नशे के कारोबार से चलेगी देश की अर्थव्यवस्था!

देश में कोरोना वायरस का कहर अब 2000 की संख्या को लगातार पार कर रहा है, पिछले 24 घंटों में 2,573 नए मामले सामने आये हैं। रविवार को यह 2,487 और शनिवार के दिन इसके 2,411 मामले सामने आये थे। अब कुल पॉजिटिव लोगों की संख्या 42,836 हो चुकी है, जो अगले 3 दिनों में ही 50,000 की संख्या को पार कर सकती है। लेकिन यह तो सामान्य सांख्यिकी है। जिस प्रकार से सरकार ने हाल ही में लॉकडाउन में छूट देने और ऑफिस फैक्ट्री और दारु पीने पिलाने में छूट की घोषणा की है, उससे लगता है कि मई के अंत में जो अनुमान 1 लाख कोरोना के मरीजों के लगाए जा रहे थे, उसे भारत 1.5 से 2 लाख तक पहुँचा दे, तो इसमें हैरानी नहीं होनी चाहिए। इसके साथ ही जून से दुनिया का ध्यान भी यूरोप और अमेरिका से हटकर भारत, ब्राजील और अफ्रीका के गरीब देशों की और चला जाना स्वाभाविक ही है।

इसके साथ ही जिस प्रकार से 40 दिन बाद सरकार ने देश के महानगरों और शहरों में फंसे लाखों लोगों को अपने-अपने घरों को जाने की छूट दी है, और साथ ही लोगों को 33% दफ्तरों, कल-कारखानों में आने-जाने की छूट दी है, यह बताने के लिए काफी है कि अब सरकार के हाथ-पाँव फूल चुके हैं और अब भूख प्यास से बेहाल होने की बारी उसकी है।

इस बीच, दिल्ली सरकार के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल ने रविवार के दिन कई मीडिया चैनलों पर इस बात के दावे किये कि अपने सूबे के अंदर उन्होंने इस 40 दिन के लॉकडाउन का इस्तेमाल अपनी मेडिकल सेवाओं को चाक-चौबंद करने और राजधानी के अधिकाधिक इलाकों में लॉकडाउन खोलने के लिए किया है। उनके अनुसार कोरोना वायरस से जंग जारी रहनी है, लेकिन जब लॉकडाउन शुरू किया गया था तो देश उससे लड़ने के लिए तैयार नहीं था, इसलिए लॉकडाउन लगाया जाना उचित कदम था। लेकिन अब जो प्रदेश इससे लड़ने में सक्षम हैं, उन्हें इसमें ढील दे दी जानी चाहिए।

यह अति उत्साह और छटपटाहट सिर्फ केजरीवाल में ही नहीं है, बल्कि यह भाषा कहीं न कहीं केंद्र सरकार की भी है। एक दूसरे के पूरक के बतौर काम करते हुए वे इस बात को अच्छी तरह से महसूस कर रहे हैं कि 40 दिन पहले जब पहली बार लॉकडाउन लागू किया गया था, तो उस समय कोरोना वायरस के मात्र 600 मरीज थे, जो आज 70 गुना बढ़ चुके हैं और दिन दूनी रात चौगुनी रफ्तार से ये आंकड़े बढ़ते ही जाने हैं।

वे जो 600 मरीज शुरुआती दौर में मिले थे, वे कौन थे? आज वे किस हाल में हैं? विदेशों से हवाई यात्रा कर आये ये लोग कहीं न कहीं अपनी गतिशीलता को देश के सभ्रांत समाज में ले जाने वाले थे, जिन पर केंद्र सरकार की कड़ी निगरानी, क्वारंटाइन और समुचित इलाज की जरूरत थी। आज कोरोना वायरस का विस्तार गली-गली मोहल्ले-मोहल्ले में हो चुका है। हम से जब विदेश से आये कुछ चुनिन्दा लोग नहीं सम्भाले गए, तो हम इस ऑफिस, फैक्ट्री और अब शराब की बिक्री से क्या इसे कम करने जा रहे हैं, या सरकार इसे फलने-फूलने का मौका दे रही है?

शराब की पॉलिटिक्स 

40 दिनों के लॉकडाउन के दौरान इतने टिकटॉक और सोशल मीडिया पर शराब प्रेमियों ने सीधे प्रधानमंत्री मोदी से अपील की कि प्लीज दारु का जुगाड़ कर दो, हम आपके जुग जुग आभारी रहेंगे। शराब पीने के ऐसे-ऐसे तर्क दिए गए कि अच्छा भला आदमी पागल हो जाए। फिर देश के गली-मोहल्लों में दिन में ताश खेलने और शाम को मदिरापान करने वालों की तादाद कितने करोड़ में है, जो चाहे तो किसी भी महारथी को अगले चुनावों में धूल का फूल बना सकता है, यह बात सिर्फ समाज शास्त्री या चतुर राजनीतिज्ञ ही समझ सकता है।

