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Thursday, September 16, 2021

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इंसान से ज्यादा पशुओं पर जोर! गुजरात की एक टेक्निकल यूनिवर्सिटी में सरकार ने खोला गाय अनुसंधान केन्द्र

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कोरोनाकाल में भी केंद्र सरकार और भाजपा की राज्य सरकारों का फोकस इन्सानों से ज़्यादा गायों पर रहा है। इसी कड़ी में गुजरात में गुजरात प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (जीटीयू) ने 5 जून 2021 को एक गाय अनुसंधान केंद्र (गौ अनुसंधान इकाई) की स्थापना की है। इसकी स्थापना राष्ट्रीय कामधेनु आयोग चलाये जा रहे कामधेनु चेयर के एक अंग के तौर पर की गयी है। राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने शनिवार को केंद्र का आभासी उद्घाटन किया। राष्ट्रीय कामधेनु आयोग के पूर्व अध्यक्ष वल्लभभाई कथिरिया भी मौजूद थे। इस सेंटर का उद्देश्य राज्य में गाय के दूध, गौमूत्र और गोबर के पारंपरिक उपयोग को बढ़ावा देना है।
राज्यपाल आचार्य देवव्रत, जो कि स्वयं वैदिक अध्ययन और देशी गायों के संरक्षण के हिमायती हैं ने इस मौके पर मीडिया से कहा है कि गुजरात तकनीकी विश्वविद्यालय इस विषय में एक प्रमुख भूमिका निभा सकता है।

गाय अनुसंधान केंद्र इस क्षेत्र में काम करने वाले अन्य विश्वविद्यालयों, जिसमें कामधेनु विश्वविद्यालय और कृषि विश्वविद्यालय शामिल हैं, सहयोगी अनुसंधान के लिए समस्या कथन (problem statements) आमंत्रित करेगा। इसके अलावा गुजरात टेक्निकल यूनिवर्सिटी ने ग्रामीण महिलाओं को गाय के गोबर और गौमूत्र से उत्पाद बनाने के लिए रोजगार देने की भी योजना बनायी है।

इस अवसर पर जीटीयू के कुलपति नवीन शेठ ने मीडिया से कहा है कि- “वर्तमान में, गायों पर जो प्रचलित है वह बहुत अधिक भावनात्मक बात है लेकिन अभी तक बहुत अधिक वैज्ञानिक कार्य नहीं किए गये हैं। हम वैज्ञानिक अनुसंधान और नवाचारों के माध्यम से पारंपरिक ज्ञान स्थापित करने का प्रस्ताव करते हैं।”

जीटीयू के ग्रेजुएट स्कूल ऑफ फ़ार्मेसी के प्रोफेसर संजय चौहान ने अनुसंधान के संभावित क्षेत्रों पर कहा कि गौमूत्र के औषधीय उपयोग, उर्वरक के रूप में इसके उपयोग के साथ-साथ देशी गाय की नस्लों पर आनुवंशिक अनुसंधान भी हो सकता है।

वहीं जीटीयू के ग्रेजुएट स्कूल ऑफ फॉर्मेसी के प्रोफेसर संजय चौहान ने इंडियन एक्सप्रेस से बात करते हुये बताया है कि गाय अनुसंधान केंद्र में रिसर्च का संभावित क्षेत्र गौमूत्र का चिकित्सीय (नैदानिक) इस्तेमाल, उर्वरक के तौर पर इसके इस्तेमाल और गायों के देशी बीजों पर जेनेटिक रिसर्च है। गौ अनुसंधान केंद्र का लक्ष्य गाय के सूक्ष्म जीवाणुओं (microbial flora) पर वैज्ञानिक कार्य करने का है। गौमूत्र में बहुत सारे रोगाणु और गैर-रोगजनक जीव होते हैं। अनुसंधान और नवाचारों के माध्यम से इन रोगजनकों का कई रूपों में उपयोग किया जा सकता है। इसके अलावा, गाय आधारित नवाचारों जैसे गौमूत्र के अर्क का गुणवत्ता नियंत्रण जिसका कि औषधीय महत्व है और साथ ही भूमि के निषेचन और पुनर्जनन में इसका उपयोग होता है।


