Saturday, October 16, 2021

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देश के अर्थशास्त्रियों ने कृषि मंत्री को लिखा पत्र, कहा- तत्काल वापस हों तीनों कृषि कानून

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देश के दस जानेमाने अर्थशास्त्रियों ने केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर को पत्र लिख कर तीनों नये कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग की है। अर्थशास्त्र के इन विशेषज्ञों ने अपने पत्र में लिखा है कि देश भर के किसानों द्वारा और विशेष रूप से देश की राजधानी में एक अभूतपूर्व आंदोलन के समय, हम आपको ऐसे अर्थशास्त्रियों के रूप में लिख रहे हैं, जिन्होंने कृषि नीति के मुद्दों पर लंबे समय से काम किया है। हमारा मानना ​​है कि भारत सरकार को हाल के कृषि अधिनियमों को निरस्त करना चाहिए जो देश के छोटे और सीमांत किसानों के हित में नहीं हैं और जिनके बारे में किसान संगठनों के एक व्यापक वर्ग ने बहुत आलोचनात्मक आपत्तियां उठाई हैं।

अर्थशास्त्रियों ने कहा कि नए कानूनों में क्लॉस में संशोधन करना पर्याप्त नहीं होगा और किसानों की वास्तविक चिंताओं को उनके ‘गुमराह होने’ के रूप में चित्रित नहीं किया जाना चाहिए। पत्र में कहा गया है कि मौजूदा गतिरोध किसी के हित में नहीं है, और यह सरकार की जिम्मेदारी है कि वह किसानों की चिंताओं को दूर करते हुए इसे हल करे।

अर्थशास्त्रियों ने लिखा है कि लाखों छोटे किसानों के लाभ के लिए कृषि विपणन प्रणाली में सुधार और बदलाव की आवश्यकता है, लेकिन इन अधिनियमों द्वारा लाए गए सुधार उस उद्देश्य की पूर्ति नहीं करते हैं। वे गलत धारणाओं और दावों पर आधारित हैं कि किसानों को पारिश्रमिक मूल्य क्यों नहीं मिल पा रहे हैं, किसानों को पहले के मौजूदा कानूनों के तहत जहां कहीं भी बेचने की स्वतंत्रता नहीं है, और विनियमित बाजारों के बारे में किसानों के हितों में नहीं है। हम पांच महत्वपूर्ण कारण बता रहे हैं कि क्यों ये तीन अधिनियम, सरकार द्वारा पैकेज के रूप में लाए गए, भारत के छोटे किसानों के लिए उनके निहितार्थ में मौलिक रूप से हानिकारक हैं।

इस पत्र में इन कृषि विशेषज्ञों ने पांच बिंदुओं में कृषि मंत्रियों को नये कृषि कानूनों की खामियां गिनाई हैं। नया कृषि कानून छोटे किसानों के लिए सही नहीं है, इससे उनको फायदा नहीं नुकसान होगा। नया कृषि कानून दो तरह के बाजारों की रूप रेखा दो नए नियमों के तहत तय कर रहा है, जो कि व्यवाहरिक रूप से सही नहीं होगा।

नए कानून किसानों से ज्यादा कॉरपोरेट हितों की सेवा करेंगे। ये कानून मंडी व्यवस्था और पूरी खेती को निजी हाथों में सौंप देंगे, जिससे किसान को भारी नुकसान उठाना होगा। ये कानून कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग  को भी दो भागों में बांटते हैं, जिससे किसानों के हित की रक्षा नहीं की जा सकती है। बाजार भाव, किसानों की बेसिक समस्याओं की वजह से कृषि व्यापार प्रभावित होगा, जिससे किसान को ही नुकसान होगा इस वजह से नया कृषि कानून निरस्त होना चाहिए।

इस पत्र में कहा गया है कि कानून राज्य सरकारों की भूमिका को कमज़ोर करते हैं, जो केंद्र सरकार की तुलना में किसानों के हितों के लिए कहीं अधिक सुलभ और जवाबदेह हैं। यह प्रक्रिया (कृषि कानूनों को लागू करने की) को केंद्रीय स्तर पर एक कंबल विधायी परिवर्तन के माध्यम से राज्य सरकार द्वारा अधिक संवेदनशीलता और जवाबदेही के साथ नियंत्रित किया जा सकता है।

वे दो नियमों के साथ दो बाजार बनाते हैं- एपीएमसी बाजार यार्ड में एक विनियमित बाजार के साथ ‘व्यापार क्षेत्र’ में एक व्यावहारिक रूप से अनियमित बाजार, दो अलग-अलग कृत्यों के अधीन, बाजार शुल्क के अलग-अलग नियम और नियमों के अलग-अलग सेट।