इसके अलावा देश के कई राज्यों की मुख्य कमाई का स्रोत ही शराब की बिक्री से प्राप्त होने वाला राजस्व है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में तो यदि दो महीने शराब की बिक्री न हो तो प्रदेश के लाखों कर्मचारियों, शिक्षकों की तनख्वाह सरकार लाख सर पटक ले, नहीं दे सकती। इन्हीं सबको देखते हुए केंद्र सरकार ने राज्य सरकारों की मूक सहमति के साथ 4 मई से शराब की बिक्री पर लगी रोक को खोलने का निर्णय लिया था।

दिल्ली में तो मानो शराब के ठेके का खुलना किसी उत्सव से कम नहीं था। लोगों की लम्बी-लम्बी कतारें, खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थीं। उत्तर दिशा के साथ ही दक्षिण दिशा से दूसरी लाइन भी अपने आप ही बनती दिखी। कुछ लोग तो ऐसे भी थे जो शराब की पूरी पेटी ही हासिल करने के मंसूबों के साथ आए थे। लेकिन जब उन्हें बिना पेटी के शराब की बोतलें मिली, तो उन्होंने पैंट की जेबों में खोंसने के बाद दोनों बाहों में भर-भर कर बोतलें अपने सीने से सटाकर किसी तरह गंतव्य तक या गाड़ी तक ले जा सके।

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इंडियन एक्सप्रेस के संवाददाता के अनुसार एक्साइज विभाग के अधिकारी से बात करने पर पता चला है कि अकेले महाराष्ट्र में कल 5-6 लाख लीटर शराब बेची गई। जबकि महाराष्ट्र के कई जिलों में शराब की दुकानों को खोलने की इजाजत प्रशासन ने नहीं दी थी। पुणे के औंध इलाके में भी लोगों की लम्बी-लम्बी कतारें देखने को मिली। क्या रेड जोन और क्या ग्रीन, मुंबई के पड़ोसी जिले ठाणे में भी लम्बी-लम्बी कतारें देखी गईं।

दक्षिण के राज्यों में तो एक दारु भक्त इतना खुश था कि शराब की दुकान के सामने उसने नारियल फोड़ कर इसका श्री गणेश किया। इसी तरह उडुपी में भी लाइन के नाम पर लोग सड़क, गड्ढे में खड़े नजर आए।

उत्तर प्रदेश ने तो मानो पहले से ही मान लिया था कि लोगों की लंबी लम्बी कतारें लगेंगी, इस लिए पहले से ही 3-4 मीटर की दूरी पर गोला खींचकर शारीरिक दूरी के पालन की व्यवस्था कर दी गयी थी। जिसका नतीजा यह रहा कि क़तारें कई किमी लंबी हो गयीं।

बेंगलुरु में भी कतारें इस प्रकार लगी थीं, जैसे मुफ्त में अमृत रस मिलने जा रहा हो। प्रशासन को देखते ही मास्क लगाये ये शराबी लोग एक दूसरे को दूरी का पाठ पढ़ाते देखे गए।

देर रात तक सूचना मिली है कि दिल्ली सरकार ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए शराब की बिक्री पर 70% सेस लगाने के आदेश दिए हैं। अर्थात 5 मई से जो बोतल 500 की मिला करती थी, उस पर 350 रूपये अलग से कर चुकाने पड़ेंगे। इसके जरिये दिल्ली सरकार का अनुमान है कि उसे 500 करोड़ रूपये मासिक की अलग से आमदनी होगी, जो उसके खाली हो रहे खजाने में किसी अमृत से कम नहीं होने जा रहा है। 

आशा है कि केंद्र सरकार अपने एक्साइज और देश की अन्य राज्य सरकारें भी इससे सबक लेते हुए तत्काल प्रभावी कदम उठाएंगी। घर में 40 दिन के लॉकडाउन के बाद अगर नकद 5000 रूपये ही पड़े हों, तो घर का मर्द उसमें से 2000 रुपये शराब पर क़ुर्बान करने के लिए तैयार है। अब कोई भी समझ सकता है कि बाकी के बचे 3000 रुपयों में ही आटा, चावल, बच्चों के लिए दूध, सब्जी और दवाई आएगी। ऐसा होने पर घरों में झगड़े कितने होने जा रहे हैं इसका अंदाज़ा लगाना किसी के लिए मुश्किल नहीं है। घरेलू हिंसा के मामलों में कितने गुना की वृद्धि होने जा रही है? कोरोना वायरस के लिए जरुरी शारीरिक दूरी की जगह बेवड़ों की फ़ौज कैसे घर और मोहल्ले में इसकी धज्जियां उड़ा सकती है? लेकिन क्या है कि सरकार को अपने रोकड़े से मतलब है, उसे नारी शक्ति, बच्चे देश का भविष्य हैं के लिए करोड़ों अरबों के विज्ञापन खर्च तो कर रखे हैं। आप उनसे अपना पेट भरें, सरकार तो वह करेगी जिससे उसे वोट नोट दोनों मिले।

(रविंद्र सिंह पटवाल स्वतंत्र लेखक हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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