देशव्यापी प्रतिवाद के तहत माले का जगह-जगह धरना, नेताओं ने कहा- कोरोना-लाॅकडाउन की आड़ में देश बेच रही है सरकार

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पटना। राहत पैकेज के नाम पर देश के प्रवासी मजदूरों, किसानों, छात्र-नौजवानों, व्यवसायियों और अन्य कामकाजी हिस्से के साथ किए गए छलावे, क्वारंटाइन सेंटरों की अमानवीय स्थिति और सड़कों पर मजदूरों की लगातार हो रही दर्दनाक मौतों के लिए सरकार की अव्वल दर्जे की क्रूर व मजदूर विरोधी नीतियों के खिलाफ आज भाकपा-माले ने देशव्यापी प्रदर्शन किया। इसके तहत जगह-जगह धरना-प्रदर्शन आयोजित किए गए।

इस मौके पर बिहार राज्य सचिव काॅ. कुणाल ने कहा कि राहत पैकेज के नाम पर केंद्र सरकार ने देश के संसाधनों को बेचने के पैकेज की घोषणा की है। कोरोना व लाॅकडाउन के नाम पर एक ओर मजदूरों को मरने-खपने के लिए छोड़ दिया गया है और दूसरी ओर हरेक क्षेत्र में प्राइवेटाइजेशन को बढ़ावा देकर हमारे अधिकारों पर हमला किया जा रहा है।

विधायक महबूब आलम ने कहा कि मजदूरों की इस दुर्दशा के लिए देश मोदी को कभी माफ नहीं करेगा। बिहार में चल रहे क्वारंटाइन सेंटर यातना गृह में तब्दील हो गए हैं। इस प्रकार के जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। ये सेंटर धीरे-धीरे लूट के अड्डे बनते जा रहे हैं। सरकार के दावों के विपरीत अब तक कई लोगों की मौत इन सेंटरों में हो चुकी है। भूख का दायरा भी बढ़ता जा रहा है। राज्य के बाहर कई दूरस्थ स्थानों पर मजदूर फंसे हुए हैं, सरकार उनकी बात भी नहीं सुनती। हम लगातार ज्ञापन दे रहे हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हो रही है।

आज के प्रदर्शन में तीन बिंदुओं को प्रमुखता से उठाया गया।

अपने 12 मई के संबोधन में प्रधानमंत्री ने कोरोना संकट को अवसर में बदल देने का आह्वान किया था। मोदी के उस आह्वान की हकीकत अब सामने आ रही है। पिछले चार दिनों से वित्तमंत्री द्वारा जारी किए जा रहे विभिन्न सेक्शनों के लिए आर्थिक पैकेज छलावा के अलावा कुछ नहीं है। विभिन्न प्रकार के संकटों से जूझ रहे प्रवासी मजदूरों व अन्य कामकाजी तबके को सरकार ने गहरा झटका दिया है। बात तो सरकार राहत पैकेज की करती है लेकिन काम वह कुछ और ही कर रही है।

‘आत्मनिर्भर भारत’ के नारे का मतलब निजीकरण की प्रक्रिया को खुलकर बढ़ावा देना और सभी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का गला घोंट देना है। डिफेंस में एफडीआई बढ़ाकर 74 प्रतिशत कर दिया गया है और कोल माइनिंग में लागू करने की मंजूरी मिल चुकी है। एयरपोर्ट्स बेचे जाने के निर्णय हो चुके हैं और ये सारी चीजें राहत पैकेज के नाम पर की जा रही हैं।

‘आत्मनिर्भर भारत’ के इस अभियान में न जाने कितने मजदूरों की और जान जाएगी! अब तक 100 से अधिक प्रवासी मजदूर बेमौत मार दिए गए हैं। लाखों प्रवासी मजदूर अभी भी लगातार पैदल चल रहे हैं, लेकिन लगता है कि सरकारें अपनी जिम्मेवारियों से पूरी तरह मुक्त हो चुकी हैं। प्रवासी मजदूरों की हो रही दर्दनाक मौतों को देश कभी नहीं भूलेगा और न ही मौतों के इस अंतहीन सिलसिले की परिस्थितियां पैदा करने वाली क्रूर व तानाशाह मोदी सरकार को।

