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‘पेंटिंग्स’ बैन करने वाले फेसबुक के लिए सांप्रदायिक, नफ़रती, नस्लवादी पोस्ट है ‘राइट टू फ्री स्पीच’

‘मानव इतिहास के किसी

अभागे क्षण में

हमने ये तय किया

कि

हमें नग्नता विचलित करेगी

पर

युद्ध सहज लगेगा’

‘किताब घर’ के पेज से ली गई उपरोक्त पंक्तियाँ फेसबुक की नीतियों पर हूबहू लागू होती हैं। आप चाहे जितनी हिंसक तस्वीर या वीडियो फेसबुक पर डाल दीजिए वह न तो वो पोस्ट हटाएगा न आपको बैन करेगा, फोटो कवर कर देगा लेकिन आप कोई ऐतिहासिक न्यूड पेंटिंग डाल दीजिए फिर तो आपकी ख़ैर नहीं। फेसबुक आपको तीन से 7 दिन के लिए बैन कर देगा।

दरअसल ‘राइट टू फ्री स्पीच’ की आड़ में फेसबुक नफ़रत, सांप्रदायिक विभाजन और हिंसा व हत्या के विचार को प्रमोट करता है लेकिन वह गांधीवादी ‘अव्यक्त’ के मानवीयता को संबोधित पोस्ट, पाकिस्तान के बुद्धिजीवी व नागरिक समाज की प्रशंसा के पोस्ट, दक्षिणपंथी नफ़रत हत्या के विरोध के पोस्ट और अभिव्यक्ति को नया आयाम देते पेंटिंग के पोस्ट को ब्लॉक कर देता है। तब फेसबुक की ‘राइट टू फ्री स्पीच’ की नीति जाने कहां चली जाती है। इस रिपोर्ट में हम देखेंगे कि कैसे फेसबुक अपने प्लेटफॉर्म से नस्लवाद, सांप्रदायिकता और विभाजन को बढ़ावा देता है।   

‘राइट टू फ्री स्पीच’ की आँड़ में सांप्रदायिकता और नस्लवाद को समर्थन

फेसबुक प्लेटफॉर्म लगातार ‘राइट टू फ्री स्पीच’ के नाम पर विभाजनकारी सांप्रदायिकता, नफ़रत और नस्लवाद और गलत सूचनाओं (दक्षिणपंथी प्रोपोगैंडा) को प्रमोट करता आया है। हाल ही में जॉर्ज फ्लॉयड की हिरासत में हत्या के खिलाफ़ पूरे अमेरिका और यूरोप में उठे ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ आंदोलन के बाद ट्विटर द्वारा अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा राज्य हिंसा को बढ़ावा देने वाला ट्वीट-‘लूटिंग स्टार्ट शूटिंग स्टार्ट’ को नोटिस भेजने और ट्विटर तथा यूट्यूब द्वारा राजनीतिक विज्ञापनों को न लेने के फैसले के बाद से फेसबुक के खिलाफ़ एक माहौल बन गया है।

फेसबुक लगातार अभिव्यक्ति की आजादी की दुहाई देकर ‘हेट स्पीच’,नस्लवादी विभाजन और ‘मिसइन्फार्मेशन’ को प्रमोट करता रहा है। वहीं इसी साल होने वाले राष्ट्रपति के चुनाव के लिए चल रहे चुनाव कैंपेन में भ्रामक सूचनाओं को भी फेसबुक राजनीतिक पार्टियों से पैसे लेकर प्रमोट कर रहा है जबकि ट्विटर और यूट्यूब ने राजनीतिक विज्ञापनों से किनारा कर लिया है।

फेसबुक का यहूदी विरोधी पोस्ट हटाने से इंकार

फेसबुक जर्मनी में भी कई विवादों में घिरा हुआ है। कुछ वर्ष पूर्व फेसबुक के मुखिया मार्क जुकरबर्ग ने ऐसी पोस्ट हटाने से इनकार कर दिया था जिनमें यहूदी नरसंहार को खारिज किया गया था।

