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Wednesday, August 4, 2021

खास रिपोर्ट: आदिवासियों पर सीआरपीएफ के जुल्म की इन्तहा, लेकिन झारखंड सरकार मानने को तैयार नहीं

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झारखंड में महागठबंधन (झामुमो, कांग्रेस व राजद) की सरकार है और मुख्यमंत्री हैं झामुमो के हेमंत सोरेन। इस सरकार के एक साल पूरे हो चुके हैं, लेकिन एक आदिवासी मुख्यमंत्री के शासनकाल में भी आदिवासियों पर सीआरपीएफ का जुल्म बदस्तूर जारी है। झारखंड के कई स्कूलों व अस्पतालों में सीआरपीएफ के कैंप हैं, जो ग्रामीण आदिवासियों के लिए खौफ का दूसरा नाम हैं। झारखंड में सैकड़ों सीआरपीएफ कैंप व थाना रहने के बावजूद भी हेमंत सोरेन नये-नये सीआरपीएफ कैंप खोलने की अनुमति दे रहे हैं, जिसके विरोध में ग्रामीणों ने कई आंदोलन भी किये हैं। जब हेमंत सोरेन विपक्ष में थे, तो ये भी कहते थे कि सीआरपीएफ आदिवासियों का उत्पीड़न करती है, इसलिए यहां इतने अधिक सीआरपीएफ कैंप की जरूरत नहीं है, लेकिन सरकार में आते ही अपनी बात से मुकर गये।

झारखंड में सीआरपीएफ कैसे ग्रामीण आदिवासियों का उत्पीड़न करती है और जब ग्रामीण इसकी प्राथमिकी थाना में दर्ज कराते हैं, तो कैसे उनका बयान बदल दिया जाता है और उच्च न्यायालय में किस तरह से झारखंड सरकार सीआरपीएफ को दोषमुक्त करार देती है, यह सब जानने के लिए आपको नीचे भी जरूर पढ़ना चाहिए।

15 जून, 2020 को सीआरपीएफ के जवानों ने चिरियाबेड़ा ग्राम (अंजेड़बेड़ा राजस्व गांव, खूंटपानी प्रखंड, पश्चिमी सिंहभूम, झारखंड) के लगभग 20 आदिवासियों को नक्सल सर्च अभियान के दौरान बेरहमी से पीटा था, जिनमें से 11 को बुरी तरह से पीटा गया था एवं इनमें से 3 को गंभीर चोटें आयी थीं। हालांकि पीड़ितों ने अस्पताल में पुलिस को अपने बयान में स्पष्ट रूप से बताया था कि सीआरपीएफ ने उन्हें पीटा था, लेकिन पुलिस द्वारा दर्ज प्राथमिकी में कई तथ्यों को नजरअंदाज किया गया है और हिंसा में सीआरपीएफ की भूमिका का कोई उल्लेख नहीं है। यहां तक कि 17 जून को कई स्थानीय अखबारों में यह खबर छपी कि माओवादियों ने ग्रामीण आदिवासियों को बेरहमी से पीटा। (उस समय इस लेखक की इस घटना से संबंधित एक रिपोर्ट भी कई वेबपोर्टल पर प्रकाशित हुई थी)

इस घटना के बाद झारखंड जनाधिकार महासभा समेत कई जन संगठनों द्वारा तथ्यान्वेषण किया गया था, जिसमें पाया गया था कि सीआरपीएफ के जवानों ने ग्रामीण आदिवासियों को डंडों, बैटन, राइफल के बट और बूटों द्वारा बुरी तरह पीटा था। ‘हो’ आदिवासियों द्वारा ‘हो’ भाषा में बात रखने के कारण और हिन्दी बोलने में असमर्थता के कारण भी उन्हें पीटा गया। गुना गोप नाम के पीड़ित का मारकर पैर तोड़ दिया गया था। अन्य पीड़ित भी बुरी तरह जख्मी हुए थे। साथ ही, एक ग्रामीण के घर को तहस-नहस किया गया, खतियान, आधार आदि को जला दिया गया और घर में रखे पैसों की चोरी की गयी। पुलिस ने अस्पताल में पीड़ितों पर दवाब भी दिया था कि वे सीआरपीएफ के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज न करवाएं और हिंसा में उनकी भूमिका का उल्ल्ेख न करें।

तथ्यान्वेष टीम ने इस बावत संवाददाता सम्मेलन में अपनी पूरी रिपोर्ट रखी थी और पश्चिमी सिंहभूम जिला के उपायुक्त, पुलिस अधीक्षक व झारखंड के पुलिस महानिदेशक से मिलकर पूरी घटना व प्राथमिकी में गलत बयान दर्ज करने के बारे में विस्तृत जानकारी देते हुए त्वरित कार्रवाई की मांग भी की थी, लेकिन उस समय सांत्वना तो जरूर मिला, पर कोई कार्रवाई नहीं हुई।

