Tuesday, March 5, 2024

फेक केरल स्टोरी बनाम रियल गुजरात स्टोरी 

फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ को लेकर जारी विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। केरल उच्च न्यायालय में इसे प्रतिबंधित किये जाने की याचिका ख़ारिज हो जाने के बाद याचिकाकर्ताओं ने सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया था, लेकिन वहां से भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी थी। शुक्रवार को फिल्म की रिलीज़ के बाद पिछले चार दिनों के दौरान फिल्म ने ठीक-ठाक कमाई कर ली है। मंगलवार तक इस फिल्म के निर्माता निर्देशक को 50 करोड़ रूपये का आंकड़ा पार कर लेने की उम्मीद है। 

बिना किसी बड़े बजट और सितारों के इस आंकड़े तक पहुंचना फिल्म को पहले ही व्यावसायिक लिहाज से सफल फिल्म की श्रेणी में ले जाता है। हालांकि तमिलनाडु और दक्षिण के राज्यों में फिल्म विरोध के कारण अधिकांश सिनेमाघरों में लगाई ही नहीं गई, और कुछ मल्टीप्लेक्स में इसे सीमित समय के लिए ही जारी किया गया। इसके बावजूद हिंदी में डब फिल्म उत्तर भारत में अच्छा बिजनेस कर रही है।

आर्थिक पहलू के पक्ष को यदि दरकिनार कर इस फिल्म की मूल कथा और सत्यता पर बात करें तो अब यह बात फिल्म के निर्देशक तक ने स्वीकार कर ली है कि उनके पास 32,000 केरल की महिलाओं के हिंदू एवं ईसाई धर्म से मुस्लिम धर्म में धर्मांतरण और उनके आईएसआईएस में भर्ती होने का प्रमाण नहीं है। यह आंकड़ा 10% भी नहीं है, 1% भी नहीं है, बल्कि 0.001% बैठता है। कुल जमा 3 मामले आधिकारिक रूप से संज्ञान में आये हैं। 3 महिलाओं के धर्मान्तरण और आतंकी नेटवर्क के साथ संलिप्तता को आधार बनाकर देश में सबसे अधिक साक्षर प्रदेश केरल की एक ऐसी तस्वीर पेश करने के पीछे क्या मंशा है, इसकी परतें अब तेजी से खुलने लगी हैं।

केरल उच्च न्यायालय ने जहां एक तरफ फिल्म के प्रोमोज में 32,000 की संख्या को हटाने के निर्देश दिए, वहीं फिल्म को प्रतिबंधित किये जाने की मांग को ठुकरा दिया। अगले ही दिन कर्नाटक राज्य विधानसभा चुनावों में पीएम मोदी ने ‘द केरल स्टोरी’ को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाकर फिल्म के प्रमोशन में जैसे नई जान ही फूंक दी। रातों-रात इस फिल्म की चर्चा समाचारपत्रों, राष्ट्रीय मीडिया और ह्वाट्सएप ग्रुप चैनलों पर चल निकली। कोर्ट में क्या कहा गया और इस फिल्म को कैसे एक काल्पनिक कहानी घोषित की जा रही है, को ताक पर रखकर आज हर जगह चर्चा इसी बात को लेकर प्रयोजित की जा रही है कि लव जिहाद कितनी भयावह चीज है, जिसने इतनी बड़ी संख्या में केरल को तबाह कर दिया है।

लखनऊ से भाजपा के एक नेता ने बाकायदा एक स्कूल की 100 छात्राओं को मुफ्त में फिल्म दिखाई और ताकीद भी दी कि गैर-मजहब के लड़कों के साथ दोस्ती कितनी महंगी पड़ सकती है। यह बात इस फिल्म के जरिये सीखा जा सकता है। 

इस पूरे विवाद में दो विरोधी ध्रुव उभर चुके हैं। एक तरफ फिल्म के खिलाफ खड़े लोग और वे राज्य सरकारे हैं, जो फिल्म की आलोचना कर रही हैं। अब पश्चिम बंगाल सरकार ने इस फिल्म पर प्रतिबंध लगा दिया है। प्रतिबंध लगाने के बाद से तो भाजपा की समूची फ़ौज ही ममता बनर्जी के खिलाफ ‘राशन-पानी’ लेकर पिल पड़ी है। फिल्म को विपुल शाह ने फाइनेंस किया है। 

