30.1 C
Delhi
Friday, September 17, 2021

Add News

चुनाव आयोग ने वीवीपैट पर्चियों को 4 महीने में ही करा दिया नष्ट

ज़रूर पढ़े

उच्चतम न्यायालय  ने चुनाव आयोग को दिसम्बर 19 में नोटिस जारी किया था और कहा था कि फरवरी 2020 में लोकसभा चुनाव के नतीजों में गड़बड़ी के आरोपों पर सुनवाई करेगा लेकिन इस बीच एक न्यूज़ वेबसाइट द क्विंट ने एक आरटीआई के हवाले से दावा किया है कि चुनाव आयोग ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रमुख निर्वाचन अधिकारियों को 24 सितंबर 2019 को एक लेटर जारी कर वीवीपैट पर्चियों को नष्ट करने के निर्देश दिए थे और 4 महीने में ही इसे करवा दिया जबकि नियम के मुताबिक वोटिंग के बाद वीवीपैट (वोटर वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रायल) पर्ची को एक साल तक संभाल कर रखनी होती है।

उच्चतम न्यायालय ने चुनाव आयोग को यह नोटिस 2019 के लोकसभा चुनावों में 347 निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान और गणना में मतों की संख्या में कथित विसंगतियों की जांच के लिये दो गैर सरकारी संगठनों की जनहित याचिका पर जारी किया था ।एनजीओ की ओर दी गई याचिका में कहा गया है कि 347 निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान करने वाले मतदाताओं और गिनती के दौरान आई मतों की संख्या में अंतर है।

चुनाव कानून 1961 के नियम 94 (बी) में कहा गया है कि किसी भी चुनाव की वीवीपैट पर्चियों को एक साल तक संभाल कर रखा जाना चाहिए। द क्विंट को एक आरटीआई के जवाब में मिली जानकारी के अनुसार वोटिंग के बाद वीवीपैट (वोटर वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रायल) पर्ची को चुनाव आयोग ने इसे 4 महीने में ही नष्ट करवा दिया। लोकसभा चुनाव 2019 की वीवीपैट पर्चियों को आयोग ने नष्ट करवा दिया है। ऐसा बीते साल मई में घोषित किए गए चुनाव परिणाम के चार महीने बाद कर दिया गया। । आरटीआई के जवाब में दिल्ली के निर्वाचन विभाग के पब्लिक इन्फॉर्मेशन ऑफिसर ने इस बात की पुष्टि की है। अब सवाल यह है कि चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक जब एक साल तक इन पर्चियों को नष्ट नहीं किया जा सकता तो आखिर किस हड़बड़ी में ऐसा किया गया?

वीवीपैट व्यवस्था के तहत वोटर डालने के तुरंत बाद एक पर्ची निकलती है। इस पर जिस उम्मीदवार को वोट दिया गया है, उनका नाम और चुनाव चिह्न छपा होता है। अगर ऐसा नहीं होता तो मतदाता तुरंत चुनाव अधिकारी को इस संबंध में सूचित कर सकता है। यानि कि मतदाता के लिए अपनी बात को सिद्ध करने के लिए यह पर्ची एक सबूत के तौर पर काम करती है लेकिन इनके नष्ट हो जाने के बाद अब कोई भी अपनी बात को सिद्ध नहीं कर सकता। पर्चियों के नष्ट होने के बाद वह संभावित सबूत भी मिट गए हैं।

कानूनविदों के अनुसार चुनाव आयोग का यह फैसला नियमों के खिलाफ है। चुनाव के दौरान राजस्थान, हिमाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय और आंध्र प्रदेश में ईवीएम और वीवीपैट के बेमेल पर्चियों से जुड़े 8 मामलों को चुनाव आयोग ने संज्ञान में ले रखा है। इस पर जांच चल रही है। क्विंट ने इस पर जुलाई 2019 में आरटीआई के तहत आयोग से जानकारी मांगी थी जिस पर नवंबर में जवाब मिला था। आयोग ने अपने जवाब में कहा था कि ईसी की टेक्निकल एक्सपर्ट्स कमेटी अभी भी मामलों  की जांच कर रही है इसलिए सूचनाएं उपलब्ध नहीं करवाई जा सकती है।