जर्मन सरकार चाहती है कि ऐसे यहूदी विरोधी पोस्ट हटाए जाएं, लेकिन जुकरबर्ग ने ऐसा करने से साफ इंकार कर दिया और कहा कि उनके यूजर्स को किसी मुद्दे पर अपनी अलग राय रखने का पूरा अधिकार है। फेसबुक के इस कदम की जर्मन सरकार ने कड़ी आलोचना की। दूसरे विश्व युद्ध के दौरान 60 लाख यहूदियों के कत्ल से इंकार करना जर्मनी और कई यूरोपीय देशों में अपराध है। लेकिन बहुत से लोग यहूदी नरसंहार पर सवाल उठाते हैं। ऐसे लोगों की टिप्पणी और पोस्ट को सेंसर करने से तो फेसबुक ने इंकार कर दिया।

जुलाई 2018, फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग ने वॉक्स के एक रिकॉर्डेड साक्षात्कार, में यहूदियों के जनसंहार को नकारने वाले पोस्ट पर कहा था- “मुझे नहीं लगता है कि हमारे प्लेटफॉर्म से ये हटाया जाना चाहिए, क्योंकि मुझे लगता है कि ऐसी चीजें हैं जो अलग-अलग लोगों को गलत लगती हैं।” “मुझे नहीं लगता कि वे जानबूझकर इसे गलत तरीके से ले रहे हैं -“I don’t believe that our platform should take that down because I think there are things that different people get wrong. I don’t think that they’re intentionally getting it wrong….”

न्यूयॉर्क टाइम्स ने 28 नवंबर 2016 को फेसबुक के किलाफ़ “Facebook Runs Up Against German Hate Speech Laws” नाम से एक आर्टिकल प्रकाशित किया था।

यहूदियों के खिलाफ़ साल 1938 में चलाए गए नाजी प्रोग्राम क्रिस्टल्लनचट की 78वीं वर्षगांठ थी, और एक 35 वर्षीय इजरायल व्यक्ति Yorai Feinberg जो कि बर्लिन में एक रेस्तरां चलाते थे इस बात से अनजान थे कि एक दक्षिणपंथी फेसबुक पोस्ट में शेयर किए गए शहर के नक्शे में उनका मोबाइल नंबर और रेस्त्रां चिन्हित है, पोस्ट किया गया था, जो कि बहुत दूर था।

सही समूह ने फेसबुक पर प्रकाशित किया था। सोशल मीडिया फेसबुक पर प्रकाशित उस पोस्ट में शहर के सभी यहूदी संस्थानों और यहूदियों के व्यवसाइयों के नाम और पता ‘यहूदी हमारे बीच’ बैनर से सूचीबद्ध किए गए थे। सोशल मीडिया पर इस लिस्ट के प्रकाशित होने के थोड़ी देर बाद ही फ़िनबर्ग के पास गुमनाम फोन कॉल करते हुए एक शख्स ने कहा,- “I hate Jews.”

हाई प्रोफाइल यहूदी विरोधी कांसपिरेसी थियरिस्ट के बैन करने से पहले तक फेसबुक ‘denying the Holocaust’ पोस्ट को प्रमोट करता रहा।

