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दो ध्रुवों में फंसी कांग्रेस

मैं प्रधानमंत्री से लड़ा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से लड़ा और उन संस्थाओं से भी लड़ा जिन पर वे कब्जा जमाए बैठे हैं। मैं लड़ा अपने वतन के आदर्शों को बचाए रखने के लिए और इसलिए क्योंकि मुझे भारत से प्यार है। इस जंग में, मैं अकेला था और मुझे इसका गर्व है। यह राहुल गांधी कह रहे हैं। इसे सुनकर कोई भी चौंक जाएगा क्योंकि वे साधारण व्यक्ति नहीं है। वे छह दशक तक शासन करने वाली पार्टी के अध्यक्ष हैं। उस पर भी नेहरू-गांधी परिवार के वारिस हैं। उनको कहना पड़ रहा है कि अध्यक्ष होने के बाद भी वे अकेले लड़े। इसका मतलब अध्यक्ष वे थे, लेकिन फैसले लेने का अधिकार किसी और के पास था। या फिर यह कि फैसले तो वे ले रहे थे, पर कोई उन फैसलों पर वीटो लगा रहा था। तभी राहुल गांधी को यह लिखना पड़ा कि वे अकेले लड़े। जाहिर है पार्टी और उसके दिग्गज नेता उनके साथ खड़े नहीं थे। वे कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में कह भी चुके हैं। तो सवाल यह है कि वे अकेले क्यों लड़ रहे थे? इसकी दो वजह रही। पहला, राहुल गांधी को ओल्ड गार्ड पसंद नहीं करते। और दूसरा, पार्टी पर ओल्ड गार्ड की मजबूत पकड़ है। उसकी बड़ी वजह खुद सोनिया गांधी हैं।

राहुल गांधी के हाथ में कमान आने के बाद भी सोनिया गांधी उनके निर्णय पर वीटो लगाती रहीं। इससे पार्टी में ओल्ड गार्ड की स्थिति और मजबूत हुई। वे अपने तरीके से पार्टी को हांकने लगे। राहुल गांधी यह जान रहे थे और पार्टी को इनके चंगुल से निकालना चाहते थे। जब ओल्ड गार्ड यह बात समझ गए तब वे राहुल गांधी का अंदर-अंदर विरोध करने लगे। यह प्रत्यक्ष तौर पर तो संभव था नहीं। इसलिए विरोध अप्रत्यक्ष तौर पर हुआ। प्रियंका राग उसी विरोध का हिस्सा था। इसके जरिए ओल्ड गार्ड पार्टी के भीतर और बाहर राहुल गांधी की स्थिति को कमजोर करना चाहते थे। यह उनके लिए कठिन भी नहीं था। पार्टी के लोग प्रियंका में इंदिरा गांधी की छवि देखते ही हैं। जहां तक बात बाहर की है तो वहां राहुल गांधी की छवि अनिच्छुक राजनेता की थी ही। इसलिए राहुल गांधी की स्थिति को बतौर राजनेता कमजोर करना ओल्ड गार्ड के लिए सहज था।

सोनिया गांधी ने इसे भांप लिया था। इसलिए जरूरी हो गया था कि दोनों खेमों को एक किया जाए। इसके बिना राहुल गांधी की ताजपोशी संभव नहीं थी। उनका मानना था कि ओल्ड गार्ड का राजनीतिक अनुभव राहुल गांधी के काम आएगा। इस वजह से वे चाहती थीं कि ओल्ड गार्ड भी राहुल का समर्थन करें। यह तभी संभव था जब सोनिया गांधी ओल्ड गार्ड के साथ खड़ी रहतीं। वे खड़ी हुईं और राहुल गांधी के जो निर्णय ओल्ड गार्ड को पसंद नहीं आए, उस पर उन्होंने वीटो भी लगाया। इस वजह से कांग्रेस में दुविधा की स्थिति पैदा हो गई क्योंकि पार्टी में सत्ता के दो केन्द्र बन गए।

एक राहुल गांधी खुद हैं और दूसरी उनकी मां सोनिया गांधी। पार्टी की जो दुर्गति हुई है, उसकी असल वजह यही है। कांग्रेस यह तय ही नहीं कर पा रही है कि चला किस दिशा में जाए। उस पर जो राहुल गांधी कह रहे हैं, या फिर उस पर जिसकी सलाह सोनिया गांधी दे रही हैं। राहुल का खेमा यह मानने के लिए तैयार नहीं है। उन्हें पता है कि सलाह सोनिया गांधी की नहीं ओल्ड गार्ड की है। इनकी सलाह कितनी सतही है, वह आम चुनाव के परिणाम से जाहिर हो गई है। इन्हीं लोगों ने राहुल गांधी को आम चुनाव की जीत के लिए आश्वस्त किया था। कहा गया था कि 180 सीट कांग्रेस ला रही है। इसी दावे की वजह से आम चुनाव की कमान ओल्ड गार्ड को दी गई थी। राहुल गांधी का बस नाम था। कहा तो यहां तक जा रहा है कि टिकट तक तय करने में राहुल गांधी की भूमिका नहीं थी। जो कुछ तय किया गया, वह सब ओल्ड गार्ड ने किया।

