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आजमगढ़ पुलिस का अलग कानून, एनकाउंटर में नहीं दी जाती लाश

रिहाई मंच ने आजमगढ़ के उल्टहव्वा देवारा जदीद के लक्ष्मण यादव के परिजनों से मुलाकात की। उन्हें मुठभेड़ में पुलिस ने मारने का दावा किया था। परिजनों और ग्राम वासियों ने मुठभेड़ को फर्जी बताया है। कहा कि उसकी हत्या हुई है और फिर पुलिस से मिलकर उसे मुठभेड़ का नाम दिया गया। लक्ष्मण की मां प्रभावती कहती हैं कि पुलिस ने लाश नहीं दी। कहा कि एनकाउंटर में लाश नहीं देते। आजमगढ़ के सात युवकों को पुलिस ने मुठभेड़ में मारने का दावा किया पर किसी का भी शव उनके परिजनों को नहीं दिया गया। आखिर पुलिस ऐसा क्यों कर रही है। पुलिस अगर कानून-व्यवस्था के नाम पर ऐसा कर रही है तो इसका मतलब है कि समाज मारे गए व्यक्ति के साथ खड़ा है। मतलब कि उसकी हत्या के सामाजिक-राजनीतिक निहितार्थ हैं, क्योंकि कोई समाज पुलिस के कहे अनुसार बदमाश के साथ खड़ा नहीं हो सकता। तो क्या पुलिस ने परिजनों को इसलिए लाश नहीं सौंपी और उसका खुद ही दाह-संस्कार करवा दिया ताकि लक्ष्मण के शरीर से मुठभेड़ की कहानी की पोल न खुल जाए।

थोड़ा पीछे चलते हैं। तकरीबन 32 साल पहले चोरमरा कमालपुर गांव के क्षेत्र में ही लक्ष्मण यादव के पिता रामदरश यादव को पुलिस मुठभेड़ में मार दिया गया था। आसपास के लोगों ने बताया कि उसमें जेपी सिंह के भाई की भूमिका थी। पर इस भूमिका के संदर्भ को लक्ष्मण यादव के घर वालों ने नकार दिया। तो भी यह अहम सवाल है कि छह साल बाद जेल से छूटने पर 10 सितंबर 2019 को थाना राजे सुल्तानपुर जिला अम्बेडकरनगर में पूर्व उप-महानिरीक्षक जेपी सिंह के भाई रविन्द्र प्रताप सिंह की हत्या, उसी दिन डेढ़ किलोमीटर दूर उसी थाना क्षेत्र के पदुमपुर चौराहे पर डॉ. लक्ष्मीकांत यादव को गोली मारकर घायल करने के बाद पुलिस महानिरीक्षक अयोध्या परिक्षेत्र अयोध्या के एक लाख रुपये का पुरस्कार घोषित किया गया था। वहीं 25 जुलाई 2019 को रौनापार थाना अंतर्गत श्याम दुलारी महाविद्यालय के बस चालक रामबली यादव की हत्या के बाद 23 जुलाई 2019 को पुलिस अधीक्षक आजमगढ़ ने 25 हजार और चार अगस्त 2019 को पुलिस उप-महानिरीक्षक आजमगढ़ परिक्षेत्र आजमगढ़ ने 50 हजार रुपये का पुरस्कार घोषित किया। छह साल बाद एक व्यक्ति के छूटने के बाद हत्या और हत्या के प्रयास के बाद इनाम घोषित होने की पूरी पुलिसिया प्रक्रिया सवालों के घेरे में है।

जेपी सिंह के भाई रवीन्द्र सिंह की हत्या और बत्तीस साल पहले लक्ष्मण यादव जब मां के गर्भ में पांच महीने का था तो उसके पिता की मुठभेड़ में उसी गांव में हुई हत्या में कोई कड़ी जरूर है। अगर नहीं है तो यह साफ है कि योगी सरकार में जाति विशेष के लोगों के जेल से छूटने के बाद पुलिस उन पर झूठे मुकदमे लगाती है और फिर उनकी एनकाउंटर के नाम पर हत्या कर देती है।