‘टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ के कोच्चि संस्करण ने 1 मई को अपने पहले पेज पर हेडलाइंस लगाते हुए शीर्षक दिया है, ‘द केरल स्टोरी’ की सही तस्वीर: 3 ‘रेडिक्लाईज’ महिलाएं, 32,000 नहीं।’ फिल्म के प्रोड्यूसर ने टीजर के लिए नया इंट्रो रिलीज किया। 

फिल्म की स्टोरी में तीन नर्सिंग कॉलेज की छात्राओं को दिखाया गया है। इसमें दो लड़कियां हिंदू हैं, जबकि एक ईसाई परिवार से है। एक चौथी लड़की जो कि मुस्लिम है, जो इन तीनों लड़कियों को बरगलाती है। फिल्म में एक लड़की के पिता को कम्युनिस्ट विचारधारा का बताया गया है और दूसरी हिंदू लड़की भी हिंदू धर्म के उदात्त स्वरुप के कारण धार्मिक नहीं है। मुस्लिम लड़की को एक मास्टरमाइंड के रूप में चित्रित किया गया है, जो ईसाई लड़की को भी प्रभावित करने की कोशिश करती है, लेकिन वह उसके इस्लाम धर्म की व्याख्या से खास प्रभावित नहीं होती।

कॉलेज की छुट्टियों में मुस्लिम लड़की का घर पास होने के करण ये छात्राएं उसके घर पर ही रुक जाती हैं, जहां उनकी मुलाक़ात उसके भाइयों से होती है। ये देखने में सजीले और एमबीबीएस के छात्र होते हैं, और हिन्दू लड़कियां इनके बहकावे में आ जाती हैं और एक लड़की गर्भवती हो जाती है। फिल्म का प्लाट यहां से शुरू होता है। लड़का शादी के लिए मुस्लिम धर्म अपनाने की जिद करता है। बाद में निकाह होने पर मुस्लिम लड़की बताती है कि भाई बुजदिल निकला और वह अपने माता-पिता के पास मालदीव चला गया।

इस लड़की के लिए मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ता है, और मजबूरन उसे एक अन्य मुस्लिम लड़के से शादी करनी पड़ती है, जिसके बारे में बताया गया कि वह ईसाई से मुस्लिम धर्म में कन्वर्ट हुआ है। शादी के बाद उन दोनों को इस्लाम का परचम लहराने अफगानिस्तान के रास्ते सीरिया जाना है। जहां उसे नारकीय जीवन से दो-चार होना पड़ता है। वहां पर महिलाएं दासी से अधिक नहीं हैं, और उन्हें ‘सेक्स स्लेव’ के रूप में मुस्लिम आतंकी इस्तेमाल करते हैं। ऐसा कहा जा रहा है कि एक भारतीय लड़की आज भी अफगानिस्तान की जेल में बंद है, जिसे अफगानिस्तान भारत सौंपने को तैयार है, लेकिन मोदी सरकार उसे स्वीकार नहीं कर रही है। 

फिल्म के निर्देशक सुदिप्तो सेन के अनुसार इस फिल्म के लिए उन्होंने 7 साल रिसर्च किया और तब जाकर यह फिल्म सामने आई है। लेकिन फिल्म की रिलीज से पहले ही जिस प्रकार से वे 32,000 के आंकड़े से 3 पर आ गये, वह इस फिल्म की हकीकत बयां करने के लिए काफी है। 

लेकिन सच तो यह है कि सत्य जहां गोल-गोल अंधेरे में चक्कर काटता रह जाता है, तब तक तो झूठ दुनिया के सौ चक्कर लगाकर आराम कर रहा होता है। आज यही हकीकत ‘द केरल स्टोरी’ से साफ़ हो रही है। केरल स्टोरी से प्रेरित होकर एक पत्रकार ने जब अपने गृह राज्य गुजरात में महिलाओं की स्थिति के बारे में छानबीन शुरू की तो उसे 4 दिन में ही वो सुबूत मिले, जिसे यदि देखें तो दिमाग चकरा जाए। जी हां, एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक 2016 से लेकर 2020 के बीच में गुजरात में 41,000 महिलाएं लापता हैं। ये आंकड़े ‘द केरल स्टोरी’ फिल्म की तरह मनगढ़ंत नहीं हैं, बल्कि सरकारी आंकडें हैं। लेकिन देश, भाजपा,आरएसएस की तो बात ही छोड़िये गुजरात के निवासियों को भी क्या इस बात को लेकर कोई जानकारी है? 

एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार सिर्फ 2019 में ही गुजरात से 9,268 महिलाएं लापता हो गई थीं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक वर्ष 2018 में कुल 9,246 महिलाएं, 2020 में 8,290 महिलाएं, 2017 में 7,712 महिलाएं और वर्ष 2016 में कुल 7,105 महिलाओं के लापता होने की सूचना है। इस प्रकार इन 5 वर्षों में 41,621 महिलाएं लापता थीं। इतना ही नहीं वर्ष 2021 में सिर्फ अहमदाबाद और वडोदरा जिले से ही कुल 4,722 महिलाओं के लापता होने की रिपोर्ट एनसीआरबी के पास है।

गुजरात राज्य मानवाधिकार आयोग के सदस्य एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी सुधीर सिन्हा के मुताबिक, “लापता होने के कुछ मामलों में, कुछ महिलाओं और लड़कियों को देह व्यापार के लिए जबरन विदेशों में भेजा गया है।” उनका कहना था कि लापता लोगों की शिकायतों पर पुलिस खास तवज्जो नहीं देती। इन्हें हत्या के मामले की तरह हैंडल किया जाना चाहिए। गुजरात कांग्रेस प्रवक्ता हिरेन पांकर के अनुसार, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह केरल की महिलाओं के लापता होने के बारे में बातें कर रहे हैं, लेकिन गृह मंत्री अपने गृह राज्य गुजरात में लापता 40,000 महिलाओं के बारे में मुंह नहीं खोलते।

अब यदि यह जानकारी सार्वजनिक भी हो जाति है तो भी क्या गुजरात की इस सच्चाई को देश देख पायेगा? यह अपनेआप में एक ऐसी गुत्थी है, जिसकी काट मौजूदा लोकतांत्रिक भारत के पास नहीं है। यदि होता तो देश में हर चुनाव हिंदू-मुसलमान, पाकिस्तान, लव जिहाद, गौ रक्षा, अयोध्या मंदिर, बजरंगबली जैसे भावनात्मक और विभाजक मुद्दों पर नहीं लड़ा जाता, बल्कि देश में लाखों करोड़ रूपये की लूट और चंद धन्नासेठों के बैंकों के पैसे को गबन कर विदेशों में सेटल हो जाने, भयानक बेरोजगारी, लगातार महंगी होती शिक्षा, शिक्षा के स्तर में उन्नति के बजाय गिरावट और अवैज्ञानिक चिंतन को वरीयता, आर्थिक आंकड़ों में की जा रही हेरफेर से देश की प्रगति, किसानों की घटती आमदनी और लागत में बढ़ोत्तरी, श्रमिक वर्ग के अधिकारों में कटौती सहित अमीरी और गरीबी में बंटता भारत जैसे मूलभूत मुद्दे होते, जो विश्व की सबसे बड़ी जनसंख्या वाले देश के लिए सबसे अहम है।

सवाल उठता है कि 3-4 छिटपुट वाकयों को एक परिघटना के रूप में चित्रित करने से फिल्म बनाने वालों का क्या मकसद हल होता है। फिल्म के अंत में भी लिखित संदेश में साफ़ बताया जाता है कि बड़ी संख्या में यह अभियान चल रहा है। 

इस मुद्दे पर दक्षिण के राज्यों से कहीं अधिक हिंदी प्रदेशों में हलचल साफ़ देखी जा सकती है। मध्य प्रदेश में शिवराज चौहान सरकार ने फिल्म को टैक्स फ्री कर दिया है। प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा के लिए फिल्मों पर टिप्पणी करना एक विशेषाधिकार पहले ही से था। उन्होंने फिल्म की दो टिकटें कांग्रेस नेता कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के लिए भिजवाई थीं। इसी प्रकार भाजपा के छत्तीसगढ़ नेताओं ने मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को भी फिल्म का टिकट भेजा, जिसे उन्होंने व्यस्तता का हवाला देते हुए इंकार कर दिया और चुटकी लेते हुए कहा है कि वे चाहें तो इसे पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह को भिजवा सकते हैं।

