पर्यावरण: बजट में टिकाऊ विकास के लिए जुबानी भुगतान

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“भारत को प्रभावित करने वाला सबसे बड़ा खतरा है जलवायु परिवर्तन”-यह बात भारत की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट पेश करते हुए संसद में कही। उनके भाषण और बजट के दस्तावेज में टिकाऊ विकास का जिक्र हुआ, जिससे यह संकेत निकाला जा सकता है कि ग्लासगोव में विश्व जलवायु सम्मेलन में प्रधानमंत्री की घोषणाओं और संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों (यूएन एसडीजी) को पूरा करने को लेकर भारत गंभीर है। परन्तु बजटीय आवंटनों की पड़ताल करने पर निराशा हाथ लगती है।

भारत में पर्यावरण से जुड़े मामलों की देखभाल प्राथमिक तौर पर वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय करती है। उसके हिस्से में कुल बजट का महज 0.08 प्रतिशत हिस्सा आया है। सरकार इस मंत्रालय की भूमिका को कितना महत्वपूर्ण मानती है, इससे ही स्पष्ट है। पारिस्थितिकी के लिहाज से दूसरे मंत्रालयों का रवैया भी संवेदनशील नहीं दिखता।

1991 में आर्थिक उदारीकरण की नीति अपनाने के बाद से ही इस मंत्रालय का बजट लगातार घटता गया है। यह कभी पूरे बजट का एक प्रतिशत भी नहीं रहा। इस वर्ष का आवंटन 0.08 प्रतिशत शायद न्यूनतम है। पर्यावरण के वानिकी व वन्यजीव विभाग के लिए बजट आवंटन थोड़ा बढ़ा है जो सराहनीय है। पर जैसाकि पर्यावरण कार्यकर्ता आशीष कोठारी कहते हैं कि इससे हो सकने वाला फायदा बड़े पैमाने पर अधिसंरचनात्मक विकास की वजह से प्राकृतिक इकोसिस्टम के विनाश में तब्दील हो जाने वाला है। इसके अलावा सरकारी वानिकी व वन्यजीव संरक्षण मोटे तौर पर अपवर्जन पर आधारित होता है जिसका परिणाम वनवासियों की आजीविका का विनाश और कई बार इकोसिस्टम पर निर्भर आबादी, खासकर आदिवासियों के विस्थापन के रूप में होता है। वनाधिकार कानून 2006 उन लोगों के सामूहिक अधिकारों को स्वीकार करके एक संतुलन कायम कर सकता है और सामुदायिक वन-संरक्षण का मार्ग प्रशस्त कर सकता है, पर इस कानून के कार्यान्वयन की अवस्था संतोषप्रद नहीं है और बजट में इस स्थिति में बदलाव लाने में सहायता करने के लिए कोई आवंटन नहीं है।

दुखद यह है कि बजट में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए बनी राष्ट्रीय स्वच्छ वायु योजना के बजटीय आवंटन को कम कर दिया गया है। पूरे देश के नगर व महानगर वायु प्रदूषण को लेकर अक्सर सुर्खियों में आते रहते हैं। उल्लेखनीय है कि दुनिया के 25 सर्वाधिक प्रदूषित नगरों में 12 भारत में स्थित हैं। हर साल दस लाख से अधिक लोग वायु प्रदूषण की वजह से मारे जाते हैं और प्रदूषण के वर्तमान स्तर पर दिल्ली व कोलकत्ता समेत देश के औसत नागरिक की जीवन-प्रत्याशा में 9 वर्षों की कमी हो रही है।

वास्तव में हर प्रकार की आर्थिक गतिविधियों के पर्यावरणीय प्रभाव होते हैं। इसलिए पर्यावरण, पारिस्थितिकी और टिकाऊपन को योजना व बजट बनाने के दौरान केंद्रीय मानने की मांग दशकों से होती रही है। इस लिहाज से भी ताजा बजट(2022-23) को देखें तो निराशा के सिवा कुछ हासिल नहीं होता।