https://t.co/QMqUlSVTpW https://t.co/3Igz4iakgo

फेसबुक के खिलाफ़ ‘स्टॉप हेट फॉर प्रॉफिट’ कैंपेन

फेसबुक द्वारा मुनाफे के लिए नस्लवाद और भ्रामक सूचनाओं को प्रमोट करने की नीति के खिलाफ़ 17 जून को कलर ऑफ चेंज, एनएएसीपी, एडीएल, स्लीपिंग जाइंट्स, फ्री प्रेस, और कॉमन सेंस मीडिया जैसी कंपनियों के एक समूह ने सांप्रदायिक नफ़रत, विभाजनवादी और नस्लवादी पोस्ट को प्रमोट करने वाले फेसबुक के खिलाफ़ स्टॉप हेट फॉर प्रॉफिट कैंपेन शुरु किय है। इस कैंपेन के तहत फेसबुक पर विज्ञापन देने वाले ब्रांडों और कंपनियों से जुलाई 2020 तक फेसबुक और इंस्टाग्राम पर विज्ञापन रोकने के लिए अपील करते हुए मांग किया कि फेसबुक अपने प्लेटफॉर्म से नस्लवाद के खिलाफ़ सख्ती अख्तियार करे । स्लीपिंग जाइंट्स इस मुहिम की प्रमुख संयोजक हैं।

‘बायकॉट फेसबुक’ मुहिम के शुरु होने के सप्ताह भर बाद ही कोकाकोला, पेप्सी, यूनीलिवर, होंडा, लिवाइस स्ट्रॉस अब तक 150 से अधिक कंपनियां फेसबुक के बहिष्कार मुहिम से जुट चुकी हैं। इसमें प्रमुख रूप से ‘नॉर्थ फेस, पैटागोनिया, आर्कटेरिक्स, आउटडोर रिटेलर आरईआई, बेन एंड जेरी, एलीन फिशर, एडी बाउर, मैगनोलिया पिक्चर्स, अपवर्क, हायररिंग, डैशलेन और टाकस्पेस, अडाफ्रूट, मोजिला, लोकल पोस्टल, गुडबाय सिल्वरस्टीन शामिल हैं। गुरुवार को ‘वेरजोन’ (हफपोस्ट की पितृ कंपनी) भी बायकाट मुहिम में शामिल हो गई।

शिकायत फेसबुक की कंटेंट पॉलिसी को लेकर है। कंटेंट यानी फेसबुक पर दिखने वाले वीडियो, आर्टिकल और पोस्ट। इन संगठनों का आरोप है कि फेसबुक अपने यहां पर लोगों में नफरत फैलाने वाले, भेदभाव करने वाले, लिंग, रंग और नस्ल के आधार पर नीचा दिखाने वाले कंटेंट पर सख्ती नहीं करता है। वह अपना मुनाफा कमाने पर ध्यान देता है।

पेंटिंग्स को शेयर करने वाले एकांउट को टर्मिनेट करता फेसबुक

पिछले साल 2 जून 2019 को न्यूयॉर्क स्थित फेसबुक ऑफिस के सामने कलाकारों के न्यूडिटी संबंधी फेसबुक के सेंसरशिप के खिलाफ़ सामूहिक रुप से ‘न्यूड प्रोटेस्ट’ किया था।

ब्रेस्टफीडिंग और महिला वक्ष की तस्वीरें और पेंटिंग फेसबुक पर सेंसर करने के खिलाफ हुए इस प्रोटेस्ट को ‘#WeTheNipple’ #FreeTheNipple’ कैंपेन नाम दिया गया था। इसके तहत फेसबुक ऑफिस के सामने बड़ी संख्या में महिलाओं द्वारा हाथों में बड़े आकार के निप्पल प्लेकार्ड लेकर ‘मॉस न्यूड फोटो शूट’ करवाया गया।

बता दें कि न्यूडिटी के नाम की दुहाई देकर फेसबुक लगातार पेंटिंग्स जैसी सबसे सशक्त अभिव्यक्ति के माध्यम को बैन करता आया है। फेसबुक की इस न्यूडिटी पॉलिसी के खिलाफ वक्त-वक्त पर आवाज उठती रही है और कई कैंपेन भी चलते रहे हैं।

जुलाई 2018 में पीटर पॉल रुबेन्स द्वारा 1612-1614 के दरम्यान बनाई गई ‘द डिसेंट फ्रॉम द क्रॉस’ पेंटिंग वाले एक वीडियो को एक टूरिस्ट एजेंसी के फेसबुक एकाउंट से हटा दिया था। ये कहकर कि ‘ईसा मसीह के शरीर पर बेहद कम कपड़े हैं’।

