Thursday, February 2, 2023

स्पेशल रिपोर्ट: ‘सुनवाई नहीं तो काम नहीं’ के नारे के साथ यूपी के लाखों बिजली कर्मचारी हड़ताल पर, विद्युत व्यवस्था चरमराई

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लखनऊ। “सुनवाई नहीं तो काम नहीं…..प्रबंधन का तानाशाही रवैया अब नहीं सहेंगे…….कार्य बहिष्कार जारी रहेगा….प्रदेश सरकार को हमारी सुध लेनी होगी….कर्मचारी एकता जिंदाबाद…..” जैसे नारों के साथ उत्तर प्रदेश के लाखों बिजली कर्मचारी अपना आंदोलन जारी रखे हुए हैं। लंबे समय से अपनी मांगों के लिए संघर्ष कर रहे प्रदेश विद्युत निगम के कर्मचारी और मुख्य एवं सहायक अभियंता पूर्ण कार्य बहिष्कार में चले गए हैं, जिसमें नियमित और संविदाकर्मी दोनों शामिल हैं। विद्युत कर्मियों का 29 नवंबर से जारी कार्य बहिष्कार का यह आंदोलन 15 सूत्री मांगों को लेकर “विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश” के बैनर तले हो रहा है।

हालांकि आम जनता को परेशानी न झेलनी पड़े इसके लिए फिलहाल उत्पादन घरों, ट्रांसमिशन उपकेंद्रों, सिस्टम ऑपरेशन और वितरण उपकेंद्रों की पाली में काम करने वाले कर्मियों को कार्य बहिष्कार से मुक्त रखा गया है। लेकिन संघर्ष समिति ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी माँगों पर कोई सुनवाई नहीं होती है तो आगे पाली में कार्यरत कर्मचारी भी कार्य बहिष्कार में शामिल हो जायेंगे।

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एक तरफ संघर्ष समिति ने चेतावनी दी है कि कार्य बहिष्कार में जाने वाले कर्मचारियों और अभियंताओं के खिलाफ़ यदि ऊर्जा निगमों के शीर्ष प्रबंधन द्वारा कोई कड़ी कार्रवाई की जाती है तो उसे हरगिज नहीं सहा जायेगा। तत्पश्चात उनका आंदोलन और व्यापक रूप ले सकता है लेकिन वहीं दूसरी तरफ कार्पोरेशन प्रबंधन और बिजली कंपनियों ने कार्य बहिष्कार करने वाले अभियंताओं और कर्मचारियों पर कार्रवाई शुरू कर दी है, उन्हें चिहिन्त कर नोटिस जारी कर दिया गया है साथ ही ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’ के सिद्धांत पर वेतन काटने के भी आदेश जारी कर दिए गए हैं। कुछ कर्मियों को निलंबित कर भारी संख्या में संविदा कर्मियों की सेवा समाप्त कर दी गई है। निगम प्रबंधनों और कंपनी द्वारा की जाने वाली इस सख्त कार्रवाई का संघर्ष समिति ने कड़ा विरोध दर्ज कराया है।

आख़िर क्यों निगम कर्मचारियों और प्रबंधन के मध्य इतनी टकराहट पैदा हुई और कर्मचारियों की मुख्य मांगें क्या हैं इस पर संगठन के कुछ पदाधिकारियों से बातचीत हुई।

राज्य विद्युत परिषद अभियंता संघ के महासचिव जितेंद्र सिंह गुर्जर कहते हैं कि हम कार्य बहिष्कार में नहीं जाना चाहते थे लेकिन जब कर्मचारियों की मांगों को नहीं सुना जा रहा तो आख़िर उनके पास क्या रास्ता बच जाता है। उनके मुताबिक 27 अक्टूबर, 2022 को उत्तर प्रदेश शासन को 15 सूत्री मांगों का ज्ञापन इस उम्मीद से दिया गया था कि सरकार इस पर गंभीरता से विचार करेगी और समाधान निकलेगा लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उन्होंने बताया कि उनके मांगपत्र में ऊर्जा निगमों के शीर्ष प्रबंधन द्वारा की जा रही मनमानी और इसके कारण ऊर्जा निगमों को हो रहे नुकसान के साथ कर्मचारियों का लगातार हो रहे शोषण की बात भी शामिल है जो अत्यंत गंभीर मुद्दे हैं लेकिन अफ़सोस की बात है कि इन मुद्दों पर भी प्रदेश शासन का ध्यान नहीं गया।

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जितेंद्र कहते हैं कि उनका विरोध इस बात को लेकर भी है कि ऊर्जा निगमों में प्रबंधन अधिकारियों की न्युक्तियाँ बिना चयन प्रक्रियाओं के सीधे ही हो जा रही हैं जो नहीं होना चाहिए।

