Friday, October 22, 2021

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कोरोना की नई लहर का कहर

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पीएम मोदी ने कोरोना को लेकर राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की है। यह बैठक तब हुई है जब पिछले साल मार्च महीने में शुरू हो चुके कोरोना के सितंबर महीने में अपने पीक पर पहुंचने के आंकड़े को दो दिन पहले दर्ज किया गया है। अब कोई पूछ सकता है कि क्या सरकार को इस बात का पता नहीं था? पूछने के लिए सरकार से कई सवाल हैं। मसलन क्या सरकार को नहीं पता था कि यूरोप में कोरोना का दूसरा वेब भी आया है और इस खतरे के भारत में भी आने की आशंका प्रबल है। आखिर भारत सरकार ने उसकी क्या तैयारी की थी? हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पिछले साल अगर सरकार अलर्ट रही होती और विदेशों से आने वाले यात्रियों की चेकिंग और भारत में घुसने के पूरे तरीकों पर कड़ी पाबंदी और एहतियात बरती गयी होती तो कोरोना देश में आता ही नहीं। लेकिन गलती एक बार होती है बार-बार होने वाली गलती मूर्खता या फिर कोई साजिश ही हो सकती है। 

इस बार का कोरोना पिछली बार से भी भयावह है। पिछली बार तो पूरी सरकारी मशीनरी अलर्ट थी और जगह-जगह अस्पतालों से लेकर तमाम ज़रूरियात की चीजों पर सक्षम एजेंसियों की तैनाती थी। लेकिन अब तो लोगों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। अस्पतालों में लाखों लाख के बिल आ रहे हैं। अस्पताल पहुंचने पर ही उनसे लाखों रुपये जमा करवा लिए जा रहे हैं। उसके बाद उनका इलाज हो रहा है। मौतों का आलम यह है कि इंदौर से लेकर गुजरात तक के श्मशान घाटों पर लाशों को जलाने के लिए 12-12 घंटे तक का इंतजार करना पड़ रहा है। इस भयावह स्थिति में सरकार अपनी जिम्मेदारी सिर्फ बैठकें कर पूरा कर ले रही है। और बताया तो यहां तक जा रहा है कि कहां कोरोना कम दिखाना है कहां ज्यादा इसका पूरा निर्देश दिया जा रहा है। बंगाल समेत तमाम राज्यों के चुनावों में टेस्टिंग कम कर दी गयी है। जबकि महाराष्ट्र से लेकर किसान आंदोलन वाले राज्यों में इस पर जोर है। ताजा उदाहरण यूपी का है जहां चूंकि पंचायत चुनाव हैं इसलिए शहरों से जुड़े गांवों को भी उनसे बरी कर दिया गया है और रात में लगने वाले कर्फ्यू का दायरा नगर निगमों तक सीमित कर दिया गया है।

किसने नहीं देखा कि कोरोना का इस देश में सरकार की जरूरतों और उसके हितों के तौर पर इस्तेमाल किया गया। जब चाहा लॉक डाउन लगा दिया और उसका इस्तेमाल कभी सीएए विरोधी आंदोलन को खत्म करने के लिए किया गया तो कभी संसद में ऐसे जनविरोधी कानून पारित कराने के लिए किया गया जो कभी सामान्य स्थितियों में संभव ही नहीं था। उसका इस्तेमाल कभी तबलीगी जमात पर जिम्मा डालकर देश में सांप्रदायिकता फैलाने के लिए किया गया तो कभी वैक्सीनेशन की गति को तेज करने के लिए। और हर समय सरकार आपदा में अवसर की ही फिराक में रही। न तो उसे आपदा से कुछ लेना देना था और न ही उसको खत्म करने की उसमें कभी कोई इच्छा शक्ति दिखी। और वैसे भी अगर कोई चीज सरकार के लिए फायदेमंद साबित हो रही है। और समय-समय पर अपनी जरूरतों के लिए उसके इस्तेमाल की सुविधा मिल रही है तो भला कोई उसे क्यों खत्म करना चाहेगा। देश में लॉकडाउन हटाने के बाद बाजार खुल गए, माल खुल गए, सिनेमा हाल खुल गए और अगर नहीं खुलीं तो शिक्षण संस्थाएं। क्योंकि संघ और बीजेपी को लोगों को जाहिल बनाना है और शिक्षण संस्थाओं को खत्म करना है इसलिए उसे बंद रखने में ही उसका हित था। लिहाजा उन्हें नहीं खोला गया। पिछले साल भी किसने नहीं देखा था कि लॉक डाउन तभी लगाया गया जब मध्य प्रदेश में सत्ता परिवर्तन का लक्ष्य पूरा हो गया था।

