Subscribe for notification

किसान चाहते नहीं, कॉरपोरेट मना कर रहा, फिर क्यों नहीं वापस हो रहा है कृषि कानून!

4 दिसंबर को सरकार और किसानों के बीच बात तो हुई पर कोई निष्कर्ष नहीं निकल पाया। किसान सारे कृषि कानून की वापसी पर अड़े हैं और सरकार इस मांग को न माने जाने की जिद पर। अब अगली तारीख 8 जनवरी तय हुई है, लेकिन किसानों ने भी अपना एजेंडा तय कर दिया है। अब यह देखना है कि 8 जनवरी को क्या होता है। मामला निपटता है या फिर कोई अगली तारीख पड़ती है।

सरकार कह रही है कि, कृषि कानूनों पर सरकार और किसानों के बीच, क्लॉज दर क्लॉज वार्ता हो। वार्ता का यह तरीका अच्छा है और क्लॉज दर क्लॉज वार्ता होनी भी चाहिए थी। पर कानून बनने के पहले। आज यह प्रस्ताव मूलतः असंवैधानिक है। किसी भी कानून पर, क्लॉज दर क्लॉज वार्ता तो संसद में होती है, जब बिल पेश होता है। वहां, उस बिल पर सांसद अपनी बात करते हैं और वे अपने संशोधन रखते हैं। यदि कोई आपत्तियां होती हैं तो उसे प्रस्तुत करते हैं और यह सब कार्य व्यापार, पूरा देश लाइव देखता है।

बीच-बीच में हंगामा भी हो जाता है, और अधिक हंगामा होने पर सदन को स्थगित भी करना पड़ता है, लेकिन सदन पुनः बैठत है तो, फिर बहस उसी बिंदु से शुरू होती है, जहां से सदन स्थगित हुआ रहता है। सदन में हंगामे का यह दृश्य, कुछ को अराजक लग सकता है, पर यह अराजकता नहीं है। लोकतंत्र में बातचीत, बहस, संवैधानिक डिबेट की एक प्रक्रिया और प्रथा है, जो दुनिया भर की संसदों में अपनाई जाती है।

पर जब यह इतना महत्वपूर्ण कृषि कानून है कि कॉरपोरेट और किसान दोनों ही इसे नहीं चाहते हैं तो फिर सरकार इसे रद्द कर के नए कानून ड्राफ्ट कर उस पर क्लॉज दर क्लॉज सदन में चर्चा क्यों नहीं करा लेती? हर कानून में क्लॉज दर क्लॉज चर्चा होती है, और बिना उसे ठोंक-बजाए सदन में प्रस्तुत ही नहीं किया जाता। पर यह कानून जैसा कि वार्ता से लग रहा है, इसे तो ढंग से वार्ताकारों ने ही नहीं पढ़ा है। यदि उन्होंने पढ़ा होता तो, जो संदेह इस कानून को लेकर एक आम व्यक्ति भी पत्रकारों को धरना स्थल से बता रहा है, वह संदेह, आखिर उन्हें क्यों नहीं हो रहा है?

यह कानून पारित किए जाने के पहले ही, सदन से सीधे संसदीय समिति को भेजा जाना चाहिए था, जहां क्लॉज दर क्लॉज इस पर चर्चा होती और फिर सदन में बहस होती और वोटिंग के बाद पास होता, लेकिन यह कानून संवैधनिक अनुशासन और प्रक्रिया के अंतर्गत न तो सदन में लाया गया, न इस पर चर्चा हुई, और न ही निर्धारित संसदीय प्रक्रिया के अनुसार पारित किया गया। अब जब हलक में यह कानून अटक गया तो सरकार कह रही है कि क्लॉज दर क्लॉज चर्चा हो! यह कानून सरकार द्वारा विधायिका पर थोपा गया है और न्यायपालिका बजाय इस कानून की संवैधनिकता पर विचार करने के फिलहाल खामोश है।