फेसबुक के इस कदम के विरोध में बेल्जियम के एक टूरिज्म बोर्ड विजिटफ्लांडर्स ने एक वीडियो बना कर फेसबुक पर निशाना साधा है। इस वीडियो में दिखाया गया है कि एक म्यूजियम में कलाकृतियों को देख रहे लोगों के पास आकर दो ‘सोशल मीडिया इंस्पेक्टर’ पूछते हैं कि क्या आपके पास सोशल मीडिया अकाउंट है?

अगर उनका जवाब ‘हां’ होता है तो ये ‘सोशल मीडिया इंस्पेक्टर’ उन्हें नग्न पेंटिंग से हटाकर दूसरी पेंटिंग्स की तरफ ले जाते हैं और कहते हैं कि आप इन्हें नहीं देखिए, यही आपके लिए ठीक है। उनकी कमीज पर पीछे लिखे एफबीआई में एफ फेसबुक के लोगों वाला एफ है। ये तथाकथित सोशल मीडिया इंस्पेक्टर कहते हैं कि जिन लोगों के पास सोशल मीडिया अकाउंट नहीं है, वे हर तरह की पेंटिंग देख सकते हैं।

यूरोप में कलात्मक न्यूडिटी पर इस ताजा बहस की शुरुआत उस वक्त हुई फेसबुक ने एक वीडियो को ब्लॉक कर दिया जिसमें बेल्जियम के 17वीं सदी के मशहूर पेंटर रुबेन की कृति ‘द डिसेंट फ्रॉम द क्रॉस’ की कुछ फुटेज थी। इस पेंटिंग में ईसा मसीह को सूली से उतारते हुए दिखाया गया है।

इससे पहले 12 फरवरी, 2016 को फेसबुक ने ‘आइस क्रीम’ खा रही महिला की पेंटिंग को आपत्तिजनक बताकर हटा दिया था। इस पेंटिंग के बाबत फेसबुक का कहना था कि इस तस्वीर में ज्यादा अंग प्रदर्शन या सजेस्टिव (उत्तेजक) कंटेंट है। बता दें कि फिलाडेल्फिया म्यूजियम ऑफ आर्ट ने अपने पेज पर बेल्जियन आर्टिस्ट एवलिन ऐक्सेल द्वारा 1964 में बनाई गई एक पेंटिंग ‘आइस क्रीम’ पोस्ट की थी, मगर कुछ ही घंटों में फेसबुक ने इसे हटा दिया।
म्यूजियम ने अपडेट पोस्ट में लिखा था, ‘ऐक्सेल की यह पेंटिंग आत्मविश्वास से भरी सक्रिय महिलाओं को दर्शाती है, जो पेंटिंग में बेफिक्र होकर आइसक्रीम खा रही महिला की तरह अपनी शर्तों पर संतुष्टि पाना चाहती हैं। ऐक्सेल की यह पेंटिंग कला की स्थापित परंपराओं को चुनौती देती है और 1960 के सेक्शुअल रिवोल्यूशन की स्वच्छंदता और जिंदादिली को दर्शाती है।’
इससे पहले फेसबुक ने कोपनहेगन की ‘लिटिल मरमेड’ स्टैचू की तस्वीर न्यूडिटी नियमों का हवाला देते हुए हटा दिया था।

इससे पहले साल 2016 में एक फ्रेंच शिक्षक फ्रेडरिक दुरांड ने कुछ वर्ष पहले अपने निजी फेसबुक एकाउंट पर Gustave Courbet द्वारा 1866 में बनाई मशहूर पेंटिंग ‘ओरिजिन ऑफ वर्ल्ड’ को एक लिंक के साथ शेयर किया जिसमें कि उस पेंटिंग के बारे में आर्टिकल था। फेसबुक ने उनके फेसबुक एकाउंट को बिना किसी चेतावनी या जस्टीफिकेशन के ही डिएक्टिवेट कर दिया। शिक्षक ने फेसबुक के इस कृत्य पर उनके खिलाफ़ फ्रांस की कोर्ट में एक केस भी दर्ज़ करवाया था।

