तेजपाल मामले में अदालत ने कहा- महिला के आरोपों के समर्थन में कोई सबूत मौजूद नहीं

तहलका के संस्थापक और संपादक तरुण तेजपाल को सहकर्मी से यौन उत्पीड़न के आरोपों से बरी करते हुए गोवा की सत्र अदालत की जज क्षमा जोशी ने कहा कि घटना का कोई मेडिकल प्रमाण नहीं है और शिकायतकर्ता की सच्चाई पर संदेह पैदा करने वाले तथ्य मौजूद हैं। गोवा सरकार ने इस निर्णय को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी है। रिकॉर्ड पर कोई मेडिकल प्रमाण नहीं है कि एफआईआर में देरी क्यों हुई और अभियोक्ता ने मेडिकल जांच के लिए मना कर दिया।

गोवा के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश क्षमा जोशी की अदालत ने पत्रकार तरुण तेजपाल को यौन उत्पीड़न के मामले में बरी करते हुए संदेह का लाभ दिया है और कहा है कि शिकायतकर्ता महिला द्वारा लगाए गए आरोपों के समर्थन में कोई सबूत मौजूद नहीं हैं। अदालत ने कहा कि रिकॉर्ड पर कई ऐसे तथ्य सामने आए हैं, जो अभियोक्ता की सच्चाई पर संदेह उत्पन्न करते हैं। अदालत ने यह भी कहा कि अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि वह लिफ्ट, जिसमें कथित तौर पर उत्पीड़न किया गया, बिना हर मंजिल पर इसके दरवाजे खुले बिना चल कैसे रही थी।

घटना के सात साल बाद दिसंबर 2020 में महिला से दोबारा पूछताछ हुई थी। कोर्ट के अनुसार तब अभियोक्ता अपनी पिछली कही बात से पूरी तरह मुकर गईं  कि आरोपी ने लिफ्ट को चलते रखने के लिए बटन दबाए थे और दावा किया कि उन्होंने बस आरोपी को लिफ्ट के पैनल के बटन दबाते देखा था लेकिन यह नहीं मालूम कि आरोपी ने कौन-सा एक बटन दबाया था। इससे इस बात को लेकर अस्पष्टता पैदा हुई कि लिफ्ट चल रही थी या रुकी हुई थी।

ट्रायल कोर्ट ने यह भी कहा कि अभियोक्ता की ओर से तेजपाल को होटल में उनकी लोकेशन, जहां वे अमेरिका के एक प्रतिष्ठित अभिनेता के साथ थी, के बारे में मैसेज किया जाना अस्वाभाविक था। अभियोक्ता ने अपनी शिकायत में कहा था कि 7 और 8 नवंबर 2013 की को होटल की लिफ्ट में तरुण तेजपाल ने उनका यौन उत्पीड़न किया। अदालत ने कहा कि अगर हाल ही में आरोपी ने अभियोक्ता का दोबारा यौन उत्पीड़न किया था और वह उनसे डरी हुई थीं और सही मनःस्थिति में नहीं थीं, तो उन्होंने आरोपी से संपर्क क्यों किया और उन्हें अपनी लोकेशन के बारे में जानकारी क्यों दी, जबकि वे अन्य महिलाओं से संपर्क कर सकती थी।

फैसले में कहा है कि गोवा पुलिस ने उस फाइव-स्टार होटल के पहले फ्लोर की सीसीटीवी फुटेज पेश नहीं की जिसमें तेजपाल पर कथित तौर पर एक महिला के साथ बलात्कार करने का आरोप लगा था। जांच अधिकारी ने मामले में कुछ सबूत जैसे ग्रैंड हयात के ब्लॉक 7 की पहली मंजिल के सीसीटीवी फुटेज के सबूतों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया। अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी ने सीएफएसएल से पहली मंजिल के गयाब सीसीटीवी फुटेज को पुनः प्राप्त करने का कोई प्रयास नहीं किया क्योंकि वह जानती थी कि यह पहले ही नष्ट किया जा चुका है।

अदालत ने कहा कि सीसीटीवी फुटेज से छेड़छाड़ की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी ने ग्राउंड, फर्स्ट और सेकेंड फ्लोर की सीसीटीवी फुटेज एक महिने की थी लेकिन कोर्ट के सामने पहले फ्लोर की फुटेज को पेश नहीं किया गया। यह जांच अधिकारी की बड़ी चूक है। अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी ने शिकायत दर्ज कराने वाली महिला के बयान का मिलान सीसीटीवी फुटेज से नहीं किया था, जो मामले का सबसे महत्वपूर्ण सबूत था।

