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सावरकर के खिलाफ बोलने पर जेपी के मानसपुत्र और गांधीवादी कुमार प्रशांत के खिलाफ एफआईआर

ये कुमार प्रशांत हैं। गांधी पीस फाउंडेशन के प्रमुख। उनके ख़िलाफ़ आरएसएस के दो कार्यकर्ताओं की शिकायत पर ओडिशा के दो अलग-अलग थानों में एफआईआर दर्ज़ कराई गई हैं। ख़बरों के मुताबिक, `एफआईआर में विनायक दामोदर सावरकर के खिलाफ गलत प्रचार करने और “देश के खिलाफ षड्यंत्र” करने का आरोप लगाया गया है।` कुमार प्रशांत ने गांधी कथा कार्यक्रम में जो कहा था, उसमें यह भी शामिल था कि `भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में आरएसएस की कोई भूमिका नहीं है और अंडमान की सेल्यूलर जेल से रिहा होने के लिए सावरकर ने ब्रिटिश राज के साथ सहयोग किया था।`

इस ख़बर के साथ कुमार प्रशांत का जो फोटो वायरल हो रहा है और जिसे आप इस पोस्ट में भी देख सकते हैं, उसमें प्रशांत के पीछे दीवार पर जयप्रकाश नारायण टंगे हुए हैं। प्रशांत के परिचय में यह बात प्रमुख है कि वे जयप्रकाश के सहयोगी रहे हैं। जयप्रकाश उन्हें अपना मानस पुत्र मानते थे। आरएसएस के बारे में जयप्रकाश नारायण के विचारों से आप सभी परिचित होंगे। उस आंदोलन जिसे बिहार के लोग बिहार में बिहार आंदोलन और बाहर संपूर्ण क्रांति आंदोलन कहा करते हैं, में आरएसएस-जनसंघ की घुसपैठ का विरोध करने वालों को जयप्रकाश ने यह कहकर फटकार लगाई थी कि आरएसएस फासिस्ट है तो मैं भी फासिस्ट हूं। अपनी फिल्मों की वजह से आरएसएस की आंखों की किरकिरी रहने वाले प्रसिद्ध फिल्मकार आनंद पटवर्द्धन ने कहा था कि जेपी ने आरएसएस को पुनर्जीवन दिया।

गांधी की एक विडंबना यह है कि ख़ुद को गांधीवादी कहने वाला अधिकांश हिस्सा जिसमें बड़े गांधीवादियों के नाम गिने जा सकते हैं, गांधी के हत्यारों से या गांधी के हत्यारों की राजनीति से प्रभावित रहा है। गांधीवादी, समाजवादी, गांधीवादी-समाजवादी इन तमाम तरह के कोष्ठकों में शामिल शख़्सियतों पर यह बात लागू होती है। राममनोहर लोहिया को लीजिए जिन्हें ज़रा क्रिटिकल होकर देखने की कोशिश की जाए तो देव प्रतिमा के अपमान जैसे तेवरों के साथ भेड़िये हुआं-हुआं करने लगते हैं। लोहिया तो आरएसएस की राजनीति को लगातार अपना कंधा उपलब्ध कराते रहे। जेपी, लोहिया और तमाम तरह के सर्वोदयी, किसान मसीहा, मजदूर मसीहा इनमें से ऐसा कौन था जो गांधी की हत्या में आरएसएस की भूमिका से नावाकिफ़ था?

असल में बात यह है, जिस एक साधारण तथ्य का ज़िक्र करने की वजह से कुमार प्रशांत पर मुकदमे दर्ज़ करा दिए गए हैं, उस तथ्य को कांग्रेस ने कभी कहते-दोहराते रहने की ज़रूरत नहीं समझी। गांधी के हत्यारों को बचाने में सरकार में शामिल कांग्रेस के शीर्ष नेताओं जिनमें गृह मंत्री वल्लभ भाई पटेल प्रमुख थे ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा रखा था। नेहरू कितने अकेले थे, यह उस समय के उनके और पटेल के बीच के पत्राचार से और उनकी विकल ख़ामोशी से अंदाज़ लगाया जा सकता है। अगर कांग्रेस और गांधी के नाम पर पलने वाले तमाम प्रतिष्ठान और लोग इस तथ्य को दोहराते और लोगों के बीच ले जाते रहते तो अचानक यह बात दोहराना इतने साहस और ख़तरे की बात न हो जाती।

आप अपने शहरों के गांधीवादियों, विनोबाइयों, सर्वोदयियों वगैरह के दिल को ज़रा निर्ममता से टटोलिए और देखिए कि हिंदुत्ववादी राजनीति वहां किस तरह विराजमान है। बहुत को तो आप देखेंगे कि पिछले कुछ वर्षों में वे अपने सर्वोदयी बैनर के साथ गांधी के हत्यारों के अनुयायियों के बीच बैठते रहे हैं।

कुमार प्रशांत ने गांधी के नाम से जुड़ी जिस संस्था की ज़िम्मेदारी संभालते हुए आरएसएस को लेकर तथ्यात्मक बात रखी, उसी जिम्मेदारी को संभालते हुए अनुमप मिश्र आरएसएस की प्रशंसा कर रहे थे। कुमार प्रशांत का बोलना इसलिए और भी अमूल्य और साहसिक है कि वे `अपने ही लोगों` (गांधी के कथित लोगों) के बीच इस मसले पर नेहरू की तरह लगभग अकेले हैं और नेहरू के दौर से ज़्यादा भयानक दौर में हैं।

(धीरेश सैनी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल गुड़गांव में रहते हैं।)

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