साल 2016 में फेसबुक ने पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित निक उत द्वारा खींची गई आईकॉनिक तस्वीर ‘napalm girl’ को भी बैन कर दिया था। ये तस्वीर 8 जून 1972 में खींची गई थी तस्वीर में 9 वर्षीय Kim Phuc के कपड़े नापम हमले से जल गए थे और वो नंगी ही चीखती हुई तमाम बच्चों के साथ सड़क पर भाग रही थी।

जब एक नार्वियन अख़बार के संपदाक ने युद्ध सिरीज की तस्वीरों के साथ ‘नापम गर्ल’ तस्वीर अपने फेसबुक एकाउंट पर Kim Phuc की प्रतिक्रिया के साथ रिपोस्ट की तो फेसबुक ने उनके एकाउंट को सस्पेंड कर दिया था। तब प्रधान संपादक Espen Egil Hansen ने फेसबुक के नाम एक ओपेन लेटर लिखा था।

फासीवाद विरोधी, कार्पोरेट विरोधी, गांधीवादी कंटेंट से आहत होता फेसबुक

फरवरी 2019 में पुलवामा अटैक की प्रतिक्रिया में मोदी सरकार द्वारा पाकिस्तान पर हमले के समय भारतीय सेना का एक फाइटर प्लेन क्रैश होकर पाकिस्तान की सरहद के भीतर जा गिरा। विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान को पाकिस्तानी सेना ने बंदी बना लिया। भारत और पाकिस्तान के फाइटर प्लेन हवा में उड़ रहे थे। सीमा पर सेनाएं सजी थीं। उस समय बेहद तनावपूर्ण युद्ध के हालात में भी पाकिस्तान के कुछ प्रगतिशील पत्रकार, बुद्धिजीवी और शांतिप्रिय नागरिक समाज के लोगों द्वारा बैनर लेकर सड़कों पर पाकिस्तान सरकार से भारतीय विंग कमांडर अभिनंदन वर्तमान को छोड़ने की अपील की जा रही थी। मैंने पाकिस्तान के शांति प्रिय युद्ध विरोधी नागरिक समाज की प्रशंसा में एक पोस्ट डाला तो फेसबुक ने मुझे 3 दिन के लिए ब्लॉक कर दिया था। तो क्या कथित दुश्मन देश के पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और नागरिक समाज के लोगों की मानवीयता की प्रशंसा करना भी फेसबुक की नज़र में अपराध है?

अभी हाल ही में गांधीवादी पत्रकार, लेखक, संपादक ‘अव्यक्त’ जी के पर्सनल एकाउंट को फेसबुक ने टर्मिनेट कर दिया। जबकि वो अपने एकाउंट से वर्तमान राजनीतिक सामाजिक हालात पर समाधान सुझाते सिर्फ़ गाँधीवादी विचार और प्रसंग ही शेयर किया करते थे।

वहीं 2 जुलाई 2020 को शैलेंद्र सिंह ठाकुर ने अपने फेसबुक एकाउंट पर एबीपी न्यूज पर प्रसारित बाबाराम देव द्वारा ‘कोरोनिल’ के लांचिंग की तस्वीर शेयर करते हुए लिखा- “ बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण एक बार फिर बेनकाब और इन बाबाओं की वकालत करते हैं कुछ नासमझ लोग हिंदुत्व, स्वदेशी और आयुर्वेद के नाम पर पहले देश को कहा कि कोरोना की दवा बना ली गई है जब आयुष मंत्रालय का डंडा पड़ा तो बोले हमने दवा नहीं बनाई।”

