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कैदियों की दीपावली मतलब गम की दीपावली

मैं आज के दिन पिछले साल बिहार के गया सेन्ट्रल जेल के अंडा सेल में बतौर विचाराधीन बंदी था। आज सुबह से ही व्हाट्सअप, फेसबुक और फोन पर कई दोस्त व रिश्तेदार दीपावली की बधाई व शुभकामनाएँ दे रहे हैं, तो बरबस मुझे पिछली दीपावली की याद आ गयी और मैं कल्पना में खो गया कि आज जेलों में बंदी क्या कर रहे होंगे? क्या उनके लिए दीपावली का कोई महत्व है और है तो क्या है?

चूंकि मेरे ऊपर यह आरोप था कि मैं भाकपा (माओवादी) का नेता हूँ और मुझ पर #UAPA की आधा दर्जन धाराओं समेत सीआरपीसी व आईपीसी की कई धाराओं के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था, इसलिए मुझे जब शेरघाटी उपकारा से गया सेन्ट्रल जेल में स्थानान्तरित किया गया, तो मुझे कुछ दिन 19 नंबर सेल (कैद-ए-तन्हाई) में रखने के बाद अंडा सेल में स्थानान्तरित कर दिया गया। अंडा सेल के बंदियों को अंडा सेल के कंपाउंड से बाहर निकलना मना था, लेकिन एक पत्रकार होने के नाते व पैर की नस में खिंचाव की समस्या से ग्रस्त रहने के कारण मुझे व्यक्तिगत तौर पर एक-एक घंटे सुबह-शाम बाहर निकलकर टहलने की अनुमति जेल प्रशासन से मिली हुई थी।

प्रत्येक दिन की सुबह की तरह दीपावली की सुबह भी हमारे सेल का ताला 06:30 बजे सुबह में खोला गया और ताला खुलते ही ब्रश करके मैं बाहर टहलने के लिए निकल गया। चूंकि अंडा सेल के सारे बंदी या तो माओवादी नेता होने के आरोपी थे या फिर बड़ा गैंगस्टर, इसलिए ये लोग अपनी भावनाओं को काबू रखना भी अच्छी तरह से जानते थे, इसलिए दीपावली के दिन ये विशेष खुश हैं या गम में हैं, यह पता करना मुश्किल था। जब मैं बाहर टहल रहा था, तो कई जगह काफी हृदयविदारक दृश्य देखने को मिले।

कई बंदी चुपचाप गुमसुम बैठे दिखे, तो कई बंदी चिल्ला-चिल्लाकर रोते हुए दिखे। कुछ बंदी रोने वालों को सांत्वना दे रहे थे कि अगली दीपावली तुम जरूर अपने परिवार के साथ मनाओगे। उस दिन मेरा भी टहलने का मन नहीं किया और कैंटीन चला गया। जिस कैंटीन में प्रतिदिन सैकड़ों की भीड़ रहती थी, दिवाली के दिन काफी कम बंदी दिख रहे थे। मैंने कैंटीन में चाय पिया और फिर कैंटीन मालिक बिन्देश्वर यादव (उम्र कैद की सजा प्राप्त कैदी) के पास जाकर अपने गांव की दीपावली के बारे में बताने लगा।

मेरा पैतृक घर बिहार के भागलपुर जिले के शाहकुंड थानान्तर्गत सरौनी बकचप्पर गांव में है। यहाँ दीपावली के दिन सन की लकड़ी से हुक्का-पाती बनाया जाता है और शाम में एक-एक हुक्का-पाती तमाम देवी-देवता के स्थानों व अपने खेतों में भी गाड़ा जाता है। फिर शाम को अपने घर के विष्णु पिंडा पर जल रहे दीये से हुक्का-पाती जलाकर ‘हुक्का-पाती लक्ष्मी घोर, दरिद्दर बाहरे बाहर… हू….’ (यह अंगिका भाषा है) का नारा लगाते हुए घर के बाहर सड़क पर पूरे हुक्का-पाती को जलाया जाता है। जलते हुए हुक्का-पाती को पांच बार लांघ के पार करना होता है, फिर बची हुई 5 लकड़ी का हुक्का पीने के अंदाज में कश लगाया जाता है।

फिर उसे लेकर घर आते हैं और घर की बुजुर्ग महिलाएं हुक्का-पाती जलाकर आये हुए लोगों को धान से चुमाती हैं और टीका लगाती हैं। इसके बाद सभी पूरे गांव में घूम-घूमकर अपने से बड़ों के पैर छूकर प्रणाम करते हैं और बड़े छोटे को चॉकलेट, मिश्री, लड्डू, सौंफ-सुपारी आदि अपनी सुविधानुसार देते हैं। मेरे गांव के बगल के कुशमाहा गांव में इस दिन से दो-दिवसीय मेला भी लगता है, जहाँ पर ग्रामीणों के जरिये रात में नाटक खेला जाता है, जिसमें अगल-बगल के गांवों के हजारों महिला-पुरुष दर्शक होते हैं। वैसे लगभग 20 साल से मैं कभी दीपावली में गांव में नहीं रहा, लेकिन अभी भी यही परंपरा मेरे गांव में चल रही है।

