। अमेरिका में इस बीमारी से 570,000 से अधिक मौतें दर्ज की हैं, जो आज भी पूरी दुनिया में सबसे अधिक हैं।

साइंस जर्नल नेचर ने अपने वर्ल्ड व्यू के एक लेख का हवाला देते हुए कहा कि भारत में पिछले साल सितंबर में दैनिक कोरोना मामलों की संख्या 96000 तक पहुंच गई थी। इस साल मार्च की शुरुआत में जब यह संख्या घटकर 12000 प्रतिदिन तक पहुंच गई तो भारत के नेता आत्मसंतुष्ट हो गए। इस दौरान कारोबार फिर से खुल गए। बड़ी संख्या में रैलिया हुईं, जिनमें विवादास्पद नए कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन भी शामिल हैं। मार्च और अप्रैल में चुनावी रैलियां हुईं और धार्मिक आयोजन भी जारी रहे।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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