जाहिर है सोनिया गांधी का उनको समर्थन था। इसी वजह से मुद्दे भी उन्हीं लोगों ने गढ़े। राफेल को चुनावी मुद्दा बनाने की सलाह पी.चिदंबरम जैसे नेताओं ने दी थी। इस बात को खुद राहुल गांधी स्वीकार कर चुके हैं। चुनाव के दौरान उन्होंने इंडियन एक्सप्रेस को एक साक्षात्कार दिया था। उसमें राफेल से जुड़े कई सवाल राहुल से पूछे गए। एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा इसका पूरा विवरण पी.चिदंबरम के पास है। इससे स्पष्ट है कि राफेल को मुद्दा बनाने की नसीहत किसने दी।
जिसने दी उसने तमाम राजनीतिक विश्लेषकों के विश्लेषण पर न तो ध्यान दिया और न ही वह जमीन पर गया। दोनों में से कोई भी एक काम अगर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता कर लेते तो उन्हें समझ में आ जाता कि चुनाव का मुद्दा क्या है। लेकिन उनके साथ समस्या यह थी कि वे समझना ही नहीं चाहते थे।

उन्होंने तो सोनिया गांधी को समझा रखा था कि जैसे इंडिया शाइनिंग विफल हो गया, वैसे ही अच्छे दिन की भी हवा निकल जाएगी और कांग्रेस फिर सरकार बनाएगी। सोनिया गांधी को इसका पूरा भरोसा था। यह रायबरेली में उनके दिए गए बयान से जाहिर होता है। वह नामांकन करने गई थीं। तब पत्रकारों ने उसने पूछा था, क्या वे मानती हैं कि नरेन्द्र मोदी अजेय हैं ? इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, ‘2004 को मत भूलिए।’

ऐसा उन्होंने इसलिए कहा क्योंकि सलाहकारों ने जीत का भरोसा दिया था। उसी भरोसे की वजह से राहुल गांधी के विरोध के बावजूद राजस्थान में अशोक गहलोत को और मध्य प्रदेश में कमलनाथ को कुर्सी दी गई। इन दोनों ने आलाकमान से दावा किया था कि अगर हमें कुर्सी मिली तो लोकसभा में ज्यादातर सीटें कांग्रेस की होगी। इसी शर्त पर सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया का हक मारा गया था। एक तरह से यह भी ओल्ड गार्ड की ही जीत थी। या फिर यह कहा जाए कि राहुल गांधी के निर्णय पर सोनिया गांधी का वीटो था।

उस समय तो राहुल गांधी ने कुछ नहीं बोला था। लेकिन चुनाव परिणाम आने के बाद उन्होंने सीधे तौर पर अशोक गहलोत, कमलनाथ और पी.चिदंबरम पर हमला बोला। उन पर सीधा आरोप लगाया कि पार्टी के लिए कुछ नहीं किया। असल में वह राहुल गांधी की खीझ थी जिसे उन्होंने सार्वजनिक कर दिया। पार्टी के लिहाज से यह जरूरी भी था। हार की जिम्मेदारी तय करनी थी। इसके लिए आवश्यक था कि जिसकी जो भूमिका रही है, वह सबके सामने आए। राहुल गांधी ने वही किया।

बतौर अध्यक्ष हार की जिम्मेदारी तो उन्होंने स्वीकार कर ली। लेकिन साथ ही ओल्ड गार्ड के चेहरे को भी बेनकाब कर दिया। उन्होंने पार्टी और जनता को बता दिया कि हार के लिए अकेले वे उत्तरदायी नहीं हैं। ओल्ड गार्ड की भी समान जिम्मेदारी है। इससे ओल्ड गार्ड भाग रहे हैं। अपने बचाव के लिए कांग्रेस के दिग्गज राहुल गांधी का इस्तीफा मानने के लिए तैयार नहीं हैं। कांग्रेस कार्य समिति के कई सदस्य सार्वजनिक रूप से इस बाबत बयान भी दे चुके हैं। उनका कहना है कि कांग्रेस कार्य समिति ने राहुल गांधी के इस्तीफे को स्वीकार नहीं किया है। जाहिर है यह बयान कुछ और नहीं चेहरा बचाने की कवायद है।

इस पूरे मामले में सोनिया गांधी की तरफ से कोई बयान नहीं आया है। वे 25 मई को भी चुप थीं। उसी दिन कांग्रेस कार्य समिति की बैठक हुई थी। उसमें राहुल गांधी और प्रियंका वाड्रा ओल्ड गार्ड पर बिफर पड़े थे। तब सोनिया गांधी कुछ नहीं बोलीं। वे समझ गई थीं कि जाने अनजाने कांग्रेस में सत्ता के दो केन्द्र बन गए हैं। उसका एक ध्रुव वे खुद हैं। इसी वजह से सोनिया गांधी चुप हैं। वे राहुल गांधी के निर्णय में हस्तक्षेप करने के लिए तैयार नहीं हैं। ओल्ड गार्ड को यह बात समझ में आ गई है। इसी वजह से वे लोग राहुल गांधी को मनाने में लगे हैं। पर राहुल तैयार नहीं हो रहे हैं। वे नये अध्यक्ष के चुनाव पर अड़े हैं। उनकी शर्त यह भी है कि नया अध्यक्ष पार्टी खुद चुने। उसमें गांधी परिवार की कोई भूमिका नहीं होगी।

तब से एक नई बहस पैदा हो गई है। वह यह है कि गांधी परिवार के बाहर कांग्रेस का अस्तित्व बचेगा या नहीं। नटवर सिंह सरीखे कांग्रेसी तो सीधे तौर पर कहते हैं कि गांधी परिवार से अलग कांग्रेस का कोई अस्तित्व नहीं है। गोपालकृष्ण गांधी की इस मसले पर अलग राय है। वे कहते हैं कि अगर परिवार से बाहर कोई पार्टी अध्यक्ष बन जाए तो उसकी हालत सुभाष बाबू जैसी नहीं होगी, तय यह करना होगा।

( जितेन्द्र चतुर्वेदी पत्रकार हैं और दिल्ली में रहते हैं।)

This post was last modified on July 26, 2019 1:13 pm

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