नीतीश के चहेते पर जालसाजी का मुकदमा

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चुनावी राजनीति के बदलते परिदृश्य के माहिर खिलाड़ी बनकर उभरे प्रशांत किशोर पर धोखाधड़ी और जालसाजी का मामला दर्ज हुआ है। मामला शाश्वत गौतम ने दर्ज कराया है जो मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के मीडिया सलाहकार का काम करते-करते कांग्रेस के आईटी सेल में राष्ट्रीय टीम के प्रभारी हो गए। पाटलिपुत्र थाना में धोखाधड़ी की प्राथमिकी दर्ज कराने के साथ-साथ उन्होंने पटना जिला अदालत में 10 करोड़ की मानहानि का मुकदमा भी कर दिया है।  

नरेन्द्र मोदी के नाम को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में ब्रांड की तरह स्थापित करने में प्रशांत किशोर का नाम 2014 लोकसभा चुनाव के दौरान सामने आया था। बाद में वे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ चले गए और चुनावी रणनीति के निर्धारक बन गए। बिहार में बहार है, नीतीशे कुमार है-जैसा चालू नारा देने का श्रेय उन्हीं को दिया जाता है। जब नीतीश कुमार ने आरजेडी से नाता तोड़कर भाजपा का दामन थामा तो उन्हें भी पार्टी में ले आए और अपनी पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया। पटना के राजनीतिक हलकों में यह आम समझ है कि राष्ट्रीय राजनीति में अपनी जगह तलाशने और गुंजाइश बनाने में नीतीश कुमार उनका उपयोग कर रहे थे। भाजपा से अलग राजनीतिक लाइन पकड़ने का यही रहस्य था। परन्तु नागरिकता कानूनों में संशोधन के मामले में आक्रामक रूख अपनाने के कारण उन्हें जदयू से निकाल दिया गया। अब वे बिहार के विकास का समर्पित समूह खड़ा कर रहे हैं। शाश्वत गौतम से झगड़ा इसी से जुड़ा है। 

शास्वत गौतम ने आरोप लगाया है कि प्रशांत ने उनके प्रोजेक्ट-बिहार की बात- की विषयवस्तु को उड़ा लिया है और मिलते-जुलते नाम -बात बिहार की- से अभियान शुरू कर दिया है। ओसामा नाम के एक युवक ने प्रशांत की सहायता की है। आरोपों के अनुसार ओसामा पहले गौतम के साथ काम करता था, उसे गौतम के प्रोजेक्ट की पूरी जानकारी थी। वहां से काम छोड़ने के बाद उसने सारी सामग्री प्रशांत को दे दी। इसके बाद प्रशांत ने उस सामग्री को अपनी वेबसाइट पर डाल दिया। ओसामा पटना विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव भी लड़ चुका है। 

भारतीय राजनीति में कारपोरेटी प्रबंधन कंपनियों की घुसपैठ राजीव गांधी के जमाने में हुई। तब रेड-डिफ्यूजन नामक अमेरिकी कंपनी नियोजित हुई थी। उन चुनावों में कांग्रेस के नारे, पोस्टर और पूरे अभियान में उल्लेखनीय परिवर्तन लक्षित हुए थे। कांग्रेस ने पहली बार राष्ट्रीय एकात्मकता के लिए वोट मांगे। यह शब्द परंपरागत रूप से संघ या जनसंघ का था। जो राष्ट्रीय एकता की बात करता था। कांग्रेस की रणनीति में यह परिवर्तन पूरे चुनाव अभियान में दिखा। कांग्रेस दलित-अल्पसंख्यक समीकरण के बजाए बहुसंख्यक की बात कर रही थी। इसका परिणाम हुआ कि नानाजी देशमुख जैसे आरएसएस नेताओं का परोक्ष समर्थन उसे प्राप्त हुआ।

लेकिन भारतीय राजनीति में चुनाव प्रबंधकों की दखल नरेन्द्र मोदी के साथ बढ़ती गई। भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने के समय से ही प्रबंधन कंपनियों की भूमिका देखी जाती है। 2014 लोकसभा चुनावों में चुनाव-प्रचार की रूपरेखा बनाने में आई-पैक नामक कंपनी की प्रमुख भूमिका थी, जिसके सर्वेसर्वा प्रशांत किशोर हैं। पर बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उनकी सेवाएं नहीं ली और वे नीतीश कुमार के लिए काम करने लगे।

उल्लेखनीय है कि प्रशांत किशोर की जदयू से विदाई बड़े ही नाटकीय ढंग से हुआ। लोकसभा में नागरिकता संशोधन विधेयक पारित होने के समय ही वे पार्टी लाइन के खिलाफ जाकर इसका विरोध कर रहे थे। जदयू में नीतीश कुमार के बाद सबसे ताकतवर नेता के रूप में उभरे आरसीपी सिंह ने चेतावनी दी। फिर प्रशांत और राज्यसभा सदस्य पवन वर्मा को पार्टी से निकाल दिया गया। उसके बाद प्रशांत किशोर नई भूमिका में हैं। उन्होंने 20 फरवरी को बात बिहार की अभियान की शुरुआत की। बिहार को 10 अग्रणी राज्यों में शामिल कराने के घोषित उदेश्य से चल रहे इस अभियान से जुड़ने के लिए नौजवानों से अपील की जा रही है। यह वेबसाइट और अभियान सामने आया।

इस बीच ओसामा भी सामने आया है और कभी शाश्वत के यहां नौकरी करने से इनकार किया है। लेकिन यह जरूर कहा है कि शाश्वत उसे अपने यहां बुलाते थे। शाश्वत का कहना है कि उन्होंने 7 जनवरी को ही अपनी वेबसाइट पंजीकृत कराया था। जबकि प्रशांत किशोर ने 16 फरवरी को डोमेन पंजीकृत कराया है। उनका आरोप है कि ओसामा ने उनके लैपटाप से वेबसाइट की सामग्री निकाल कर प्रशांत को दे दिया। इस हाईप्रोफाइल मामले पर पुलिस के आला अधिकारियों की नजर है। लेकिन कोई कुछ बताना नहीं चाहता। बताते हैं कि शाश्वत गौतम ने प्राथमिकी दर्ज कराने के साथ-साथ पुलिस को कुछ सबूत भी सौंपे हैं जिसमें वाट्सअप संदेश, चैट आदि के स्क्रीन शॉट भी हैं।

(अमरनाथ वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल पटना में रहते हैं।)      

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