गौ-ज्ञान की ऑनलाइन परीक्षा

इससे पहले 5 जनवरी को एक प्रेस रिलीज जारी करके राष्ट्रीय कामधेनु आयोग ने देशी गायों और इसके फायदे के बारे में छात्रों और आम लोगों के बीच रुचि पैदा करने के लिए वह 25 फरवरी को राष्ट्रीय स्तर की स्वैच्छिक ऑनलाइन गौ विज्ञान परीक्षा का आयोजन करने की घोषणा की थी। अपनी तरह की इस पहली परीक्षा की घोषणा करते हुए राष्ट्रीय कामधेनु आयोग (आरकेए) के अध्यक्ष वल्लभभाई कथीरिया ने कहा था कि वार्षिक तरीके से परीक्षा का आयोजन होगा। बिना किसी शुल्क के कामधेनु गौ विज्ञान प्रचार प्रसार परीक्षा में प्राथमिक, माध्यमिक और कॉलेज स्तर के छात्र और आम लोग हिस्सा लें।

उन्होंने संवाददाताओं से कहा था कि –“देशी गायों के बारे में छात्रों और नागरिकों के बीच जन जागरुकता पैदा करने के लिए कामधेनु आयोग ने गौ विज्ञान पर राष्ट्रीय परीक्षा आयोजित करने का निर्णय किया है। आयोग गौ विज्ञान पर अध्ययन सामग्री उपलब्ध करवाने की तैयारी कर रहा है। कथीरिया ने बताया था कि परीक्षा में वस्तुनिष्ठ प्रश्न पूछे जाएंगे और आयोग की वेबसाइट पर पाठ्यक्रम के बारे में ब्योरा उपलब्ध कराया जाएगा। परीक्षा के नतीजों की तुरंत घोषणा कर दी जाएगी और प्रमाणपत्र दिए जाएंगे। होनहार उम्मीदवारों को पुरस्कार और प्रमाणपत्र दिए जाएंगे। आयोग के अध्यक्ष ने कहा कि गाय और संबंधित मुद्दों पर पीठ और अनुसंधान केंद्र की स्थापना के लिए विश्वविद्यालयों से अच्छी प्रतिक्रिया मिली है।

गौरतलब है कि मत्स्य पालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत आने वाले कामधेनु आयोग की स्थापना केंद्र ने फरवरी 2019 में की थी और इसका लक्ष्य गायों के संरक्षण, संवर्द्धन के लिए काम करना है।

लेकिन परीक्षा की तारीख से ठीक 4 दिन पहले 21 फरवरी को देशी गायों के बारे में छात्रों में जागरूकता बढ़ाने के लिए आयोजित होने वाली राष्ट्रीय गौ विज्ञान परीक्षा स्थगित कर दी गयी। राष्ट्रीय कामधेनु आयोग ने अपनी वेबसाइट पर इस संबंध में एक नोटिफिकेशन जारी करते हुये बताया था कि कामधेनु गौ विज्ञान प्रचार प्रसार ऑनलाइन परीक्षा और इससे पहले 21 फरवरी को होने वाले मॉक टेस्ट को भी स्थगित कर दिया गया है। जल्द ही इसके बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी दी जाएगी। रिपोर्ट के अनुसार इस परीक्षा के लिए करीब पांच लाख अभ्यर्थियों ने रजिस्ट्रेशन किया था।


गौरतलब है कि गौ विज्ञान परीक्षा चार श्रेणियों में आयोजित होनी थी। पहला स्तर प्राथमिक से 8वीं कक्षा तक था। दूसरा  9वीं से 12वीं तक, तीसरा कॉलेज स्तर पर और चौथा आम जनता के लिए। 100 अंकों की यह परीक्षा ऑब्जेक्टिव टाइप का होना था। इसके लिए एक घंटे का समय निर्धारित था। और परीक्षा 12 भाषाओं-  हिंदी संस्कृत, अंग्रेजी, गुजराती, पंजाबी, मराठी, कन्नड़, मलयालम, तमिल, मराठी, तेलुगू और उड़िया भाषा में आयोजित की जानी थी। परीक्षा में शामिल होने वाले अभ्यर्थियों को पुरस्कार और सर्टिफिकेट देने की भी बात कही गयी थी।

गुजरात: गौशाला में खोला गया कोरोना सेंटर, मरीजों को दी जा रही हैं दूध और गोमूत्र से बनी दवाएं

05 मई को गुजरात के बनासकांठा जिले में एक गौशाला के अंदर एक कोविड केयर सेंटर तैयार किया गया। इस कोविड सेंटर को ‘वेदालक्षन पंचगव्य आयुर्वेद कोविड आइसोलेशन सेंटर’ का नाम दिया गया जहां कोरोना मरीजों का इलाज पंचगव्य (गाय का दूध, घी, दही, गौबर, गोमूत्र) से किया जा रहा था। मीडिया को बताया गया था कि यहां कोराना के उन मरीजों का इलाज किया जा रहा है, जिनमें इस वायरस के हल्के लक्षण थे।