फैसले में कहा गया है कि अभियोक्ता का अस्वाभाविक व्यवहार साक्ष्य अधिनियम की धारा 8 के तहत भी प्रासंगिक है। उन्होंने स्वीकार किया है कि आठ नवंबर 2013 को उनके फोन से आरोपी को दो एसएमएस भेजे गए और ये मैसेज उनके द्वारा किसी अन्य मैसेज की प्रतिक्रिया स्वरूप नहीं भेजे गए थे। अभियोक्ता का आरोपी के बिना पूछे उक्त मैसेज को भेजना और चंद मिनटों के अंतराल पर इसी मैसेज को तीन बार भेजना यह बात को स्पष्ट तौर पर स्थापित करता है कि उन्हें कोई ट्रॉमा नहीं था। नहीं ही वे इस बात से डरी हुई थीं कि आरोपी उन्हें ढूंढ लेगा। यह पूरी तरह अभियोजन के मामले को झुठला देता है कि इन मैसेज को करने के ठीक पहले आरोपी ने अभियोक्ता का दोबारा यौन शोषण किया था।

अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी (अपराध शाखा की अधिकारी सुनीता सावंत) ने आठ साल पुराने इस मामले में महत्वपूर्ण पहलुओं की जांच नहीं की। अदालत ने अभियोजन पक्ष के सीसीटीवी फुटेज के सबूत में गलती पाई और पाया कि जांच अधिकारी ने जानबूझकर अदालत से इमरजेंसी लाल बटन के वास्तविक काम के साक्ष्य को छुपाया था, क्योंकि यह अभियोक्ता के बयान और अभियोजन के मामले के विरोधाभास में था।

यौन उत्पीड़न की घटना के बाद पीड़िता के दहशत में आने के तर्क को भी अदालत ने खारिज कर दिया। अदालत ने कहा कि वॉट्सऐप संदेशों से पता चलता है कि कथित घटना के बाद भी महिला की तैयारी गोवा में स्टे करने की थी। वह मैगजीन की ओर से आयोजित ऑफिशियल इवेंट के बाद भी गोवा में रुकना चाहती थी। कोर्ट ने कहा कि पीड़िता की मां के बयान से यह साफ नहीं होता है कि वह घटना के बाद दहशत में थी। पीड़िता और उसकी मां ने घटना के बाद भी गोवा में स्टे करने के अपने प्लान को नहीं बदला था। यही नहीं जज ने कहा कि शिकायत में कई तरह के विरोधाभासी बयान भी दर्ज हैं।

मुकदमे के दौरान उठाए गए प्रमुख बिंदुओं में से, जिसमें क्या तेजपाल ने बलात्कार किया था, या सर्वाइवर की गरिमा भंग करने के लिए आपराधिक बल का इस्तेमाल किया था या क्या गलत तरीके से उसे लिफ्ट से बाहर निकलने से रोका, का अदालत ने नकारात्मक जवाब दिया। तेजपाल द्वारा 19 नवंबर 2013 को महिला को भेजे गए औपचारिक माफी वाले ईमेल, जिस पर अभियोजन का पक्ष टिका हुआ था, को लेकर अदालत ने कहा कि यह व्यक्तिगत माफी आरोपी ने अपनी इच्छा से नहीं भेजी थी बल्कि इसे अभियोजन की गवाह नंबर 45 (तहलका की तत्कालीन मैनेजिंग एडिटर) के दबाव और अभियोक्ता द्वारा उन्हें जल्द कार्रवाई के लिए धमकाने और अभियोजन की गवाह नंबर 45 को अभियोक्ता द्वारा किए गए वादे, जिसे आरोपी तक पहुंचाया गया था कि अगर आरोपी माफी मांग ले तो मामले को संस्थागत स्तर पर ही ख़त्म किया जाएगा, के चलते भेजी गई थी।

अदालत ने कहा कि इसलिए यहां तक कि यह मानते हुए कि व्यक्तिगत ईमेल अभियोक्ता को भेजा गया था, आरोपी का तर्क है कि ईमेल उनकी अनिच्छा से और उनकी मर्जी के विरुद्ध भेजा गया है, और यह भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 24 के तहत आरोपी के खिलाफ स्वीकार्य नहीं होगा। भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 24 कहती है कि आपराधिक कार्यवाही में ऐसे इकबालिया बयान के कोई मायने नहीं हैं जो प्रलोभन, धमकी या किसी वादे के चलते किए गए।