शैलेन्द्र के इस पोस्ट में कथित ‘कोरोनिल’ दवा को लेकर जो सही घटनाक्रम है वही लिखा गया है। बावजूद इसके फेसबुक ने इस पोस्ट को हटाते हुए शैलेंद्र को 24 घंटे के लिए ब्लॉक कर दिया। उपरोक्त कुछ उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि फेसबुक की पोलिटिक्स क्या है।

फेसबुक पर अमेरिका की राजनीति को कंट्रोल करने का आरोप

फेसबुक लगातार अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी के निशाने पर है। सेनेटर एलिजाबेथ वॉरेन ने फेसबुक की विज्ञापन नीति को एक फर्जीवाड़े के साथ लक्षित करते हुए दावा किया कि मार्क जुकरबर्ग ने ट्रम्प के फिर से चुनाव का समर्थन किया।

अपने एक संबोधन और कई मीडिया संस्थानों में बात करते हुए वॉरेन कहती हैं- “देखिए, मार्क जुकरबर्ग पर मेरे विचार बहुत स्पष्ट हैं। वह एक ऐसी कंपनी चलाते हैं जिसमें बहुत अधिक राजनीतिक शक्ति है … हमें इन बड़ी तकनीकी कंपनियों को तोड़ने की जरूरत है। हमें लोकतंत्र को बहाल करने की जरूरत है।”

एलिजाबेथ वॉरेन के बयान के बाद कुछ महीने पहले मॉर्क जुकरबर्ग का एक ऑडियो लीक हुआ। लीक आडियो में मार्क जुकरबर्ग फेसबुक के कर्मचारियों से कह रहे हैं- “अगर एलिजाबेथ वॉरेन राष्ट्रपति बनती हैं तो यह “झंझट” होगा क्योंकि फेसबुक कंपनी को तोड़ने की उनकी योजना को विफल करने के लिए हमें संयुक्त राज्य अमेरिका की सरकार के खिलाफ़ मुकदमा करना होगा।”

लीक ऑडियो से स्पष्ट है कि वो एलिजाबेथ वॉरेन को किसी भी कीमत पर राष्ट्रपति नहीं बनने देना चाहते हैं।

फेसबुक पर उपभोक्ताओं के निजी डेटा बेचने के आरोप

दुनिया के मशहूर बुद्धिजीवी नॉम चाम्सकी ने जुलियन असांजे के हवाले से एक ट्वीट करके मार्क जुकरबर्ग पर हमला बोला था- “मार्क जुकरबर्ग और मेरे बीच क्या अंतर हैं? मैं आपको मुफ्त में कार्पोरेशन्स की निजी जानकारी देता हूं, और मैं एक खलनायक हूं। जुकरबर्ग पैसों के लिए आपकी निजी जानकारी कार्पोरेशन्स को देते हैं और वह मैन ऑफ द ईयर है।

जुलियन असांजे”

कई बार फेसबुक से उपभोक्ताओं के निजी डेटा चोरी हुए हैं। दरअसल निजी डेटा चोरी की अफवाह उड़ाकर फेसबुक निजी डेटा बेचने की अपने चोरी को छुपा लेता है।

फेसबुक पर कई बार अपने यूजर्स का निजी डेटा बेचने के आरोप भी लगे हैं। फेसबुक कैंब्रिज एनालिटिका जैसी कंपनियों को अपने यूजर्स के निजी डेटा बेचता है। कैंब्रिज एनालिटिका इन डेटा को पोलिटिकल कंसल्टिंग फर्म के हाथों बेचती है। हाल के वर्षों में इसका खुलासा हुआ है। 

जाहिर है फेसबुक सारी नैतिकताओं और मानवीय मूल्यों को दरकिनार कर हर ओर से सिर्फ़ अपना मुनाफा देखता है।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on July 13, 2020 3:30 pm

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