अंततः प्राथमिकी में सीआरपीएफ द्वारा ग्रामीण आदिवासियों पर किये गये हिंसा का उल्लेख नहीं रहने के विरोध में पीड़ित द्वारा 10 सितम्बर, 2020 को उच्च न्यायालय, रांची में एक ‘जनहित याचिका’ दायर की गयी। ‘जनहित याचिका’ में पीड़ितों ने स्पष्ट रूप से सीआरपीएफ द्वारा किये गये हिंसा का विवरण दिया था व प्राथमिकी में गलत बयान दर्ज होने की बात की थी। साथ ही, पीड़ितों ने सही प्राथमिकी दर्ज करने, दोषी सीआरपीएफ के विरूद्ध कार्रवाई करने व पीड़ितों को मुआवजा देने की मांग की थी। झारखंड सरकार ने 27 नवंबर, 2020 को ‘रिट’ के विरूद्ध जवाब दायर किया, जिसमें झारखंड सरकार की तरफ से कहा गयाः-

‘‘एफआईआर में दर्ज बयान सही है और पीड़ित द्वारा सीआरपीएफ का जिक्र नहीं किया गया था एवं अनुसंधान के दौरान पुलिस गांव जाकर कई पीड़ितों का धारा 161 अंतर्गत बयान दर्ज की और किसी भी पीड़ित ने सीआरपीएफ द्वारा हिंसा का जिक्र नहीं किया।’’

डंडा जिससे मारा गया।

झारखंड सरकार के इस जवाब के विषय में जानकारी मिलते ही पीड़ितों ने 10 जनवरी, 2021 को अनुसंधान पदाधिकारी (पुलिस अधीक्षक, सरकारी अभियोजक एवं संबंधित मजिस्ट्रेट) को एक पत्र लिखा है, जिसमें तीन पीड़ितों (बमिया सुरीन, गुना गोप व माधो कायम) ने झारखंड सरकार के झूठ का पर्दाफाश करते हुए फिर से घटना का विवरण दिया है।

6 पीड़ितों व गवाहों (माधो कायम, सिनु सुन्डी, गुरूचरण पुरती, सिदिउ जोजो, बामिया सुरीन एवं गुना गोप) द्वारा लिखित पत्र में कहा गया है कि ‘‘हम सभी चिरियाबेड़ा टोला के निवासी हैं तथा गोइलकेरा कांड संख्या 20/2020 के गवाह एवं पीड़ित भी हैं। दिनांक 15 जून 2020 को हमारे टोला में सीआरपीएफ के जवानों द्वारा गांव के निर्दोष ग्रामीणों को मारा-पीटा गया था, जिसमें एक व्यक्ति का पैर भी टूट गया था, जिसका सही-सही एफआईआर भी आज तक दर्ज नहीं किया गया। एफआईआर में गलत बयान दर्ज किया गया है, जैसा बयान दिया था, वैसा बयान नहीं दर्ज किया गया है, जिसके लिए बमिया सुरीन ने माननीय झारखंड उच्च न्यायालय में एक याचिका (जनहित याचिका (आपराधिक) संख्या- 191/2020) दाखिल किया था।

सरकार की तरफ से इस याचिका में एक जवाब दाखिल किया गया, जिसमें कहा गया कि गांव के बमिया सुरीन एवं अन्य पीड़ितों का बयान 161 दंड प्रक्रिया संहिता के अनुसार दर्ज किया गया है जबकि हम सबों का कहना है कि अनुसंधानकर्ता ना तो आज तक हमारे गांव आए हैं और ना ही हम ग्रामीणों से मिले हैं। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि अनुसंधानकर्ता के द्वारा थाने में ही बैठकर खुद से डायरी लिखी जा रही है। अनुसंधानकर्ता के द्वारा वास्तविकता में आज तक हम सभी ग्रामीणों का बयान दर्ज नहीं किया गया है।’’

इसी पत्र के माध्यम से बमिया सुरीन ने अपना बयान दिया है कि ‘‘15 जून 2020 को बोंज सुरीन के घर की छत का मरम्मत हो रहा था, जिसमें गांव के अन्य लोगों के साथ मैं भी मदद करने गया था। उस समय हमलोग लगभग 30 से 35 लोग थे। लगभग दिन के 12 से 1 बजे के बीच कुछ सीआरपीएफ (लगभग 200) के जवान वहां पर आये। उनके साथ एक बड़ा कुत्ता भी था, वॉकी-टॉकी लिए हुए थे, उनके ड्रेस में नेमप्लेट भी था और वे सभी लम्बे-चौड़े थे। हम लोगों को नीचे उतरने के लिए बोला, जिस पर हम सभी नीचे उतर गये। नीचे उतरने के बाद मुझे और 7-8 लोगों को वहीं पर बैठाया, जिसमें मैं, गुना गोप, बोंज सुरीन, डोमके तामसाय, सुलुप गोप एवं अन्य थे और बाकी लोगों को अलग-अलग कर अलग-अलग जगह कुछ-कुछ दूरी पर ले गये।