रिहाई मंच प्रतिनिधिमंडल में रिहाई मंच महासचिव राजीव यादव, शाह आलम शेरवानी, विनोद यादव, बांकेलाल यादव, अवधेश यादव, उमेश कुमार, वीरेन्द्र कुमार शामिल रहे। रिहाई मंच के प्रतिनिधिमंडल को देखते ही लक्ष्मण यादव की मां फूट-फूट कर रोने लगीं। मुश्किल से संभलीं तो कहा कि ग्राम प्रधान चन्द्रभान ने उनके लड़के को उस दिन सुबह चार बजे मारा और पुलिस लक्ष्मण के मुठभेड़ की झूठी कहानी बता रही है। लक्ष्मण की फोटो लगी उस होर्डिंग को दिखाते हुए कहती हैं कि यही उसके मौत का कारण बना। इसमें वह ग्राम सभा नौबरार देवारा जदीद किता प्रथम, उल्टहवा के क्षेत्रवासियों को 2019 के नव वर्ष, मकर संक्रान्ति और गणतंत्र दिवस की मुबारकबाद दे रहा है। वह चुनाव लड़ने की सोच रहा था।

लक्ष्मण पिछले दो महीने से लुधियाना में था। लक्ष्मण की चचेरी बहन सरिता बताती हैं कि जब वह छह साल जेल में थे तो उस वक्त भी जो कुछ होता था उसका आरोप उस पर लगा दिया जाता था। उसे दो-तीन महीने पहले जेल से छोड़ा गया तो उस पर इनाम घोषित कर दिया गया। उसे मारने के लिए ही जेल से छोड़ा गया और फिर मार दिया गया। नहीं तो जब वह उस दिन लुधियाना से आया था तो क्यों घर नहीं आया। किसने उसे बुलाया, जिसने उसे घर नहीं आने दिया। यह सवाल महत्वपूर्ण है कि इनाम घोषित होने के बावजूद वह आखिर किसकी शह पर लुधियाना से आजमगढ़ आया। लक्ष्मण मां-बाप की इकलौती औलाद था।

लक्ष्मण के चाचा दुबरी यादव ने बताया कि 10 अक्टूबर को खैचड़पुर से रिश्तेदारों ने सुबह-सुबह फोन किया कि उसे कुछ लोगों ने मार दिया है और उसके बाद वहां पुलिस आ गई है। उसके पूरे शरीर पर बेरहमी से पिटाई के निशान थे। उसका पैर डंडे से मारकर तोड़ा गया था। पहले उसे अधमरा किया गया और बाद में उसे ले जाकर गोली मारी गई। उसके बाद पुलिस को बुलाया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि चन्द्रभान पार्टी हत्या में शामिल थी। कहीं कोई घटना होती थी तो प्रधान पुलिस से मिलकर लक्ष्मण पर मुकदमा लदवा देता था।

तीस-बत्तीस साल पहले लक्ष्मण यादव के पिता रामदरश यादव को अम्बेडकर नगर में पुलिस ने मारने का दावा किया था। लक्ष्मण को पहली बार जब पुलिस पकड़कर ले गई तो लगभग छह साल वह जेल में रहा। 2013 में एक दिन वह जब भैंस चराकर आया तो पुलिस आई और उसे पकड़कर ले गई। उस वक्त वह दिल्ली में मजूदरी करता था और गांव लौटा था। जब वह जेल में था तो भी पुलिस आती थी। महराजगंज में कोई घटना हुई तो भी पुलिस आई।

लक्ष्मण के गांव वालों ने बताया कि वहां तीन फायर हुए थे, जबकि उसके शरीर पर छह गोलियों के निशान थे। आखिर तीन और गोली किसने मारी। परिजन कह रहे हैं कि वह मारे जाने से पहले चिकनहवा बाजार के पास देखा गया था। पुलिस की इतनी मजबूत चौकसी लगी थी तो पुलिस उसे पहले क्यों नहीं पकड़ सकी। प्रतिनिधिमंडल जब घटना स्थल पर गया तो वहां से गुजर रहे राहगीर गणेश कुमार, महेन्द्र और हीरालाल ने बताया कि घटना सुबह तड़के की थी। कुछ का कहना यह भी था कि घटना थोड़ा और पहले की है। परिजन भी कह रहे हैं कि पहले उसे मारा गया और फिर पुलिस को बुलाया गया। परिजनों के और ग्रामीणों के कहे समय में काफी मेल है। जबकि पुलिस मुठभेड़ का समय काफी बाद का बता रही है।

This post was last modified on November 2, 2019 11:03 am

Janchowk

Janchowk Official Journalists in Delhi

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