अब सबको नजर आने लगी है अर्थव्यवस्था की हकीकत

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बेरोजगारी का विज्ञापन।

गिरीश मालवीय का लेख…

एसबीआई चेयरमैन रजनीश कुमार कह रहे हैं कि रेट कट की वजह से बैंकों के पास अब नकदी की कमी नहीं है, लेकिन लोन लेने वाले लोगों की संख्या में कमी आ गई है। हर कोई लोन लेने से डर रहा है। लेकिन कर्ज की मांग कमजोर पड़ गई है। मांग कमजोर पड़ने की वजह से उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहन की जरूरत है।

भारतीय रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने कहा है कि अर्थव्यवस्था में जारी मंदी बहुत चिंताजनक है और सरकार को ऊर्जा क्षेत्र और ग़ैर बैंकिंग वित्तीय क्षेत्रों की समस्याओं को तुरंत हल करना होगा। उन्होंने कहा कि निजी क्षेत्र में निवेश को बढ़ाने के लिए नए सुधारों की शुरुआत करनी होगी। समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए इंटरव्यू में रघुराम राजन ने कहा कि भारत में जिस तरह जीडीपी की गणना की गई है उस पर फिर से विचार करने की ज़रूरत है।

सुब्रमण्यम स्वामी कह रहे हैं कि पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेतली के कार्यकाल में अपनाई गईं गलत नीतियां अर्थव्यवस्था में सुस्ती के लिए जिम्मेदार हैं।

भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने मंदी को लेकर एक नया शब्द दिया है- ‘Panglossian’। ‘निराशा और सब कुछ खत्म हो गया है’ जैसी सोच से किसी को भी मदद नहीं मिलने वाली। मैं यह नहीं कहता हूं कि हमें Panglossian दृष्टिकोण रखना चाहिए और हर चीज पर हंसना चाहिए, यह शब्द असल में एक हास्य उपन्यास रचना ‘वोल्टेयर’ के किरदार डॉ पैनगलॉस से प्रेरित है। इस उपन्यास का किरदार डॉ पैनगलॉस बहुत आशावादी शख्स रहता है।

Infosys के पूर्व सीईओ मोहनदास पई बता रहे कि इंडस्ट्री अब और ज्यादा झटके बर्दाश्त नहीं कर सकती। इंडस्ट्री को एक से बढ़ कर एक झटके दिए जा रहे हैं। पहले नोटबंदी, फिर जीएसटी, आईबीसी और इसके बाद रेरा की वजह से उद्योगों के सामने बड़ी मुसीबत खड़ी हो गई है। IL&FS संकट के बाद एनबीएफसी कंपनियां मुसीबत में पड़ गई हैं। बाजार में लिक्वडिटी नहीं है। धंधा करने के लिए पैसा नहीं है। इसलिए इकनॉमी को और झटके की जरूरत नहीं है। सरकार को यह समझना होगा।

“मिट जायेगी मखलूक तो इन्साफ करोगे,
मुंसिफ हो तो अब हश्र उठा क्यूं नहीं देते ?”

रवीश कुमार के पेज से….

आज इंडियन एक्सप्रेस के पेज नंबर तीन पर बड़ा सा विज्ञापन छपा है। लिखा है कि भारतीय स्पीनिंग उद्योग सबसे बड़े संकट से गुज़र रहा है जिसके कारण बड़ी संख्या में नौकरियां जा रही हैं। आधे पन्ने के इस विज्ञापन में नौकरियां जाने के बाद फ़ैक्ट्री से बाहर आते लोगों का स्केच बनाया गया है। नीचे बारीक आकार में लिखा है कि एक तिहाई धागा मिलें बंद हो चुकी हैं। जो चल रही हैं वो भारी घाटे में हैं। उनकी इतनी भी स्थिति नहीं है कि वे भारतीय कपास ख़रीद सकें। कपास की आगामी फ़सल का कोई ख़रीदार नहीं होगा। अनुमान है कि अस्सी हज़ार करोड़ का कपास होने जा रहा है तो इसका असर कपास के किसानों पर भी होगा।

कल ही फ़रीदाबाद टेक्सटाइल एसोसिएशन के अनिल जैन ने बताया कि टेक्सटाइल सेक्टर में पचीस से पचास लाख के बीच नौकरियां गईं हैं। हमें इस संख्या पर यक़ीन नहीं हुआ लेकिन आज तो टेक्सटाइल सेक्टर ने अपना विज्ञापन देकर ही कलेजा दिखा दिया है। धागों की फ़ैक्ट्रियों में एक और दो दिनों की बंदी होने लगी है। धागों का निर्यात 33 प्रतिशत कम हो गया है।

मोदी सरकार ने 2016 में छह हज़ार करोड़ के पैकेज और अन्य रियायतों का ज़ोर शोर से एलान किया था। दावा था कि तीन साल में एक करोड़ रोज़गार पैदा होगा। उल्टा नौकरियां चली गईं। पैकेज के एलान के वक्त ख़ूब संपादकीय लिखे गए। तारीफ़ें हो रही थीं। नतीजा सामने हैं। खेती के बाद सबके अधिक लोग टेक्सटाइल में रोज़गार पाते हैं। वहां का संकट इतना मारक है कि विज्ञापन देना पड़ रहा है। टीवी में नेशनल सिलेबस की चर्चा बढ़ानी होगी।

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