दलितों को आशंका है कि संविधान बदला जा सकता है

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देश के विभिन्न क्षेत्रों में रहने वाले दलित महसूस करते हैं कि 2024 के लोकसभा के चुनाव के बाद संविधान में परिवर्तन का प्रयास किया जा सकता है। वे यह भी महसूस करते हैं कि ऐसा न हो सके इसलिए दलितों को स्वयं को एक सूत्र में बांधना चाहिए। अभी हाल में बड़ी संख्या में दलित उस स्थान पर एकत्रित हुये थे जिसे चैत्याभूमि के नाम से जाना जाता है। यह वह स्थान है जहां बाबासाहेब अम्बेडकर का 1956 में मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार किया गया था। इसी स्थान पर एक 15 साल का बालक वहां बने एक किताब के स्टॉल से संविधान की एक प्रति खरीदता है। महाराष्ट्र में विवाह और जन्म उत्सव के दौरान संविधान की प्रति उपहार के रूप में भेंट करना लोकप्रिय हो रहा है। बालक के साथ उसके पिता भी थे। वे कहते हैं कि इस समय जारी बहस के कारण संविधान के प्रति आम लोगों में उत्सुकता बढ़ी है। वे यह स्वीकार करते हैं कि जिस संविधान को खतरा है यह महसूस किया जा रहा है उस संविधान में परिवर्तन करना इतना सरल है? क्या परिवर्तन को उचित ठहराना संभव है?

वे सत्ताधारी दल (भाजपा) द्वारा इस संबंध में जारी अभियान का उल्लेख करते हैं। वहीं विरोधी दल बार-बार यह कह रहे हैं कि संविधान बदला जायेगा। इस बहस के बीच दलित पूरी मुस्तैदी से संविधान की रक्षा के लिये एकजुट हो रहे हैं। वे डॉ. अम्बेडकर के प्रति अपनी आस्था का जोरदार ढंग से प्रगट कर रहे हें। वे इस बात को जानते हैं कि डॉ. अम्बेडकर ने दलितों को पहचान दी है। एक बुक स्टॉल के संचालक जिन्होंने अपने पिता से इसे पाया है कहते हैं कि संविधान हमारे देश के लोकतंत्र की आत्मा है। उसे शंका है कि जो संविधान के प्रभाव का कम करना चाहते हैं वे वास्तव में मनुस्मृति के माध्यम से समाज को हजारों वर्ष पीछे करना चाहते हैं।

एक तरफ यह बहस जारी है वहीं दूसरी ओर दलितों पर अत्याचारों में बढ़ोतरी हो रही है। उन अत्याचारों का सामना करने के लिये संगठित नेतृत्व का भारी अभाव है।

प्रसिद्ध लेखक अर्जुन डांगले कहते हैं कि भीतर ही भीतर दलितों में भाजपा के विरूद्ध भारी गुस्सा है। न सिर्फ गुस्सा है वरन् यह भावना जोर पकड़ रही है कि उनके साथ धोखा किया गया है। मुंबई के रामबाई नगर में दलितों को संगठित करने के लिये प्रचार किया जा रहा है। प्रचार के दौरान यह कहा जा रहा है कि अम्बेडकर हमारे लिये सब कुछ हैं। हम उनके द्वारा निर्मित संविधान पर किसी तरह का समझौता नहीं कर सकते। मुझे पूरा भरोसा है कि 2024 के चुनाव के बाद दलित अपने अधिकारों के लिए एक होंगे। भले ही हमारा कोई नेता हो या नहीं, दलित आंदोलन कभी एक नेता का पिछलग्गू नहीं रहता।

आम दलित यह महसूस करता है कि जब उस पर अत्याचार होता है तो उच्च जाति के लोग कम ही उसकी भर्त्सना करते हैं। अमरीका में यदि किसी नीग्रो पर जुल्म होता है तो बड़ी संख्या में वहां के गोरे उसका विरोध करते हैं। रैली निकालते हैं, जुलूस निकालते हैं। परन्तु हमारे देश में जब भी कोई दलित दबंगों की ज्यादतियों का शिकार होता है तो उच्च जाति के लोग मौन होकर देखते रहते हैं। मेरा स्वयं ऐसा अनुभव है। मैंने अपने अनेक साथियों के साथ दलितों पर हुये अत्याचारों का विरोध किया है और इस काम में राजनीतिक पार्टियों का सहयोग मांगा। मुझे कम ही मामलों में समर्थन मिला है। इस तरह के मामलों में भाजपा और कांग्रेस का रवैया लगभग एक सा ही रहता है। यहां मैं अभी हाल में घटित एक घटना का उल्लेख करना चाहूंगा।

यह घटना मध्यप्रदेश की है। अशोक जिले के एक गांव में एक वृद्ध दलित दंपत्ति को खंभे से बांधकर लगातार पीटा गया। जूतों का हार बनाकर पहनाया गया। गांव में दबंगों की युवती के साथ छेड़छाड़ की गई। दबंगों को संदेह था कि इस काम में इस वृद्ध दंपत्ति के बेटे का हाथ है। यह घटना कुछ महीने पहले की थी। संदेह के आधार पर दबंगों ने दम्पत्ति पर हमला किया। उन्हें तरह-तरह के तरीकों से सताया जाने लगा। इससे परेशान होकर वृद्ध दंपत्ति अपने पूरे परिवार के साथ गांव छोड़कर चला गया। कुछ समय बीतने के बाद वृद्ध दंपत्ति वापस आ गया। यह पता लगने के बाद लड़की के परिवार वालों ने उस 65 वर्ष के वृद्ध और उसकी 60 वर्षीय पत्नी को एक खंभे से बांधा और लगातार उनकी पिटाई की और जूतों का हार पहनाया गया।

पत्रकारों से बात करते हुए वृद्ध ने बताया कि जब हम वापस आये तो 10-12 लोग हमारे घर में घुस गये। हमें पीटने लगे। हमें रस्सी से बांधा और अपने घर ले गये। उसके बाद उन्होंने हमें एक खंभे से बांध दिया। उन्होंने हमें बहुत मारा और फिर जूतों का हार पहनाया। घटना की सूचना पुलिस को दी गई। जिसने हमें उनके चंगुल से छुड़ाया गया। इसके अतिरिक्त इन लोगों ने हमारी फसल नष्ट कर दी और हमारे घर का ताला तोड़कर जो कुछ था उसे भी नष्ट कर दिया।

इस तरह की घटना आये दिन समाचार पत्रों में पढ़ने को मिलती हैं। इनकी बहुसंख्यक समाज निंदा नहीं करता है। यही सर्वाधिक चिंता की बात है।

(एल. एस. हरदेनिया वरिष्ठ पत्रकार हैं और भोपाल में रहते हैं)

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