भारत की 60 प्रतिशत आबादी की आजीविका का प्राथमिक साधन खेती है और इसकी 60 प्रतिशत जमीन पर खेती होती है, निश्चित तौर पर विकास के टिकाऊपन के लिहाज से खेती को उच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए। पर बीते कुछ दशकों से हरित क्रांति, श्वेत क्रांति व नीली क्रांति के दौर में उच्च निवेश आधारित, रसायन-निर्भर व एकल उत्पादन का दौर आया जिसका पारिस्थितिकी संतुलन पर गंभीर प्रभाव पड़ा। इस बारे में अनेक अध्ययन हुए हैं। इस लिहाज से ‘पूरे देश में रसायन-मुक्त, प्रकृति-सम्मत और जैविक खेती’ को प्रोत्साहन देने की वित्तमंत्री की घोषणा उत्साहवर्धक है। इसी तरह मोटे अनाज( जौ-बाजरा), कई तरह के मसालों और उन अनाजों को प्रोत्साहित करने की घोषणा है जिसे भारतीय किसान परंपरागत रूप से उपजाते रहे हैं और जिन्हें धान व गेहूं ने बड़े पैमाने पर विस्थापित कर दिया है।

हालांकि इस कायाकल्प को साकार करने के लिए विशेष आवंटन नहीं किया गया है, और यह भी स्पष्ट नहीं है कि इस तरह की खेती को लाभकारी बनाने, उर्वरक व बाजार उपलब्ध कराने में किस तरह की सहायता करने की योजना सरकार की है। गौरतलब है कि इस बजट में एक बड़ा आवंटन रसायनिक उर्वरकों को रियायत देने के लिए है, जिसे जैविक उर्वरकों को आवंटित किया जा सकता था। इसके अतिरिक्त, सूखे इलाकों और वर्षा जल पर निर्भर खेती पर मामूली ध्यान दिया गया है, जो आज भी कुल खेती का 60 प्रतिशत है और पारिस्थितिकी के लिहाज से एकीकृत खेती के मुकाबले कहीं अधिक  टिकाऊ है। 

दूसरी समस्या यह है कि बड़े-बड़े निगम तेजी से जैविक क्षेत्र में घुसपैठ कर रहे हैं, क्योंकि इस क्षेत्र में उन्हें बड़ा मुनाफा दिख रहा है। बजट में खाद्य-प्रसंस्करण उद्योग  को प्रोत्साहन देने की बात की गई है, पर इस क्षेत्र को विकेंद्रित ग्राम आधारित ईकाइयों के लिए आरक्षित नहीं किया गया है। इसके साथ कंट्रैक्ट फार्मिंग और व्यावसायिक कृषि को बढ़ावा देने का नतीजा होगा कि बड़े घराने गैर-रसायनिक खेती पर भी कब्जा कर लेंगे। यह मोटे तौर पर वही है जिसका डर तीन कृषि कानूनों को लेकर जताया जा रहा था।     

शहरी रहन-सहन में टिकाऊपन लाने के उपायों का उल्लेख बजट में प्रमुखता से किया गया है। इसके उपाय सुझाने के लिए एक उच्चस्तरीय समिति बनाई जा रही है। हमें इसकी सिफारिशों और उसके आधार पर सरकार की कार्रवाई का इंतजार करना होगा।

बजट का एक अन्य उल्लेखनीय मुद्दा सार्वजनिक परिवहन है, लेकिन इस मामले में अधिकांश आवंटन मेट्रो सेवाओं के लिए है। जिसके निर्माण में अत्यधिक कार्बन उत्सर्जन होता है और जिसका संचालन बेहद खर्चीला है। इलेक्ट्रिक वाहनों की सहायता करना भी सकारात्मक है लेकिन इसका लाभ तो मुख्यतौर पर अमीर उपभोक्ताओं को मिलेगा। बसों, साइकिलों और पैदल चलने वालों को प्रोत्साहित करने का कोई संकेत नहीं है जिसका लाभ अधिकतर नगरवासियों को हो सकता है और जो पर्यावरण के प्रति संवेदनशील कदम होता। वाटरएड इंडिया के वीआर रमन कहते हैं कि टिकाऊ शहरी रहन-सहन को प्रोत्साहित करने के लिए जितने प्रावधान किए गए हैं, उनमें कोई भी छोटे शहरों के लिए फायदेमंद नहीं दिखता। इसकी अनदेखी पिछले बजटों में भी की जाती रही है।

(अमरनाथ झा वरिष्ठ पत्रकार होने के साथ पर्यावरण मामलों के जानकार भी हैं। आप आजकल पटना में रहते हैं।)

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