मीडिया से बातचीत करते हुए गौशाला के ट्रस्टी मोहन जाधव ने बताया था कि कोरोना की पॉजिटिव रिपोर्ट आने बाद इन मरीजों को यहां भर्ती कराया गया है। हमने इस सेंटर की शुरुआत 05 मई को की थी। दीसा तालुका के एक गांव के 7 मरीजों को भर्ती कराया गया है। यहां 8 आयुर्वेदिक दवाओं से मरीजों का इलाज किया जा रहा है। इन दवाओं को गाय के दूध, घी और गोमूत्र से तैयार किया गया है।

मोहन जाधव ने आगे बताया था कि यहां मुख्य रूप से कोविड-19 के हल्के लक्षणों वाले रोगियों के इलाज के लिए पंचगव्य आयुर्वेद चिकित्सा का इस्तेमाल किया जा रहा है। हम ‘गौ तीर्थ’ का उपयोग करते हैं जो ‘देसी’ गायों और अन्य जड़ी बूटियों के मूत्र से बनता है। यहां खांसी का इलाज होता है और यहां हम गोमूत्र आधारित दवा का उपयोग करते हैं। हमारे पास एक प्रतिरक्षा बूस्टर च्वनप्राश है जो गाय के दूध से बनता है।


कोरोना के बरअक्श गौमूत्र और गाय गोबर का विमर्श

भाजपा और आरएसएस गौ संरक्षण, गौशाला और बीफ का सांप्रदायिक इस्तेमाल सांप्रदायिक ध्रुवीकरण पहले से ही करती आ रही है। मोदीराज-01 में देश ने इसका चरम भी देखा है। लेकिन धर कोरोनाकाल में गौमूत्र औऱ गोबर स्नान का विमर्श पूरे जोर पर है।

इधर कोरोनाकाल में कोरोना से मुक्ति के लिये गौमूत्र, गोबर स्नान और गोबर के कंडों से यज्ञ करने की भाजपा के मंत्रियों, सांसदों, विधायकों ने जिस तरह से अलग अलग मंचों से अपील की है वो शर्मानाक है। एक बार में लग सकता है कि ये लोग बेवकूफ और जाहिल हैं इसलिये ऐसा कर रहे हैं। लेकिन नहीं, इनके बयानों और अपीलों के पीछे एक राजनीतिक कार्ययोजना है, जिसके तहत लगातार इधर कई भाजपा नेताओं गौमूत्र और गोबर स्नान से कोरोना के ट्रीटमेंट वाला बयान देते आ रहे हैं। बयान देने वाले लोग अपने क्षेत्रों के जनप्रतिनिधि हैं और जनता ने उन्हें चुना है। जाहिर इन नेताओं का अपने क्षेत्रों में कुछ मास बेस होगा। जब ये लोग बयान देते हैं, या अपील करते हैं तो जाहिर है जन समाज का कुछ न कुछ हिस्सा, तबका प्रभावित ज़रूर होता है। भोले लोग कहते हैं अरे इतना बड़ा मंत्री, इतना बड़ा नेता कह रहा है तो कुछ न कुछ तो ज़रूर होता होगा ना। और फिर वो तबका दूसरों को प्रभावित करता है।    

दरअसल भाजपा और आरएसएस ने गाय को एक जानवर से अलग एक दैवीय मातृशक्ति में निरूपित कर दिया है। जिसके गोबर और गोमूत्र से जब वो कोरोना के इलाज का वितंडा रचते हैं तो कहीं न कहीं कोरोना महामारी को आसुरी या दैवीय प्रकोप साबित करने की कोशिश करते हैं। जिसके लिये सरकार नहीं बल्कि समाज में बढ़ रहा कथित पाप और कदाचार जिम्मेदार है। इस तरह इस तरीके के विमर्श रचकर भाजपा आरएसएस सरकारी की नाकामियों को बाइपास करना चाहता है।      

इसी कार्ययोजना के तहत आरएसएस के लोग उत्तर प्रदेश के तमाम शहरों और कस्बों में गाय के गोबर के कंडो और घी की धुंकनी सुलगाकर कोरोना भगाने और पर्यावरण की शुद्धि का दावा कर रहे हैं।

भाजपा आरएसएस ने समाज की चेतना को किस हद तक कुंठित, अंधविश्वासी और जड़ बना दिया है उसके कुछ उदाहरण नीचे के ट्वीट वीडियो में है।

उपरोक्त वीडियो भाजपा शासित राज्यों जैसे कि गुजरात, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक आदि से हैं।

(जनचौक के विशेष संवादाता सुशील मानव की रिपोर्ट)

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