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अभिव्यक्ति की आजादी को कुचलने के लिए सरकार कर रही है ईडी का इस्तेमाल: सांस्कृतिक संगठन

(कल वेबपोर्टल न्यूज़क्लिक के दफ्तर और उसके निदेशक के घर पर हुए ईडी के छापे पर पूरे देश में तीखी प्रतिक्रिया हुई है। सभी ने इसे न केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला करार दिया है बल्कि एक सुर में कहा है कि जो कुछ मीडिया संस्थान अभी भी सत्ता के खिलाफ बोल रहे हैं या फिर सत्य को उद्घाटित करने का काम कर रहे हैं सरकार उनका मुंह बंद कर देना चाहती है। मौजूदा छापा उसी का हिस्सा है। तमाम सांस्कृतिक संगठनों ने बयान जारी कर सरकार के इस लोकतंत्र विरोधी पहल की कड़ी मजम्मत की है। पेश है उनका पूरा बयान-संपादक)

प्रवर्तन निदेशालय द्वारा 09/02/2021 को स्वतंत्र मीडिया पोर्टल ‘न्यूज़क्लिक’ के दफ़्तर पर तथा उसके स्वत्वाधिकारी, निदेशकों और सम्बद्ध पत्रकारों के घरों पर छापे डालना बेबाक पत्रकारिता का दमन करने की कोशिशों की सबसे ताज़ा कड़ी है। मोदी सरकार शुरुआत से ही सच का साथ देने वाले पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को निशाने पर लेती आई है। प्रवर्तन निदेशालय, आयकर विभाग, पुलिस—इन सभी महकमों का इस्तेमाल निडर मीडिया को डराने-धमकाने और ग़लत मामलों में फँसाने में किया जाता रहा है। सीएए विरोधी आंदोलन और किसान आंदोलन के साथ इस तरह की दमनकारी हरकतों में और तेज़ी आई है। ज़्यादा दिन नहीं हुए, अपनी आलोचनात्मक धार के लिए सुपरिचित छह पत्रकारों पर राष्ट्रद्रोह के आरोप के साथ एफआईआर दर्ज की गई थी। सिंघु बॉर्डर से पत्रकारों की गिरफ़्तारियाँ भी हुईं। कश्मीर में पत्रकारों का उत्पीड़न लगातार जारी है और उत्तर प्रदेश में हाथरस मामले की रिपोर्टिंग करते पत्रकारों को फ़र्ज़ी आरोपों के तहत गिरफ़्तार किए जाने की घटना भी अभी पुरानी नहीं पड़ी है।

‘न्यूज़क्लिक’ एक ऐसा मीडिया पोर्टल है जो इस सरकारी दहशत के माहौल में निर्भीकता से सच को लोगों तक पहुँचाता रहा है। सरकार की गोद में बैठकर लोकतंत्र की जड़ें खोदने वाले मीडिया संस्थानों के मुक़ाबले ‘न्यूज़क्लिक’ मीडिया जगत के उस छोटे हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है जिस पर भारतीय लोकतंत्र की उम्मीदें क़ायम हैं। उसके खिलाफ़ यह जाँच सरकार द्वारा उत्पीड़न की जानी-पहचानी चाल के निर्लज्ज इस्तेमाल का नमूना है।

हम अभिव्यक्ति की आज़ादी को कुचलने के लिए प्रवर्तन निदेशालय के इस्तेमाल की निंदा करते हैं और ज़ोर देकर कहना चाहते हैं कि प्रवर्तन निदेशालय को अपना काम ज़रूर करना चाहिए, पर जाँच को उत्पीड़न का हथियार बनाना हर तरह से निंदनीय है।

जारीकर्त्ता:

जन संस्कृति मंच | दलित लेखक संघ | प्रगतिशील लेखक संघ | इप्टा | प्रतिरोध का सिनेमा | न्यू सोशलिस्ट इनीशिएटिव | जनवादी लेखक संघ

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This post was last modified on February 10, 2021 11:49 am

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