हम जो 7-8 अन्य लोगों के साथ बैठे थे, उनसे सीआरपीएफ के जवानों ने पूछा कि नक्सली सब कहां है? तभी हम लोग अपनी भाषा (हो) में बोले कि मुझे नहीं पता है। इस पर सीआरपीएफ के लोगों ने बोला कि हिन्दी में बोलो। हम सभी को हिन्दी बोलना नहीं आता है, इसलिए हम हिन्दी में जवाब नहीं दे पाये। तभी सीआरपीएफ के जवान हम सभी को लात-मुक्का, लाठी-डंडा, बंदूक का बट और जूता पहने हुए पैर से मारने लगे।

तभी दो जवानों ने मुझे पकड़कर दोनों हाथों को खींचकर पकड़ लिया और एक जवान मुझे डंडा और बंदूक के बट से मेरी पीठ, सीना (छाती), पैर और जांघ में पीटने लगा। जब तक नहीं गिरे, तब तक पीटते रहे। जब जमीन पर गिर गये, तो तीनों जवान जूते से पीठ में लात मारने लगे। इसी बीच मैं बेहोश हो गया। कुछ देर बाद जब मैं होश में आया, तो 2 सीआरपीएफ के जवान मुझे और अन्य लोगों को पकड़कर उठाए और मेरे दोनों हाथों को पीछे रस्सी से बांध दिया और फिर हमको उठाकर वहां से गांव के पास के नदी के पास ले गए। नदी के पास ले जाकर सीआरपीएफ के लोग पूछने लगे कि माओवादी कहां रहते हैं? तो मैंने जवाब दिया कि हम नहीं जानते हैं, इस पर सीआरपीएफ के जवानों ने कहा कि नहीं बताओगे, तो तुझे जेल ले जाएंगे। हम बोले कि नहीं जानते हैं, तो सीआरपीएफ के लोग बोले कि बताओगे तो यहीं छोड़ देंगे। इसके बाद मेरी रस्सी खोल दिए और मुझे एक बिस्कुट का पैकेट और एक टेबलेट (दवाई) दिए कि इसे घर में ले जाकर खाओ। इसके बाद सीआरपीएफ के लोग चले गये।

दर्द के कारण मैं घर नहीं जा पाया, तब गांव वालों की मदद से मुझे साइकिल से घर ले जाया गया। सीआरपीएफ के द्वारा मारे जाने के कारण मेरे पैर, जांघ, छाती और पीठ से खून निकलने लगा था। सीआरपीएफ के द्वारा गांव के लगभग 13 लोगों को मारा गया, जिसमें से 9 लोग (मैं, गुना गोप, माधो कायम, गनौर तामसाय (महिला), गुरूचरण पुरती, सिदिउ जोजो, सिनु सुंडी, बमिया बाहन्दा, सिंगा पुरती) बुरी तरह से जख्मी हो गये थे, इसमें से एक व्यक्ति गुना गोप का पैर टूट गया था, जिसमें से तीन (बमिया सुरीन, गुना गोप व माधो कायम) व्यक्ति को अस्पताल में एडमिट करना पड़ा।

रात भर दर्द से काफी परेशान रहा, अस्पताल बहुत दूर होने और रात होने के कारण कोई साधन भी नहीं था, इसलिए रात में अस्पताल नहीं जा पाये। गांव वालों की मदद से अगले दिन 16 जून 2020 को किसी तरह गाड़ी की व्यवस्था हुई और हम सबों को अस्पताल लेकर गये। एफआईआर में गलत बयान दर्ज किया गया है। मैंने जैसा बयान दिया था, वैसा बयान नहीं दर्ज किया गया है।’’