उन्होंने आरोप लगाया कि नियमों की धज्जियां उड़ा कर अवैध तरीके से ऊर्जा निगमों के शीर्ष पदों पर लोग बैठे हैं। वे कहते हैं कि निदेशक, प्रबंधन निदेशक, चेयरमेन पदों पर बहालियां मेमोरेंडम ऑफ आर्टिकल 32 (i) के मुताबिक होने वाली चयन प्रक्रिया के तहत ही हो, और इस समय जो बिना चयन प्रक्रिया के प्रमुख पदों पर बैठे हैं उन्हें तत्कल प्रभाव से हटाया जाए, यह भी उनकी प्रमुख मांगों में शामिल है। वे कहते हैं शीर्ष प्रबंधन की मनमानी का आलम यह है कि पदोन्नति पद के बढ़े हुए जो तीन वेतनमान 2009 तक सभी कर्मचारियों,     अभियंताओं और अपर अभियंताओं को मिलते थे, उन्हें भी बंद कर दिया गया है। कर्मचारियों की मांग है कि उस पुरानी व्यवस्था को पुनः लागू किया जाए।

जितेंद्र बताते हैं कि 2018 से विद्युत कर्मचारी सुरक्षा कानून का एक मसौदा भी तैयार है लेकिन प्रदेश सरकार ने अभी तक उसे कैबिनेट से पास नहीं कराया जो बेहद खेद का विषय है। वे कहते हैं फील्ड में कर्मचारियों के साथ मार पिटाई की घटनाएं बढ़ रही हैं, यह कानून उन्हें विशेष सुरक्षा देता लेकिन पिछले चार वर्षों से यह केवल मसौदा बनकर ही रह गया।

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जितेंद्र साफ-साफ कहते हैं अभी तो शिफ्ट में काम करने वाले कर्मचारियों को कार्य बहिष्कार से मुक्त रखा गया है लेकिन अगर उनकी मांगों पर शीर्ष प्रबंधन, उत्तर प्रदेश सरकार और प्रदेश के ऊर्जा मंत्री संज्ञान नहीं लेते हैं तो मजबूरन पाली कर्मचारियों द्वारा भी काम ठप्प कर दिया जायेगा फिर इसके बाद बिजली को लेकर प्रदेश में जो भी हालात पैदा होंगे उसकी जिम्मेदार ऊर्जा निगमों का शीर्ष प्रबंधन होगा। उन्होंने बताया कि प्रदेश भर में 70 हजार संविदाकर्मी और 35 हजार नियमित कर्मचारी हैं जो आंदोलनरत हैं।

संघर्ष समिति के संयोजक शैलेंद्र दुबे ने ऊर्जा मंत्री अरविन्द कुमार शर्मा से प्रभावी हस्तक्षेप करने की अपील करते हुए चेतावनी दी कि अगर शांतिपूर्ण कार्य बहिष्कार आन्दोलन के कारण किसी भी बिजलीकर्मी का कोई उत्पीड़न किया गया तो इसके गंभीर परिणाम होंगे और सभी ऊर्जा निगमों के तमाम बिजलीकर्मी उसी वक्त हड़ताल पर चले जाएंगे। वे कहते हैं बिजली निगमों के शीर्ष प्रबंधन के दमनात्मक रवैये से बिजलीकर्मियों में इतना गुस्सा है कि वे इस तनावपूर्ण में काम नहीं कर पा रहे। वे कहते हैं सभी जिलों में उनका आंदोलन सफलता पूर्वक चल रहा है।

जयप्रकाश, जो कि राज्य विद्युत परिषद जूनियर इंजीनियर संगठन के केंद्रीय महासचिव हैं, ने बताया कि प्रदेश के 75 जिलों और 11 परियोजनाओं में हर जगह विद्युत कर्मचारियों का कार्य बहिष्कार जारी है। वे कहते हैं ऊर्जा निगमों के उच्च प्रबंधनों द्वारा लागातार जो हिटलरशाही चल रही है वह अब नहीं सहेंगे। उनके मुताबिक प्रबंधन द्वारा श्रम नियम कानूनों, सरकार के आदेश, नीतियों के इतर जाकर कर्मचारियों से काम लिया जा रहा है जिसका समय-समय पर संगठनों, कर्मचारी प्रतिनिधियों द्वारा विरोध किया जाता रहा है लेकिन प्रबंधन ने इसे भी अनसुना कर दिया है।