सरकार का कहना है कि कुछ किसान बिल के समर्थन में भी हैं और सरकार पहले उनसे भी बात करना चाहती है। अब जो किसान संगठन बिल के समर्थन में हैं ज़ाहिर है, किसान कानूनो को उन्होंने भी पढ़ा होगा, और उन कानूनों में उन्हें भी अपने हित में कुछ न कुछ मिला होगा। अब सरकार को चाहिए कि कानून समर्थक किसानों को ही यह जिम्मेदारी दे दी जाए कि वह कृषि कानून विरोधी किसानों को उक्त बिल की खूबियां बताएं और कृषि कानून के विरोधियों से खामियां सुनें और समझें। सरकार तो कोई खूबी बता नहीं पा रही है, सिवाय इस गोलमोल बात के कि यह कानून किसान हित में है।

फिर भी सरकार क्लॉज दर क्लॉज चर्चा करना चाहती है तो सरकार को चाहिए कि वह क्लॉज दर क्लॉज इन तीनों कृषि कानून की खूबियां बताए और किसानों को संतुष्ट करे। यह चर्चा और बातचीत यदि लाइव हो तो देश की जनता को भी इन कानूनों के बारे में वास्तविकता जानने का सौभाग्य मिल सकता है। वैसे, कानून बनाना विधायिका का कार्य और दायित्व है। न कि विज्ञान भवन में वार्ताकारों का। सरकार यह तो कह रही है कि वह संशोधन के लिए राजी है पर किसान बिल को ही वापस लेने और एक नए बिल जिसमें एमएसपी की कानूनन बाध्यता हो, पारित कराना चाहते हैं। सरकार को जनहित का सम्मान करना चाहिए और बिना इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाए वापस लेकर कृषि सुधार के लिए एक एक्सपर्ट कमेटी का गठन करना चाहिए।

एनडीए में भाजपा के सहयोगी दल जेडीयू के प्रवक्ता और वरिष्ठ नेता केसी त्यागी का यह उद्धरण भी पढ़ा जाना चाहिए। वे कहते हैं, “जेडीयू को सरकार से शिकायत इस बात की है कि सरकार कृषि कानून सहयोगी पार्टियों को विश्वास में लेकर नहीं लाए। संसद में हम ने कृषि कानूनों का समर्थन किया है। हम एक मात्र विश्वसनीय और इकलौती सहयोगी पार्टी हैं, लेकिन हमारी भी शिकायतें हैं। सरकार को सहयोगी दलों को भी विश्वास में लेना चाहिए था।

किसान संगठनों से वार्ता करनी चाहिए थी। आज तक जब भी विपक्षी दलों ने कहा कि बिल को स्टैंडिंग कमेटी में भेजा जाए तो अब तक भेजा जाता रहा है, फिर जो समिति फैसला देती है वो सब को मान्य होता है। सरकार ने ये भी नहीं किया। सरकार द्वारा बातचीत किए जाने का मैं समर्थन करता हूं। किसानों की मांगों के साथ हमारी सहानुभूति है। किसानों की मौतों को देखते हुए सरकार को अधिक संवेदनशील होने की जरूरत है।”

पहले अडानी ग्रुप ने बड़े बड़े विज्ञापन जारी कर के बताया कि
● वे कृषि सेक्टर में दखल देने को बिल्कुल इच्छुक नहीं हैं। न वे फसल खरीदेंगे, न कीमत तय करेंगे और न ही कृषि व्यापार को प्रभावित करेंगे।
● उनके साइलो जो वे बना रहे हैं, फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया एफसीआई के साथ एक अनुबंध के अंतर्गत बना रहे हैं।