इसी पत्र में गुना गोन ने भी तकरीबन यही बयान दिया है। उन्होंने बताया कि 3 सीआरपीएफ के जवान मुझे पकड़कर बमिया सुरीन के घर की तरफ धकेल कर ले गये। वहां से 2 सीआरपीएफ के जवान साइड में चले गये और एक जवान मेरे साथ बैठा रहा। सीआरपीएफ के जवान ने पूछा कि आपको हिन्दी आती है? तो मैंने ‘हो’ में जवाब दिया कि मुझे हिन्दी नहीं आती है, मैं पढ़ा-लिखा भी नहीं हूं। फिर वो पूछने लगा कि माओवादी सब को देखे हैं? तब मैं जवाब दिया कि मैं उन्हें नहीं पहचानता हूं। चूंकि मेरा बायां हाथ और चेहरा (बायीं तरफ) बचपन में ही जल गया था, जिसे देखकर बोलने लगा कि यह गोली बनाते समय लगा है। जब मैं बोला कि नहीं मेरा हाथ बचपन में ही जला था, आप मेरी मां से पूछ सकते हैं। तभी मेरे बगल में बैठा जवान पास खड़े जवान को मारने को कहा, जिस पर पास खड़े जवान मुझे बंदूक के बट से मारने लगा और तीनों जवान आकर मुझे डंडे से पीटने लगे। पीटने के क्रम में मेरे हाथ में डंडे की कांटी घुस गयी, दाहिने पैर की हड्डी टूट गयी, पेट में भी बहुत मारा। मारते-मारते बेहोश कर दिया। जब होश में आये तो सीआरपीएफ के जवान मुझे वहीं घसीटने लगे और फिर मुझे वहीं छोड़कर चले गये।

दर्द के कारण मैं घर नहीं जा पाया, तब गांव वालों की मदद से मुझे खटिया से ढोकर घर ले जाया गया। सीआरपीएफ के द्वारा मारे जाने के कारण मेरे पैर, जांघ, छाती और पीठ से खून निकलने लगा था। सीआरपीएफ के द्वारा गांव के लगभग 13 लोगों को मारा गया, जिसमें से 9 लोग (मैं, बमिया सुरीन, माधो कायम, गनौर तामसाय (महिला), गुरूचरण पुरती, सिदिउ जोजो, सिनु सुंडी, बमिया बाहन्दा, सिंगा पुरती) बुरी तरह से जख्मी हो गये थे, इसमें से तीन (बमिया सुरीन, गुना गोप व माधो कायम) व्यक्ति को अस्पताल में एडमिट करना पड़ा।

उन्होंने कहा कि एफआईआर में बमिया सुरीन का गलत बयान दर्ज किया गया है, उसने जैसा बयान दिया था, वैसा बयान दर्ज नहीं किया गया है। चूंकि हम लोगों को हिन्दी बोलने व पढ़ने नहीं आती है, इसलिए एफआईआर में क्या लिखा था, हम पढ़ नहीं पाये और जो लिखा था वो भी सही-सही पढ़कर नहीं सुनाया गया। जब कोर्ट से एफआईआर की कॉपी निकाली गयी और मुझे पढ़कर सुनाया गया, तो मैंने पाया कि एफआईआर गलत लिखा गया है।’’

इसी पत्र में माधो कायम ने अपना बयान देते हुए कहा है एक सीआरपीएफ के जवान ने मुझे इशारा करके बुलाया, जब मैं गया तो मुझे वहां से थोड़ी दूर पर ले गया और रास्ते में एक डंडा उठाया और डंडा दिखाकर बोला कि चलो। आगे कुछ दूर जाने पर मुझे हिन्दी बोलने के लिए बोला, तो मैं नहीं जवाब दे पाया। तब पूछने लगा कि नक्सली कहां रहते हैं? मैंने बोला कि मुझे नहीं पता है। इतने में मुझे डंडा से मेरी कमर व जांघ पर मारने लगा। दर्द के कारण मैं छटपटाने लगा, तो और दूसरे जवान को बुलाया। तब दूसरे जवान ने मुझे पकड़ लिया और एक जवान पीटने लगा। इसी बीच एक और जवान आया और सबने मिलकर मुझे पीटा। मारते-मारते जब डंडा टूट गया, तब बंदूक के बट से मारने लगे। मुक्का से मेरी नाक में भी मारा, जिससे नाक से खून निकलने लगा। पिटायी से मेरी पीठ, कमर, जांघ, पैर, गाल, नाक आदि से खून निकलने लगा था और मैं बेहोशी की स्थिति में पहुंच गया। तब मुझे बमिया सुरीन के गाय के घर की तरफ ले जाकर सुला दिया गया। उसी समय गुरुचरण पुरती को खींचकर लाकर तख्ता (लकड़ी का) पर पेट के बल सुला कर वहीं पर पड़े टूटे खटिया के पांव से मारा जाने लगा।

इसके बाद मुझे, बमिया सुरीन और गुरूचरण को धकेलते हुए पास की नदी के पास ले जाया गया। नदी के पास पहले से सिनु सुंडी एवं सिदिउ जोजो थे, उन्हीं के पास हम तीनों को बैठा दिया। वहां मुझे एक बिस्कुट का पैकेट और एक टेबलेट (दवाई) दिया कि इसे घर में ले जाकर खाओ। इसके बाद सीआरपीएफ के लोग चले गये। दर्द के कारण मैं घर नहीं जा पा रहा था, पर किसी तरह धीरे-धीरे गया।

(स्वतंत्र पत्रकार रूपेश कुमार सिंह की झारखंड से रिपोर्ट)

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