देश के अन्य हिस्सों की तरह बिहार के भी क्वारंटाइन सेंटर किसी यातनागृह से कम नहीं हैं। भारी कुव्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही के कारण अब तक कम से कम 3 लोगों की मौत बिहार के विभिन्न क्वारंटाइन सेंटर में हो चुकी है। इन सेंटरों में भेड़-बकरियों की तरह लोगों को ठूंस दिया गया है। क्षमता से बहुत अधिक संख्या में लोगों को रखा जा रहा है। न तो ठीक से भोजन की व्यवस्था है और न ही सोने की। यहां तक कि पीने के पानी के लिए भी लोगों को काफी मशक्कत करना पड़ता है।

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भाकपा-माले केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा जारी इन छलावों के खिलाफ ग्रामीण मजदूरों, किसानों, लघु उद्यमियों और अन्य कामकाजी तबके के लिए तत्काल राहत उपलब्ध करवाने, सभी को तत्काल 10 हजार रुपया लाॅकडाउन भत्ता देने, मनरेगा में 200 दिन काम व 500 रुपये न्यूनतम मजदूरी देने, सभी लोगों के लिए रोजगार उपलब्ध करवाने, किसानों के सभी प्रकार के कर्जे को माफ करने, किसानों को फसल क्षति का मुआवजा देने तथा लाॅकडाउन के कारण मारे गए सभी मजदूर परिजनों को 20-20 लाख रुपये मुआवजे की राशि तत्काल देने की मांग करती है।

राजधानी पटना में राज्य कार्यालय के साथ-साथ चितकोहरा, राजेन्द्रनगर, आशियाना नगर, पटना सिटी, कुर्जी, मंदिरी आदि इलाकों में शारीरिक दूरी का ख्याल रखते हुए माले कार्यकर्ताओं ने प्रतिरोध किया। पटना के अलावा आरा, जहानाबाद, सिवान, रोहतास, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, भागलपुर, पूर्णिया, गया, अरवल, बेतिया, समस्तीपुर, बेगूसराय, खगड़िया, नवादा, बिहारशरीफ आदि जिला केंद्रों, प्रखंड केंद्रों और गांवों में भी धरना दिया गया।

राज्य कार्यालय में भाकपा-माले राज्य सचिव कुणाल, भाकपा-माले विधायक दल के नेता महबूब आलम, ऐपवा की बिहार राज्य अध्यक्ष सरोज चौबे और अपने आवास पर किसाना महासभा के महासचिव का. राजाराम सिंह, वरिष्ठ माले नेता केडी यादव ने धरना दिया।

इस मौक़े पर यूपी के विभिन्न स्थानों पर भी धरने और प्रदर्शन हुए। इस मौक़े पर वक्ताओं ने कहा कि मोदी सरकार ने करोड़ों प्रवासी मजदूरों को एक तरह से उनके हाल पर ही छोड़ दिया है। लॉकडाउन में घर लौटने के जटिल नियमों और साधनों के अभाव में उन्हें सैकड़ों मील की यात्रा पर पैदल ही निकलने के लिए विवश होना पड़ा है। जगह-जगह पुलिस उनपर डंडे बरसा रही है। इस दौरान असुरक्षित यात्रा, दुर्घटना भूख-प्यास व थकावट से सैकड़ों मजदूरों की जानें चली गईं और मौतें अभी भी जारी हैं। इसका जिम्मेदार कौन है? क्या ‘आत्मनिर्भर भारत’ मजदूरों की जानें लेकर बनेगा?

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राजधानी लखनऊ में गोमती नगर विस्तार, हरदासी खेड़ा, मुंशीखेड़ा, तकरोही, आशियाना व बीकेटी के मामपुर गांव में धरना दिया गया। लखनऊ के अलावा, सीतापुर, लखीमपुर खीरी, अयोध्या (फैजाबाद), इलाहाबाद, मिर्जापुर, चंदौली, वाराणसी, गाजीपुर, आजमगढ़, मऊ, गोरखपुर, देवरिया, कानपुर, जालौन, मुरादाबाद, मथुरा आदि जिलों में भी धरने हुए। राज्य सचिव सुधाकर यादव ने भदोही में धरना दिया

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