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जयप्रकाश का कहना है कि तो उत्तर प्रदेश सरकार कहती है कि कर्मचारियों से सकरात्मक संवाद कर उनके विवाद और समस्याओं का समाधान किया जाए जबकि शीर्ष प्रबंधन इस ओर कोई कदम बढ़ाता ही नहीं, इस रस्साकाशी में पिस रहा है तो बस कर्मचारी। उनके मुताबिक करीब दो साल पहले पूर्वांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड के निजीकरण के खिलाफ़ भी प्रदेश भर में वे लोग लामबंद होकर विरोध में उतरे थे तब सरकार से आश्वासन मिला था कि न केवल पूर्वांचल बल्कि प्रदेश के किसी भी विद्युत वितरण निगमों का निजीकरण नहीं किया जायेगा तब सरकार के मंत्रिमंडल समिति से हुए समझौते पर चेयरमैन, एमडी, के भी हस्ताक्षर थे। इस समझौते को भी ताक पर रखकर शीर्ष प्रबंधन ने पूर्वांचल सहित पूरे प्रदेश में जितने भी ट्रांसमिशन की इकाइयां हैं उनमें शत प्रतिशत आउटसोर्सिंग की ओर बढ़ चुके हैं जो कि कर्मचारियों के साथ सरासर धोखा है।

वे कहते हैं आज बिजली क्षेत्र की हालत बिगड़ रही है जिसका महत्वपूर्ण कारण है कर्मचारियों की घोर कमी। वे बताते हैं कि पहले 25 से 30 लाख उपभोक्ताओं में सवा लाख कर्मचारी होते थे लेकिन आज सवा तीन करोड़ उपभोक्ताओं में 45000 कर्मचारियों से भी कम रह गये हैं जो एक असन्तुलित अनुपात है इसलिए उनकी एक मांग कर्यानुसार कर्मचारियों की संख्या बढ़ाने की भी है।

अन्य प्रमुख मांगे हैं, ऊर्जा निगमों में चेयरमैन और प्रबंध निदेशक के पदों पर समुचित चयन के बाद ही नियुक्ति की जाए। बिजली कर्मियों को पूर्व की तरह नौ वर्ष, 14 वर्ष एवं 19 वर्ष की सेवा के उपरांत पदोन्नति पद का समयबद्ध वेतनमान दिया जाए। बिजली कर्मियों की ट्रांसफार्मर वर्कशॉप का निजीकरण एवं पारेषण विद्युत उपकेंद्रों के परिचालन एवं अनुरक्षण के आउट सोर्सिंग के आदेश निरस्त किया जाएं और कार्मिकों के लिए पुरानी पेंशन की व्यवस्था लागू की जाए। बिजली कर्मियों की सुरक्षा के लिए प्रोटेक्शन एक्ट लागू किया जाए साथ ही कैशलेस इलाज की सुविधा मुहैया कराई जाए।

वहीं पर संघर्ष समिति के पदाधिकारियों ने चेतावनी दी है कि यदि शान्तिपूर्ण कार्य बहिष्कार आन्दोलन के कारण किसी भी बिजली कर्मी का उत्पीड़न किया या तो इसके गम्भीर परिणाम होंगे और सभी ऊर्जा निगमों के तमाम बिजली कर्मी उसी समय हड़ताल पर जाने हेतु बाध्य होंगे। इसकी सारी जिम्मेदारी ऊर्जा निगमों के शीर्ष प्रबन्धन और चेयरमैन की होगी। हालांकि विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति के आह्वान पर चल रहे कार्य बहिष्कार से कुछ जिलों के उपभोक्ताओं की मुश्किलें बढ़ने की खबरें आ रही हैं। गोरखपुर, वाराणसी, सिद्धार्थनगर, बलिया, आजमगढ़, जौनपुर, भदोही, गाजीपुर, सुल्तानपुर, अयोध्या, गोंडा, प्रतापगढ़, प्रयागराज, कौशांबी, फतेहपुर, अमेठी, बाराबंकी, सहारनपुर, गाजियाबाद व चित्रकूट समेत कई जिलों में आपूर्ति व्यवस्था बुरी तरह से प्रभावित हुई है। उपभोक्ताओं को घंटों बिजली नहीं मिल पा रही है।

समिति के पदाधिकारियों का कहना है कि शीर्ष प्रबंधन ऊर्जा मंत्री के निर्देशों की भी अनदेखी कर रहा है। पावर कॉर्पोरेशन के चेयरमैन ने भय का वातावरण बना रखा है जिससे कर्मचारियों का काम करना मुश्किल हो गया है। ऊर्जा निगमों को तानाशाही से मुक्त कराने के लिए आंदोलन में विद्युत मजदूर संगठन भी शामिल हो गया। साथ ही विद्युत कर्मियों के इस आंदोलन का राज्य कर्मचारी संयुक्त परिषद ने भी समर्थन किया है।

(लखनऊ से सरोजिनी बिष्ट की रिपोर्ट।)

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