Monday, January 24, 2022

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किसान आंदोलन पर संघ और भाजपा का एक और झूठ पकड़ा गया! आन्दोलन बड़े किसानों का नहीं, छोटे एवं सीमांत किसानों का

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संघ परिवार के बारे में आम धारणा है कि यह किसी भी बात को बहुत बढ़ा चढ़ाकर पेश करता है और कई बार गलतबयानी भी करता है जो देर सबेर सबको पता भी चाल जाता है। इसी तरह का एक मामला किसान आन्दोलन का है जिसके बारे में संघ परिवार, विशेषकर भाजपा ने पूरे देश में एक मिथक फैला रखा है कि यह आन्दोलन पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बड़े और समृद्ध किसानों का है। लेकिन पटियाला के पंजाब यूनिवर्सिटी से जुड़े दो अर्थशास्त्रियों द्वारा किए गए अध्ययन में यह जानकारी सामने आई है कि किसान आंदोलन में मारे गए लोगों के पास औसतन 2.94 एकड़ से अधिक भूमि नहीं थी। विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र के पूर्व प्रोफेसर लखविंदर सिंह और बठिंडा में पंजाबी विश्वविद्यालय के गुरु काशी परिसर में सामाजिक विज्ञान के सहायक प्रोफेसर बलदेव सिंह शेरगिल द्वारा किए गए अध्ययन से यह पता चला है।

ये आंकड़ा उन दावों को खारिज करता है कि किसान आंदोलन में ज्यादातर बड़े किसान ही हैं। अध्ययन के अनुसार, पिछले करीब एक साल से चल रहे किसान आंदोलन में कथित तौर पर करीब 600 किसानों की मौत हुई है। अध्ययन में कहा गया है कि अगर हम भूमिहीन मृतक किसानों को शामिल करते हैं, जो अनुबंधित भूमि पर खेती कर रहे थे, तो खेती के भूखंड का औसत आकार 2.26 एकड़ हो जाता है। सिंह के अनुसार, ये अध्ययन पिछले 11 महीनों के विरोध-प्रदर्शन के दौरान मारे गए 600 में से 460 किसानों के आंकड़ों पर आधारित है।

इस अध्ययन के दौरान ये पुष्टि हुई है कि किसानों के विरोध प्रदर्शन में ज्यादातर छोटे एवं सीमांत किसानों और भूमिहीन किसानों ने अपनी जान गंवाई है। इसमें सबसे ज्यादा पीड़ित पंजाब के मालवा क्षेत्र के थे। पंजाब में 23 जिले में से मालवा में 15 जिले हैं, जबकि दोआबा और माझा क्षेत्रों में चार-चार जिले हैं। अध्ययन के अनुसार, मरने वाले किसानों में से 80 फीसदी पंजाब के मालवा क्षेत्र से थे। वहीं इसमें दोआबा और माझा क्षेत्र की हिस्सेदारी क्रमशः 12.83 फीसदी और 7.39 फीसदी थी।

रिपोर्ट के मुताबिक, किसान आंदोलन के दौरान हुईं मौतों में मौसम की स्थिति ने काफी भूमिका निभाई थी। इसके अलावा पर्याप्त भोजन नहीं मिलने के चलते इम्यूनिटी में गिरावट को भी मौतों का एक कारण बताया गया है।उन्होंने कहा कि लंबे समय तक बारिश, लू और कड़ाके की ठंड का मानव शरीर पर काफी बुरा प्रभाव पड़ता है।अध्ययन में कहा गया है कि आने वाले दिनों में किसान आंदोलन में और मौतें हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि सड़क दुर्घटनाओं के कारण भी किसानों की मौत की संख्या में बढ़ोत्तरी हो सकती है।

रिपोर्ट के मुताबिक, मृतक किसानों की औसत उम्र करीब 57 साल थी। इनमें से कई गरीब किसानों पर काफी कर्ज है और परिवार की स्थिति दयनीय है। अध्ययन के अनुसार, कई स्वयंसेवी संगठनों ने मृतक किसानों के परिवारों का सहयोग करने की पेशकश की है। पंजाब सरकार ने प्रभावित परिवारों को 5 लाख रुपये मुआवजा और मृतक किसान के परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की है। लेकिन अध्ययन में कहा गया है कि यह काफी हद तक अपर्याप्त है।

उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्तर पर इसने आम जनता को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करने वाले सरकारी फैसलों के खिलाफ निडर होकर विचार व्यक्त करने के लिए जगह दी है। अध्ययन में कहा गया है कि इसने न्यायपालिका जैसे संस्थानों को स्वतंत्र निर्णय लेने और भारत के संविधान में निहित नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए सहयोग प्रदान किया है। अध्ययन में कहा गया है कि इस आंदोलन ने पिछले 30 वर्षों के आर्थिक सुधारों के कार्यान्वयन के लिए एक वैकल्पिक एजेंडा सामने रखा है।