खैर, अपने गांव की दीपावली की कहानी सुनाते-सुनाते मुझे लगा कि क्यों नहीं अंडा सेल के बंदियों को आज मैं जलेबी खिलाऊं। यह खयाल आते ही मैंने झट से बिन्देश्वर जी को 40 पैकेट जलेबी का ऑर्डर दे दिया और गरम-गरम जलेबी 10 बजे अंडा सेल में पहुंचाने को बोलकर वापस अंडा सेल में आ गया। मुझे पूरे जेल में दीपावली को लेकर कोई चहल-पहल नहीं दिखी। हालांकि एक-दो दिन पहले से जेल में सफाई व कहीं-कहीं रंग-रोगन जरूर हुआ था। अंडा सेल में आने के बाद मैंने बाहर की स्थिति के बारे में कुछ लोगों से चर्चा की। सभी का यही कहना था कि लोग जेल के बाहर की दीपावली को याद कर भावुक हो जाते हैं और तब आंख से आंसू निकल ही जाते हैं। इस चर्चा से अंडा सेल में भी माहौल गमगीन हो गया। मुझे भी अपने परिजनों व खासकर बेटा अग्रिम अविरल की याद आने लगी, जिसका कुछ दिन पहले ही दो साल पूरा हुआ था। उसकी याद आते ही लगा कि अब आंसुओं को रोक नहीं पाऊंगा, इसलिए मैं अपने कमरे में चला गया।

दीपावली के दिन भी जेल में सामान्य मैन्यू के तहत ही खाना दिया गया, जबकि पुराने बंदियों ने बताया कि दीपावली के दिन पहले मिठाइयाँ बांटी जाती थीं और रात में खीर भी दिया जाता था। जेल में दीपावली के लिए विशेष फंड स्वीकृत है, लेकिन सब भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है। उस शाम में जब मैं घूमने निकला, तो मंदिर में चाईनीज बल्ब लगा पाया। कुछ बंदियों ने बताया कि आज मुलाकाती में सिर्फ आंसू ही आंसू दिखाई दे रहे थे, क्योंकि अधिकांश बंदी और उनसे मुलाकाती करने आये परिजनों के आंखों से आज आंसू निकले ही जा रहे थे।

19 नंबर सेल के पास ड्यूटी पर मौजूद 2 महिला सिपाही भी गुमसुम बैठी हुई थीं, मैंने हाल-चाल पूछ लिया। दरअसल, वहाँ की कई महिला सिपाहियों से भी मेरी बात-चीत होती थी और ये सभी अपना दुख-सुख मुझसे भी बांटती थीं। उन दोनों ने बताया कि आज दीपावली के दिन भी काफी दिन पहले बताने के बाद भी उन्हें छुट्टी नहीं मिली, जबकि अपने चहेते सिपाहियों को छुट्टी दे दी गयी। दरअसल इन दोनों महिला सिपाहियों के बच्चे 5 साल से छोटे थे और ये आज के दिन अपने बच्चों के साथ रहना चाहती थीं।

उस दिन जब मैं वापस लौटकर अंडा सेल आया तो छोटी-छोटी 2-2 मोमबत्तियाँ सभी बंदियों को पहरा (सजायाफ्ता बंदी) के द्वारा दी जा रही थीं। कुछ देर में 05:30 बजे अंधेरा होने लगा और पहरा व अन्य कुछ युवा बंदियों सभी ने कमरे के अंदर और बाहर मोमबत्तियाँ जला दी। अंडा सेल के गेट पर भी मोमबत्ती जली और फिर शाम के 6 बजते-बजते हमें बंद कर दिया गया। गया शहर की आतिशबाजी की आवाजें लगातार हमारे कानों में आ रही थीं, लेकिन अंडा सेल में बंद होने के कारण हम कुछ भी देख नहीं पा रहे थे। रात के 8 बजते-बजते मोमबत्तियाँ गल गयीं और बुझ गयीं।

इस तरह से दीपावली के मोमबत्ती जेल में बंद बंदियों के जीवन में प्रकाश तो नहीं ही ला सके। हाँ, उनके आंखों में आंसू जरूर ले आए।

(रूपेश कुमार सिंह स्वतंत्र पत्रकार हैं और आजकल झारखंड के रामगढ़ में रहते हैं।)

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This post was last modified on November 14, 2020 4:28 pm

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