अर्थशास्त्रियों ने कहा कि यह पहले से ही किसानों को अनियमित जगह में विनियमित कर रहा है। तीन कानूनों से पहले भी, एपीएमसी बाजारों के बाहर कृषि वस्तुओं की बिक्री का एक बड़ा प्रतिशत ले जाया गया था। हालांकि, एपीएमसी मार्केट यार्ड अभी भी दैनिक नीलामी के माध्यम से बेंचमार्क मूल्य निर्धारित करते हैं और किसानों को विश्वसनीय मूल्य संकेत देते हैं। विशेषज्ञों ने कहा कि इन मूल्य संकेतों ने केवल एक खरीदार के साथ खंडित बाजारों को रोका।

पत्र में कहा गया है कि, अनुबंध खेती में असमान खिलाड़ियों को कानून लाते हैं, इसलिए किसानों के हितों की रक्षा नहीं होती है, पत्र नोट। वर्तमान परिदृश्य जारी रहने की संभावना है, जहां अधिकांश अनुबंध खेती किसानों के लिए बिना किसी सहायता के अलिखित व्यवस्था के माध्यम से होती है, और कंपनियों को किसी भी दायित्व से बचाने के लिए अधिकांश व्यवस्थाएं एग्रीगेटर या आयोजकों के माध्यम से की जाती हैं।

पत्र लिखने वालों में हैदराबाद यूनिवर्सिटी के सेवानिवृत्त अर्थशास्त्र के प्रोफेसर डी नरसिम्हा रेड्डी, भारतीय लोक प्रशासन संस्थान और सामाजिक विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली के पूर्व प्रो. कमल नयन काबरा, सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज, त्रिवेंद्रम, और सदस्य, केरल राज्य योजना बोर्ड के प्रो. केएन हरिलाल, अर्थशास्त्र विभाग, एमएड विश्वविद्यालय, रोहतक के प्रो. राजिंदर चौधरी, सीनियर प्रोफेसर, CRRID, चंडीगढ़, और एमडी विश्वविद्यालय, रोहतक के पूर्व प्रो. सुरिंदर कुमार, सामाजिक विज्ञान संस्थान, नई दिल्ली के प्रो. अरुण कुमार, प्रोफेसर ऑफ एमिनेंस (अर्थशास्त्र), GNDU, अमृतसर, और अर्थशास्त्र के प्रोफेसर, CRIDID, चंडीगढ़ के प्रोफेसर रणजीत सिंह घुमन, टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुंबई के अध्यक्ष प्रो. आर रामकुमार, जेएनयू के प्रोफेसर विकास रावल और प्रो. हिमांशु के हस्ताक्षर शामिल हैं।

सुंदरलाल बहुगुणा किसानों के समर्थन में
इस बीच मशहूर पर्यावरणविद् और ऐतिहासिक चिपको आंदोलन के नेता सुंदरलाल बहुगुणा ने भी किसानों के आंदोलन का समर्थन किया है। बहुगुणा ने कहा कि किसानों की मांग जायज हैं और वह अन्नदाताओं के साथ हैं।

कृषि कानूनों के खिलाफ सिंघू बॉर्डर पर किसानों का विरोध प्रदर्शन आज 23वें दिन भी जारी है, बॉक्सर और कांग्रेस नेता विजेंद्र सिंह कृषि कानूनों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे किसानों का समर्थन करने टिकरी बॉर्डर पहुंचे। विजेंद्र सिंह ने कहा कि लड़ाई सरकार के साथ नहीं है, लड़ाई तीन काले कानूनों के साथ है।

किसान मज़दूर संघर्ष कमेटी पंजाब के दयाल सिंह ने बताया, ” प्रधानमंत्री को किसानों से बात करनी चाहिए और ये तीनों कानून वापस लेना चाहिए, अगर सरकार बातचीत करके काले कानून वापस लेती है तो ठीक, नहीं तो हम ये मोर्चा नहीं छोड़ेंगे।

पांडिचेरी में यूपीए के नेता आज मुख्यमंत्री वी नारायणस्वामी के साथ किसानों के समर्थन में एक दिन के उपवास पर हैं।

बता दें कि मोदी सरकार इन तीन नये कृषि कानूनों के खिलाफ तीन महीने पहले पंजाब और हरियाणा से किसान संगठनों के आह्वान पर जो आंदोलन शुरू हुआ था, बीते 26 नवंबर को वह दिल्ली पहुंच गया और वहां से यह आंदोलन अब पूरे देश में फैल गया है। बीते 23 दिनों से लाखों किसान इस कड़ाके की ठंड में देश की राजधानी दिल्ली को बाहर से घेर कर खुले आकाश के नीचे बैठे हुए हैं और इन तीनों कानूनों को वापस लेने की मांग कर रहे हैं।

इस दौरान 1,3,5 और 8 दिसंबर को किसान नेताओं और सरकार के बीच, जिनमें तीन बैठकें केंद्रीय कृषि मंत्री नरेंद्र तोमर और रेल मंत्री पीयूष गोयल से वार्ता और 8 दिसंबर, किसानों के भारत बंद की शाम केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ बैठक बेनतीजा समाप्त होने के बाद अब मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा है और अदालत ने फ़िलहाल इस मामले में कोई फैसला नहीं दिया है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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