उन्होंने कहा कि किसानों का विरोध आंदोलन सभी राजनीतिक दलों से दूरी बनाए रखने में सक्षम रहा है और उन्हें कभी भी अपने साथ सार्वजनिक मंच पर कब्जा करने की अनुमति नहीं दी। यह न केवल किसान नेतृत्व की परिपक्वता को स्पष्ट रूप से इंगित करता है, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व को यह भी महसूस कराता है कि उन्होंने कृषक समुदाय का विश्वास खो दिया है।

स्टेट ऑफ रूरल एंड एग्रेरियन इंडिया रिपोर्ट 2020 के अनुसार, 1951 से 2011 के बीच भारत की कृषि पर निर्भर जनसंख्या 60 प्रतिशत से घटकर 48 प्रतिशत पर आ गई। इसके साथ ही साथ कृषि पर निर्भर परिवार और कुल मालिकानों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई। 2001 से 2011 के बीच किसानों की संख्या 85 लाख कम हुई पर खेतिहर मजदूरों की संख्या में 3.75 करोड़ की वृद्धि हुई।

जनगणना के लिए सरकार जमीन के मालिकाना हक को पांच श्रेणियों में बांटती हैं। मार्जिनल अर्थात हाशिए के किसान (जिनके पास 1 हेक्टेयर से कम भूमि है), छोटे (जिनके पास 1 से 2 हेक्टेयर भूमि है), उप माध्यमिक (जिनके पास 2 से 4 हेक्टेयर भूमि है), माध्यमिक (4 से 10 हेक्टेयर भूमि रखने वाले) और बड़ा मालिकाना जिनके पास 10 हेक्टेयर या उससे ज्यादा भूमि है। 2015-16 के कृषि जनगणना के अनुसार भारत में अधिकतर, 86 प्रतिशत- मिल्कियत छोटी या मध्यम स्तर की हैं। यह सभी 2 हेक्टेयर या उससे कम हैं और इन परिवारों की आमदनी अपने होने वाले खर्च से कम हैं।

पंजाब में इसी 2015-16 की गणना के अनुसार, 33.1 प्रतिशत मालिकाना छोटे और मध्यम श्रेणी का है वहीं 33.6 प्रतिशत उप माध्यमिक श्रेणी का। हरियाणा में 68.5 प्रतिशत मालिकाना हक छोटी और मध्यम श्रेणी का है। 2015-16 की गणना के अनुसार भारत में दलितों के स्वामित्व की 92.3 प्रतिशत भूमि, छोटी और मार्जिनल श्रेणी की हैं। बाकी जगहों की तरह ही पंजाब में भी अगड़ी जाति के जट सिख मुख्य व बन त्योहार जमीन का मालिकाना हक रखते हैं, दलित और पिछड़ी जातियों के पास कुल व्यक्तिगत भूमि का केवल 3.5 प्रतिशत हिस्सा है। इसमें से दलितों के स्वामित्व की अधिकतर, 57.8 प्रतिशत खेतिहर भूमि जिसमें किराए पर ली गई भूमि भी शामिल है, छोटी और मार्जिनल श्रेणी की हैं।

2020 की रिपोर्ट के अनुसार, साठ के दशक में हरित क्रांति आने के बाद 1970 से 2010 के बीच में पंजाब में धान और गेहूं की खेती का कुल क्षेत्र, 45.2% से बढ़कर 80.3% पर पहुंच गया है। पंजाब और हरियाणा के छोटे किसान भी अब ज्वार और बाजरे जैसी विविध खेती से हटकर धान और गेहूं की खेती में ही लग गए हैं। जिसके कारण रासायनिक खादों और कीटनाशकों, हाइब्रिड बीज और भूमिगत जल का बहुत ज्यादा उपयोग बढ़ गया है।

साल दर साल मिट्टी और पानी की हालत खराब होती जा रही है। 1970 से 2005 के बीच, हर नाइट्रोजन-फास्फोरस-पोटेशियम खाद से होने वाली उपज में 75% गिरावट आई है। पंजाब हरियाणा और राजस्थान में जलस्तर भी सालाना .33 मीटर की दर से गिरा है। इंडिया फोरम में कृषि बदलाव पर पोस्ट डॉक्टोरल रिसर्च करने वाले श्रेय सिन्हा के अनुसार, इसने कृषकों की सभी श्रेणियों को प्रभावित किया है और आक्रोश का दायरा बहुत बड़ा कर दिया है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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