गौरतलब है कि वीवीपैट मशीन को उच्चतम न्यायालय  के आदेश पर 2013 में चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा बनाया गया था। मकसद था कि वोटर को इस बात का यकीन हो कि उसका वोट सही जगह पड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि ईवीएम में वोट डालने के बाद वीवीपैट से निकलने वाला प्रिंट आउट तय करेगा कि वोटर का वोट सही जगह दर्ज हुआ है।

इसके पहले द क्विंट ने चुनाव आयोग से आरटीआई के माध्यम से पूछा था कि वीवीपैट  मशीनों को बैलट यूनिट और कंट्रोल यूनिट के बीच क्यों रखा जाता है? वीवीपैट मशीन, कंट्रोल यूनिट में जाने वाली जानकारी पर कंट्रोल क्यों रखता है? इसे उल्‍टा क्यों नहीं किया जा सकता? क्या इस खामी के कारण वीवीपैट – ईवीएम की जोड़ी को मैन्यूपुलेट नहीं किया जा सकता? अब तक चुनाव आयोग ने इनमें से किसी सवाल का जवाब नहीं दिया है।

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और कॉमन कॉज ने याचिका दाखिल की है। एडीआर एक चुनाव विश्लेषण संस्था है। मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने दोनों एनजीओ की याचिका को लंबित मामलों के साथ संबद्ध किया और इसे फरवरी 2020 में सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया है।

चुनाव विश्लेषण संस्था, एडीआर ने  याचिका में  मांग की है कि चुनाव आयोग को निर्देश दिया जाए कि वह किसी भी चुनाव के अंतिम फैसले की घोषणा से पहले डाले गए वोट और गिने गए वाटों का पूर्ण मिलान करे। इस मिलान से पूर्व चुनाव के नतीजे घोषित ना किए जाएं। जनहित याचिका में कहा गया है कि चुनाव आयोग अस्थायी आंकड़ों पर रिजल्ट जारी कर देता है जबकि गणना किए गए वोटों का आंकड़ा कुछ और होता है। आयोग को इन दोनों आंकड़ों में सामंजस्य बैठाने के बाद ही नतीजा घोषित करना चाहिए।

याचिकाकर्ता ने 2019 के लोकसभा चुनाव परिणामों से संबंधित आंकड़ों में सामने आईं ऐसी सभी गड़बड़ियों की जांच की भी मांग की है। चुनाव आयोग की चुनाव प्रक्रिया पर याचिका में कहा गया है कि चुनाव आयोग ने 2019 के सात चरणों के लोकसभा चुनाव में मतदान की घोषणा अपने एप ‘माईवोटर्स टर्नआउट’ पर की लेकिन सातवें चरण में यह डाटा नहीं दिया और सिर्फ मतदान प्रतिशत दिया जाने लगा। इसके साथ ही पुराने मतदान का आंकड़ा भी हटा दिया गया। याचिका में चुनाव आयोग पर सवाल उठाते हुए कहा गया है कि ये बदलाव गड़बड़ियों को छिपाने की कोशिश हो सकती है।

विशेषज्ञों की एक टीम ने याचिकाकर्ताओं के साथ-साथ विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में डाले गए मतों की संख्या और गिने गए मतों की संख्या के बीच गड़बड़ियों का विश्लेषण 28 मई और 30 जून 2019 को चुनाव आयोग की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के साथ-साथ ‘माईवोटर्स टर्नआउट’ ऐप पर आधारित था। इन दो आंकड़ों पर निष्कर्ष निकला कि 542 निर्वाचन क्षेत्रों में, 347 सीटों पर मतदान और मतगणना में विसंगतियां थीं। विसंगतियां एक वोट से लेकर 1,01,323 वोटों तक थीं। इस दौरान छह सीटें ऐसी थीं, जहां वोटों में विसंगति जीत के अंतर से अधिक थी। विसंगतियों के कुल वोट 7,39,104  हैं।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

तत्काल समाचारों के लिए, हमारा जनचौक ऐप इंस्टॉल करें

Latest News

यूपी में बीजेपी ने शुरू कर दिया सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का खेल

जैसे जैसे चुनावी दिन नज़दीक आ रहे हैं भाजपा अपने असली रंग में आती जा रही है। विकास के...
जनचौक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें

Janchowk Android App

More Articles Like This

- Advertisement -

Log In

Or with username:

Forgot password?

Forgot password?

Enter your account data and we will send you a link to reset your password.

Your password reset link appears to be invalid or expired.

Log in

Privacy Policy

Add to Collection

No Collections

Here you'll find all collections you've created before.