अब रिलायंस के मुकेश अम्बानी ने भी कहा है,
● वे तो कृषि के विपणन, ज़मीन खरीदने, फसल उगाने, खेती करने, अनाज खरीदने की किसी भी योजना के न तो इच्छुक हैं और न ही उनकी कोई ऐसी योजना है।
● वे रिटेल सेक्टर में हैं और इस सेक्टर के लिए वे कोई भी कृषि उत्पाद किसानों से सीधे नहीं खरीदते हैं और न आगे खरीदने की उनकी कोई योजना है।
● रिटेल सेक्टर के लिए वे बाजार से ही कृषि उत्पाद खरीदते हैं।
● रिलायंस किसी भी प्रकार की कांट्रैक्ट फार्मिंग में इंटरेस्टेड नहीं है।

अब जब दो प्रमुख और सरकार के नजदीक समझे जाने वाले कॉरपोरेट घराने कृषि सेक्टर में कोई रुचि नहीं रख रहे हैं और आगे भी वे कह रहे हैं कि उनकी कोई योजना नहीं है तब सरकार किन कॉरपोरेट और बड़ी कंपनियों के लिए ज़िद ठाने हुए हैं?

अब तो मुकेश अंबानी का रिलायंस पंजाब हरियाणा हाई कोर्ट पहुँच गया है कि उसकी संपत्तियों की रक्षा की जाय। हो सकता है वह अब सुप्रीम कोर्ट भी चला जाय। सुप्रीम कोर्ट में उसका केस हरीश साल्वे देख सकते हैं और सुप्रीम कोर्ट सब छोड़ छाड कर तुरन्त सुनवाई भी कर दे। सॉलिसिटर जनरल तो तैयार होंगे ही । पर कोर्ट के किसी आदेश से कोई प्रभाव आंदोलन पर पड़ने वाला नहीं है। सब जानते हैं कि ये कॉरपोरेट एक दिन में बहुत सी नई कंपनियॉ बना लेंगे और फिर यह सब बयानबाजी हवा हो जाएगी।

इस नये कृषि कानूनों से होने वाले बदलाव से जिन दो कॉरपोरेट पर सबको शक हो रहा था, वे इस व्यापार में ही आने को इच्छुक नहीं हैं और किसान पहले ही दिन से इस नायाब कृषि सुधार का विरोध कर रहे हैं, तो फिर सरकार क्यों और किसके हित में,
● सरकारी मंडियों के सामने समानांतर मंडियां खड़ी कर रही है?
● निजी मंडियों पर टैक्स नहीं लगा रही है?
● कांट्रैक्ट फार्मिंग में किसान विरोधी प्राविधान शामिल कर रही है?
● कांट्रैक्ट में कोई विवाद होने पर अदालती विकल्प से किसानों को वंचित कर रही है?
● जमाखोरी को वैध बना रही है?
● एमएसपी पर कोई बाध्यकारी कानून नहीं बना रही है?

यह कानून किसके हित में है, सरकार के,  कॉरपोरेट के, कंपनियों के या किसानों के या फिर यह दोनों कॉरपोरेट, अपने विरुद्ध प्रतिकूल वातावरण बनते देख कर अब यह जताने की कोशिश कर रहे हैं कि उनसे इन सब कृषि कानूनी से कोई लेना देना नहीं है? सरकार को अब ज़िद छोड़ कर तीनों कानून वापस ले लेने चाहिए और कृषि सुधार, न्यूनतम समर्थन मूल्य एमएसपी और अन्य किसानों की समस्याओं के लिए जैसा कि सुप्रीम कोर्ट ने सुझाया है एक एक्सपर्ट कमेटी का गठन करके समस्या के समाधान की ओर बढ़ना चाहिए।

जो रिलायंस आज प्रेस नोट जारी कर के कह रहा है कि वे कृषि सेक्टर में नहीं आएंगे और न ही उनकी कोई योजना है, उसी रिलायंस ने जब जिओ की लांचिंग की थी तब भी यही कहा था कि यह फ्री रहेगा। लांचिंग में मुकेश अंबानी ने प्रधानमंत्री के फोटो का दुरुपयोग भी किया था। प्रधानमंत्री की तस्वीर बिना सरकार की अनुमति के विज्ञापन में छापना राज चिन्ह अधिनियम 1950 के अंतर्गत दंडनीय अपराध है। कानूनन 30 से ज्यादा ऐसे फोटो और निशान हैं, जिनका भारत सरकार की अनुमति के बिना उनका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता है। इनमें राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, महात्मा गांधी, यूनाइटेड नेशन ऑर्गेनाइजेशन, अशोक चक्र और धर्म चक्र भी शामिल हैं।