साफ़ आशय था कि वे आजकल खाली हैं और करने के लिए कोई काम नहीं है। यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी फिल्म देखने का मन बना रहे हैं। जाहिर सी बात है फिल्म देखने के बाद यूपी में लव जेहाद और धर्मांतरण की समस्या को लेकर एक नया उफान आना तय है। बिहार में भाजपा नेताओं की ओर से फिल्म को टैक्स फ्री किये जाने की मांग की जा रही है।

एक काल्पनिक फिल्म के प्रति ऐसा जोश और जूनून और दूसरी तरफ गुजरात राज्य के बारे में सरकारी एजेंसी की भयावह रिपोर्ट को लेकर ख़ामोशी? ‘गुजरात मॉडल’ के नाम पर 2014 में देश की सत्ता पर सवारी गांठने वाले पीएम मोदी के गृह राज्य में 1000-2000 नहीं बल्कि 41,000 महिलाएं लापता हैं। यदि यह गुजरात जैसे विकसित राज्य में हो रहा है तो बाकी राज्यों का हाल इससे बेहतर कैसे हो सकता है? 

क्या हमें गुजरात स्टोरी पर बात नहीं करनी चाहिए जो काल्पनिक नहीं जीती-जागती सच्चाई है? लेकिन देश के पास तो पहले से बरोजगारी, महंगाई, भुखमरी और इनसे तंग आकर ख़ुदकुशी करने वाले लोगों की लगातार बढ़ती फेहरिश्त है। उनके एजेंडे में तो यह साल, यह महीना या यह दिन कैसे अच्छे से गुजरे, के सपने आते हैं। उनके लिए अख़बारों, सोशल मीडिया, गोदी मीडिया और अब सिनेमा के व्यापक फलक पर परोसे जा रहे झूठ, जिसे खुद सत्ताधारी वर्ग की ओर से उत्तेजनापूर्ण विभाजनकारी शब्दावली में परोसा जा रहा है, के बरक्श अपना जिंदा रहने का एजेंडा खड़ा करने की कूव्वत नहीं बची, वे भला गुजरात स्टोरी को कैसे राष्ट्रीय चिंता का विषय बना सकते हैं। 

जिस प्रकार से ‘द केरल स्टोरी’ का भूत देश के सिर चढ़कर बोलना शुरू बोल रहा है, उम्मीद है कि यह हिंदी प्रदेशों, बंगाल सहित देश में एक बार फिर से मुस्लिम विरोधी माहौल को और उन्मादी बनाने की ओर ले जायेगा। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस बात से बखूबी वाकिफ हैं कि उनके लिए ‘बंगाल स्टोरी’ फिल्म बनकर तैयार की जा रही है। आज ऐसे फिल्म निर्माताओं और निर्देशकों की कोई कमी नहीं जो लंबे समय से फ्लॉप फिल्मों को बनाते हुए गुमनाम जिंदगी बिता रहे हैं।

उनके लिए फाइनेंस ही नहीं देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री स्वंय प्रमोशन के लिए आगे आते हैं। पीएम मोदी ने अभी तक दो फिल्मों को प्रोमोट किया है। ‘कश्मीर फाइल्स’ और अब ‘द केरल स्टोरी’। दोनों बॉक्स ऑफिस पर खूब चमकीं। किसी अंधे को इससे बढ़कर और क्या चाहिए। गुजरात की बेटियां लापता होती रहें, यूपी में दिनदहाड़े बलात्कार और नाबालिग लड़की से बलात्कार और जमानत पर रिहा होने पर फिर से बलात्कार और बच्चे को जिंदा जलाने की खबरों का कोई अर्थ इसलिए नहीं है, क्योंकि वहां पर कमल खिला है।

यदि कमल खिला है तो सारे आरोप बेबुनियाद हैं, विरोधी पक्ष की साजिश है, और वही बात यदि विपक्षी राज्यों में देखने को मिले, तो तिल का ताड़ बनाना बेहद जरुरी हो जाता है। क्योंकि देश अभी भी हिंदू राष्ट्र इन्हीं की वजह से नहीं बन पाया है। एक बार सभी राज्यों और देश में संपूर्ण आधिपत्य हो जाये, तो ऐसे ‘गुजरात रियल स्टोरी’ हर राज्य में हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि तब हमेशा एक नई रील होगी, नए-नए नारे होंगे, और कल्पना लोक में देश और 140 करोड़ लोग विश्वगुरु बनने के सफर में मीलों आगे जा चुके होंगे।

 ( रविंद्र पटवाल जनचौक की संपादकीय टीम के सदस्य हैं।)

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