ऐसी टिप्पणियां मत करें मी लॉर्ड जिससे पूर्वाग्रह झलके! 

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सुप्रीम कोर्ट कई बार दोहरा चुका है कि किसी मामले की सुनवाई के दौरान पीठ में बैठे न्यायाधीशों द्वारा व्यक्त विचार का कोई क़ानूनी मूल्य नहीं है। लेकिन अक्सर न्यायाधीशों द्वारा व्यक्त विचार उनके द्वारा सुनाये जाने वाले निर्णयों में परिलक्षित होता है। इसलिए प्रतिकूल टिप्पणियों का विवाद का विषय बनना स्वाभाविक है।

इन दिनों वीवीपीएटी मशीनों द्वारा उत्पन्न पेपर ट्रेल की पूरी गिनती की मांग करने वाली याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है जिस पर पुरे देश की निगाहें हैं। अब सुनवाई के दौरान जस्टिस संजीव खन्ना ने कहा कि मानव भागीदारी आम तौर पर समस्याएं पैदा करती है, जबकि जस्टिस दीपांकर दत्ता ने एक याचिकाकर्ता से कहा कि “इस तरह सिस्टम को खराब न करें”। अब इन टिप्पणियों से क्या पीठ का पूर्वाग्रह नहीं झलकता?

जस्टिस संजीव खन्ना और दीपांकर दत्ता की दो-न्यायाधीशों वाली सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने मंगलवार (16 अप्रैल) को चुनाव के बाद इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (ईवीएम) द्वारा उत्पन्न पेपर ट्रेल की पूरी गिनती की मांग करने वाले याचिकाकर्ताओं की दलीलें सुनीं। पीठ ने कोई आदेश पारित नहीं किया और आम चुनाव शुरू होने से एक दिन पहले गुरुवार (18 अप्रैल) को आगे की दलीलें सुनी जाएंगी।

मतदाता-सत्यापन योग्य पेपर ऑडिट ट्रेल या वीवीपीएटी मशीनें ईवीएम का हिस्सा हैं और डाले गए सभी वोटों का पेपर ट्रेल तैयार करती हैं। मामले में याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि पेपर ट्रेल की पूरी गिनती से मतदाताओं को यह सत्यापित करने में मदद मिलेगी कि उनके वोट वीवीपैट द्वारा दर्ज किए गए अनुसार ही गिने गए थे।

जबकि याचिकाकर्ताओं में से एक का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि पेपर ट्रेल को क्रमबद्ध करने के बजाय एक साथ गिनने से समय की बचत होगी, जस्टिस खन्ना ने कहा कि मानवीय हस्तक्षेप “समस्याएं पैदा करेगा ।आम तौर पर, मानवीय हस्तक्षेप समस्याएं पैदा करने वाला है। तब पूर्वाग्रह सहित मानवीय कमजोरियों के बारे में सवाल उठेंगे। ”जस्टिस खन्ना ने कहा, मशीनें आम तौर पर सटीक परिणाम देती हैं। यह मौखिक टिप्पणी क्या है?

सेंटर फ़ॉर द स्टडी ऑफ़ डेवलपिंग सोसाइटीज़ के लोकनीति कार्यक्रम के एक चुनाव-पूर्व सर्वेक्षण में पाया गया कि लगभग आधे उत्तरदाताओं का मानना था कि ईवीएम कम से कम कुछ हद तक सत्ताधारी पार्टी द्वारा हेरफेर किए जाने के प्रति संवेदनशील थीं।

पीठ ने दलील पेश करने वाले वकील प्रशांत भूषण से डेटा के स्रोत के बारे में पूछा। इस पर प्रशांत भूषण ने जवाब दिया कि यह ‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज़’ (सीएसडीएस) द्वारा आयोजित एक सर्वे है, इस पर जस्टिस दत्ता ने कहा, “इस निजी सर्वे पर यकीन न करें। निजी आंकड़े ईवीएम पर अविश्वास का आधार नहीं हो सकते। ”तो क्या कोई अधिकारिक सर्वे है? तो फिर किस आंकड़े पर देश की जनता विश्वास करे ? क्या इस टिप्पणी से पूर्वाग्रह नहीं झलकता?

जस्टिस खन्ना ने कहा- ”इस तरह का तर्क मंजूर नहीं किया जा सकता। क्योंकि इसके बारे में कोई डेटा नहीं है। किसी प्राइवेट सर्वे से ऐसा पता नहीं चल पाएगा। यह संभव है कि कोई और इसके विपरीत जनमत संग्रह कराएगा। हम लोग उस सब में न जाएं।”

इसकी रिपोर्ट में भूषण का यह कहते हुए भी हवाला दिया गया है कि ईवीएम में हेरफेर की आशंका है और संभावित उपाय के रूप में मतपत्र मतदान का सुझाव दिया गया है। उन्होंने कथित तौर पर जर्मनी के उदाहरण का भी उल्लेख किया, जहां उन्होंने ईवीएम का उपयोग छोड़कर मतपत्र का उपयोग करना शुरू कर दिया था।

जस्टिस दत्ता ने जवाब देते हुए कहा कि जर्मनी की जनसंख्या की तुलना भारत से नहीं की जा सकती।जर्मनी की जनसंख्या कितनी है? हमारे देश की तुलना किसी भी यूरोपीय देश से नहीं की जा सकती। डेक्कन हेराल्ड ने उनके हवाले से कहा, यहां तक कि मेरे राज्य, पश्चिम बंगाल की जनसंख्या भी किसी भी यूरोपीय देश से अधिक है।

जस्टिस दत्ता ने कहा, “यह एक बहुत बड़ा काम है। किसी भी यूरोपीय देश के लिए इसका संचालन करना संभव नहीं है। जर्मनी और अन्य देशों की तुलना न करें। भूषण ने जर्मनी की आबादी के बारे में जो कहा, उससे अधिक आबादी मेरे गृह राज्य पश्चिम बंगाल की है। बहुत छोटा राज्य है… हमें किसी पर कुछ भरोसा रखना होगा। बेशक, जवाबदेही है।…लेकिन इस तरह सिस्टम को गिराने की कोशिश न करें।”

पीठ ने कहा- ”हमें इसकी जांच करनी है कि ईवीएम ठीक से काम कर रही हैं या नहीं, हमें डेटा के आधार पर जाना होगा। इस संबंध में कि किसी विशेष वर्ष में डाले गए वोटों की कुल संख्या साल-दर-साल कितनी है और क्या उन्होंने बाद में गिने गए वोटों की कुल संख्या के साथ इसका मिलान किया है, कितने मामलों में विसंगतियां थीं? कितने मामलों में उम्मीदवारों द्वारा पर्चियों की गिनती के अनुरोध पर अंततः कार्रवाई की गई? उसमें कितनी विसंगतियां पाई गईं? इससे हमें सही तस्वीर मिलेगी कि क्या ईवीएम में हेरफेर किया जा रहा है या हेरफेर की संभावना है या नहीं। वो डेटा वे उपलब्ध कराएंगे। हम उनसे वह डेटा मांगेंगे।”

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं)

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