अब जिओ फ्री वाली बात, कुछ महीनों बाद खत्म हो गई और फिर जैसे ही बाजार में जिओ की मोनोपॉली जमी और बीएसएनएल, एयरटेल, वोडाफोन आइडिया आदि कमज़ोर पड़े, उसकी भी दरें बढ़ने लगीं। यह सब बाजार और पूंजीपतियों के दांव हैं और लाभ कमाना हर कॉरपोरेट या व्यापारी का प्रथम और परम उद्देश्य होता है। लाभ कमाइए। व्यापार का एक मूल उद्देश्य लाभ कमाना भी है। लाभ कमाने में कोई दिक्कत नहीं पर सरकार को खरीद कर नहीं, न ही किसी दल को अपनी दुकान कह के, न ही मोटी तनख्वाह पर रिटायर्ड नौकरशाहों और बैंक के चेयरमैनों को अपनी नौकरी में रख कर लाभ कमाइए। बल्कि सरकारी नियम और कानूनों का पालन कर के लाभ कमाइए।

सरकार के प्रति जनता की भी अपेक्षाएं होती हैं, उसी जनता की, जो लंबे समय तक लाइनों में लग कर सरकार चुनती है, और उसे आप सब अन्नदाता और जनार्दन कहते हैं। आज सरकार से जनता की नाराजगी कॉरपोरेट की तरफ इसलिए भी मुड़ गई है कि जनता के मन में यह धारणा मजबूती से बैठ गई है कि सरकार कॉरपोरेट या खुल कर कहें तो रिलायंस और अडानी ग्रुप के शिकंजे में है।

हम आंदोलन के समर्थन में हैं और सरकार के खिलाफ भी। पर जो मित्र आंदोलन के खिलाफ और सरकार के पक्ष में हैं, वे यदि इस बात से सहमत हैं कि किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिलना चाहिए, तो वे ही कम से कम यह बता दें कि सरकार इसके लिए क्या कर रही है और आठ दौर की वार्ता में सरकार ने किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिले, इसलिए क्या प्रस्ताव दिया है?

दरअसल सरकार रत्ती भर भी नहीं चाहती कि किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिले। वह चाहती है कि सरकार, फसल, ज़मीन, सहित कॉरपोरेट के सामने नतमस्तक रहे और किसान, ‘सवा सेर गेहूं’ के वक़्त में पहुंच जाएं। जब सरकार, मुनाफाखोरों और जमाखोरों के लिए आवश्यक वस्तु अधिनियम को रद्द कर असीमित भंडारण की सुविधा इन जमाखोरों को दे सकती है तो क्या सरकार कभी यह चाहेगी कि किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य मिले? सरकार बस यह कह रही है कि वह एमएसपी जारी रखेगी। पर यह नहीं कह रही है कि सबको एमएसपी देगी कैसे। सरकार बस यह चाहती है कि यह बला टले और किसान वापस चले जाएं।

(विजय शंकर सिंह रिटायर्ड आईपीएस अफसर हैं और आजकल कानुपर में रहते हैं।)

Donate to Janchowk!
Independent journalism that speaks truth to power and is free of corporate and political control is possible only when people contribute towards the same. Please consider donating in support of this endeavour to fight misinformation and disinformation.

Donate Now

To make an instant donation, click on the "Donate Now" button above. For information regarding donation via Bank Transfer/Cheque/DD, click here.

This post was last modified on January 6, 2021 12:53 pm

Share
%%footer%%