और अब तो बाकायदा उत्पीड़न के हथियार के तौर पर इसका इस्तेमाल किया जा रहा है। कहीं मास्क न लगाने पर लाठियों से पिटाई की जा रही है तो कहीं लोगों के घरों में आयोजित समारोहों तक में पुलिस घुस जा रही है। यहां तक कि कोर्ट ने रास्ते में चलने वाली कारों के भीतर के स्थान को भी सार्वजनिक स्थल घोषित दे दिया है और उसमें बैठने वाले शख्स को मास्क पहनना अनिवार्य हो गया है। लेकिन अगर कहीं छूट है तो वह रैलियां और धार्मिक जुलूसों में है। वहां न तो फिजिकल डिस्टेंसिंग की जरूरत है न ही मुंह में मास्क लगाने की। हरिद्वार का कुंभ उसका जीता-जागता उदाहरण है। जो इसी आजकल शुरू हो गया है। लेकिन सरकार ने उस पर रोक लगाने की कोई जरूरत नहीं समझी। पीएम मोदी से लेकर गृहमंत्री अमित शाह तक बगैर मास्क लगाए रैलियों को संबोधित करते देखे जा सकते हैं। 

बहरहाल मोदी सरकार को इस बात का श्रेय तो मिलना ही चाहिए कि अपने छह सालों के शासन में उन्होंने देश की जनता को यहां लाकर खड़ा कर दिया है कि अब वह सरकार से कोई अपेक्षा नहीं करती है। आत्मनिर्भरता का नारा रहा हो या फिर निजीकरण की आंधी सरकार के सभी प्रयासों ने जनता को इस मन:स्थिति में पहुंचा दिया है कि कुछ न मिलने पर भी वह सरकार से दुखी नहीं होगी। 

होना तो यह चाहिए था कि जब एक बीमारी से देश साल भर लड़ा और इस लड़ने की प्रक्रिया में ज़रूर उसने एक मॉडल खड़ा कर लिया होगा। लेकिन अगर दूसरी बार वही बीमारी बढ़ रही है और उससे लड़ने के बजाय सब कुछ समर्पण की स्थिति में पहुंच गयी है तब दो ही बातें हो सकती हैं या तो कोई मॉडल ही नहीं खड़ा किया गया या फिर सरकार उसे आगे बढ़ाना ही नहीं चाहती है। दरअसल इसमें दूसरी बात ज्यादा मौजूं लगती है जिसमें सरकार लोगों को अपने हाल पर छोड़ देना चाहती है। 

दरअसल पूरी महामारी के दौरान और उसके बाद भी जनता के प्रति सरकार का यही रवैया था। उस समय सरकार को सहायता से लेकर सुविधाओं तक में जितना सहयोग करना चाहिए था उसने नहीं किया। जबकि पश्चिम के पूंजीवादी देश यहां तक कि अमेरिका ट्रंम्प के समय और बाद में बाइडेन की सरकार के आने पर उसके द्वारा कई बिलियन डालर की सहायता का ऐलान किया गया। और उसका नतीजा यह रहा कि मध्यवर्गीय हिस्से तक के खातों में लाखों रुपयों के बराबर रकमें गयीं। लेकिन यहां किसी को फूटी कौड़ी भी नसीब नहीं हुई। और ऊपर से अब जबकि सरकार ने आपदा के समय मुहैया करायी गयी दूसरी चीजों से हाथ खींच लिया है तो हालात बद से बदतर हो गए हैं। 

दरअसल यह सरकार कोरोना को एक राजनीतिक हथियार के तौर पर देख रही है। इसके खात्मे में कभी उसका हित नहीं रहा। लिहाजा उसने कभी इसकी कोई इच्छाशक्ति दिखायी भी नहीं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि एक सरकार जिसे इस तरह किसी बीमारी से लड़ना चाहिए और एक भी मौत न हो इसकी गारंटी करनी चाहिए। इसकी जगह अगर वह खुद उसको बनाए रखने में रुचि दिखा रही है तो समझा जा सकता है कि यह किस स्तर का अपराध है। कोरोना के चलते इतने बड़े पैमाने पर होने वाली मौतों को अगर नरसंहार का नाम दिया जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। और अगर यह सरकार की गलतियों या फिर उसकी साजिशों या कहें उसको बनाए रखने के उसके राजनीतिक हितों का नतीजा है तो इस नरसंहार के दोषी सीधे-सीधे पीएम मोदी हैं। अमूमन तो लोकतंत्र में किसी सरकार को इस बात की सजा मिलती है कि उसने जरूरत के हिसाब से अपनी जिम्मेदारी नहीं निभायी। लेकिन अगर यह साबित हो जाए या फिर उसके संकेत भी हैं कि वह सरकार समस्या को बढ़ाने के लिए जिम्मेदार रही है तो फिर यह अपने किस्म का अपराध हो जाता है। और फिर यह बात कानूनी दायरे में आ जाती है। और इसकी सीधे-सीधे सजा बनती है। क्या इस दिशा में कोई पहल हो सकती है?

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