गोवा के जिला और सत्र न्यायालय, मापुसा ने 527 पन्नों के फैसले में कहा है कि पीड़िता के आरोपों को साबित करने के लिए कोई पुख्ता सबूत नहीं है। विशेष न्यायाधीश क्षमा जोशी ने 21 मई को तेजपाल को बरी कर दिया था। उन्होंने कहा कि रिकॉर्ड पर अन्य सबूतों पर विचार करते हुए आरोपी को बेनिफिट ऑफ डाउट (संदेह का लाभ) दिया जाता है, क्योंकि अभियोजन पक्ष के पास आरोपों का समर्थन करने वाला कोई सबूत नहीं है और अभियोजन पक्ष का बयान सुधार, विरोधाभास, चूक और संस्करणों के परिवर्तन को भी दर्शाता है, जो आत्मविश्वास को प्रेरित नहीं करता है। फैसले में कहा गया है कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि रेप का पीड़िता पर बेहद बुरा असर पड़ता है। इससे उसकी मानसिक स्थिति भी खराब हो जाती है। लेकिन दूसरी तरफ यह भी ध्यान रखना होगा कि गलत आरोप में कोई शख्स न फंस जाए।

तरुण तेजपाल पर 7 और 8 नवंबर 2013 को समाचार पत्रिका के आधिकारिक कार्यक्रम– थिंक-13 उत्सव के दौरान गोवा के बम्बोलिम में स्थित ग्रैंड हयात होटल के लिफ्ट के अंदर महिला की इच्छा के विरुद्ध जबरदस्ती करने का आरोप लगाया गया था। अदालत द्वारा नवंबर 2013 के इस मामले में 21 मई को सुनाए गए फैसले की प्रति मंगलवार 25 मई को उपलब्ध हुई है।

अदालत ने यह भी कहा कि मामले में एफआईआर दर्ज होने से पहले महिला द्वारा बड़े वकीलों, राष्ट्रीय महिला आयोग की एक सदस्य और पत्रकारों से संपर्क किया गया था। जज ने लिखा कि इन विशेषज्ञों की मदद से घटनाओं से छेड़छाड़ या घटनाओं को जोड़ने की संभावना है। आरोपी के वकील ने सही कहा है कि अभियोक्ता (पीड़ित) के बयान को इस एंगल से भी देखा जाना चाहिए।

इस बीच एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम में बॉम्बे हाईकोर्ट की अवकाश पीठ (गोवा) ने तरुण तेजपाल यौन उत्पीड़न मामले की सुनवाई कर रहे जिला एवं सत्र न्यायालय को अपनी वेबसाइट पर बरी करने के आदेश को अपलोड करते समय पीड़िता की पहचान के संदर्भों को संशोधित करने का निर्देश दिया है। न्यायमूर्ति एससी गुप्ते की एकल पीठ ने राज्य को 21 मई के बरी करने के आदेश के खिलाफ अपील के आधार को संशोधित करने के लिए 3 दिन का समय दिया है, जिसकी कॉपी 25 मई को उपलब्ध कराई गई थी।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने गुरुवार को सत्र न्यायालय के पूर्व तहलका संपादक, तरुण तेजपाल को बरी करने के फैसले में वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह के खिलाफ टिप्पणियों पर कड़ी आपत्ति जताई। बॉम्बे हाईकोर्ट के समक्ष राज्य द्वारा दायर अपील में गोवा राज्य की ओर से पेश हुए मेहता ने कहा कि निचली अदालत ने देखा था कि शिकायतकर्ता ने सलाह के लिए इंदिरा जयसिंह से संपर्क किया था। मेहता ने कहा, यौन शोषण की शिकार इस लड़की ने, जो पिता का मित्र है, सलाह के लिए इंदिरा जयसिंह के प्रख्यात वकील से संपर्क किया। अपने नामी वकील के पास जाना, मेरे हिसाब से यह सही था। मेहता ने आगे कहा कि निचली अदालत ने कहा कि कानूनी विशेषज्ञों की मदद से घटनाओं की हेराफेरी की गई।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

This post was last modified on May 28, 2021 2:49 pm

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