Thursday, January 20, 2022

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दिग्विजय और प्रियंका करेंगे राष्ट्रीय मुद्दों पर आंदोलन का नेतृत्व

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आज कांग्रेस की तरफ से एक विज्ञप्ति आयी है जिसमें बताया गया है कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एक ऐसी कमेटी का गठन किया है जो राष्ट्रीय स्तर के ज्वलंत मुद्दों पर अभियान संचालित करेगी। दिलचस्प बात यह है कि 9 सदस्यों की इस कमेटी का चेयरमैन मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्वियज सिंह को बनाया गया है। यह राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस की ओर से सौंपी गयी शायद पहली इतनी बड़ी जिम्मेदारी है जिसका नेतृत्व दिग्विजय सिंह करेंगे। उससे भी बड़ी दिलचस्प बात यह है कि उसमें कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी को भी रखा गया है। इन दोनों के अलावा दूसरे प्रमुख सदस्यों में उदित राज, रागिनी नायक, बीके हरिप्रसाद और जुबेर खान समेत दूसरे कुछ चेहरे शामिल हैं। हालांकि इसमें विस्तार से उन मुद्दों का जिक्र नहीं किया गया है। लेकिन माना जा रहा है कि वो मुद्दे जो जनता को सबसे ज्यादा परेशान कर रहे हैं चाहे वह महंगाई हो या कि बेरोजगारी या फिर किसानों के सवाल या गैस सिलेंडरों समेत पेट्रोल और डीजल के बढ़ते दाम, वो इसके हिस्से बनेंगे। ये तमाम मुद्दे आंदोलन के लिए जनता की बाट जोह रहे हैं लेकिन न तो किसी पार्टी की तरफ से कोई जुंबिश हो रही है। न ही कोई दूसरा संगठन इस जिम्मेदारी को लेने के लिए तैयार है।

शायद इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए कांग्रेस आलाकमान ने इस दिशा में यह कदम बढ़ाया है। अभी कल ही एक खबर आयी है जिसमें बताया गया है कि कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह और सीपीएम की पोलित ब्यूरो सदस्य सुभाषिनी अली जल्द ही एक साथ इंदौर का दौरा करेंगे और मध्य प्रदेश में जारी मॉब लिंचिंग के सवाल पर प्रशासन की घेरेबंदी के साथ ही जनता के बीच भाईचारे को बढ़ाने के लिए वहां आयोजित होने वाले कई कार्यक्रमों में हिस्सेदारी करेंगे। दरअसल बीजेपी-संघ ने यूपी के चुनावों को ध्यान में रखते हुए सांप्रदायिक उन्माद भड़काने के लिए तरह-तरह के हरकतों की शुरुआत कर दी है। जो मॉब लिंचिंग पिछले दिनों रुकी हुई थी वह एक बार फिर एमपी बिहार से लेकर यूपी से सटे तमाम इलाकों में सिर उठाने लगी है। इतना ही नहीं दिल्ली के जंतर-मंतर पर अश्विनी उपाध्याय के नेतृत्व में होने वाली घटना को भी यूपी के चुनावों से ही जोड़कर देखा जा रहा है। और यूपी के भीतर योगी चुनावों को सांप्रदायिक रंग देने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे हैं। मथुरा के भीतर मांस की बिक्री पर पाबंदी उनके इसी मंसूबे के हिस्से के तौर पर देखा जा रहा है। वहां से वायरल हुई डोसा दुकानदार की तस्वीरें बताती हैं कि संघ कुनबे ने चुनाव को सांप्रदायिकता की नाली में प्रवाहित करने के लिए अपनी कमर कस ली है।

लेकिन शायद कांग्रेस इस चीज को पहचान रही है। इस कमेटी में प्रियंका गांधी का रखा जाना बताता है कि यहां बात भले ही राष्ट्रीय स्तर पर अभियान संचालित करने की हो। लेकिन उसका केंद्रीकरण यूपी होगा। और इसी लिहाज से उसमें तमाम ऐसे मुद्दे शामिल करने की बात की जा रही है जो जनता के रोजमर्रा के जीवन से जुड़े हों। इस मामले में कांग्रेस फूंक-फूंक कर कदम रख रही है। एक तरफ उसकी कोशिश होगी कि वह सांप्रदायिकता को सीधे बहस में न आने दे। उसके लिए जरूरी है कि वह जनता के बुनियादी सवालों को आगे कर दे।

दरअसल यूपी में चुनाव का क्या मुद्दा होगा यह अभी तक साफ नहीं हो पाया है। यह बात अलग है कि राजनीतिक पार्टियां अपनी-अपनी तरफ से कोशिश कर रही हैं। लेकिन होता यही है कि जिसका एजेंडा बनता है जीत उसी की होती है। यूपी में सवालों और मुद्दों की कमी नहीं है। कोरोना से हुई मौतों का गम अभी लोगों ने भुलाया नहीं है। आक्सीजन से लेकर बेड तक की जो मार थी उसको लोगों ने झेला है। और उस समय सरकार नदारद थी। कोई ऐसा दिन नहीं होता है जब बेरोजगार सड़कों पर न हों। प्रतियोगी परीक्षाओं का आलम यह है कि वो आयोजित ही पेपर लीक कराने के लिए की जाती हैं। और एक बार जो परीक्षा रद्द हो गयी तो फिर तीन साल के लिए सरकार को फुर्सत। एंबुलेंस कर्मियों का मामला हो या फिर गन्ने के बकाए का सवाल सारे मसलों पर योगी सरकार फंसी नजर आ रही है। दलितों से लेकर महिलाओं के उत्पीड़न की बाढ़ यूपी में आ गयी है। बलात्कार में यूपी नया रिकार्ड तोड़ रहा है। ऐसे में किसानों ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश से योगी सरकार को हटाने का बिगुल फूंक दिया है। पांच सितंबर को मुजफ्फरनगर में होने वाली रैली में किसान योगी को सत्ता से हटाने का ऐलान करेंगे। इन सारी स्थितियों में अगर राजनीतिक दल भी उसके समानांतर अभियान शुरू कर देते हैं तो योगी सरकार की घेरेबंदी एक नये चरण में पहुंच जाएगी।

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