कोविड दौर में जीवन-मौत के चार अध्याय

इलाहाबाद। ‘‘ठीक है यार, कोई बात नहीं’’ निहाल मिश्र हिम्मत और विनम्रता से बोले जब दिल्ली के उनके तीन मित्रों ने उनके यहां रहने के लिए मना कर दिया। वह अपनी पत्नी को ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइन्सेस यानी एम्स में कोविड-19 के इलाज के लिए दिल्ली ले जा रहे थे। क्योंकि वे एक संपन्न ट्रान्सपोर्टर हैं जो उत्तर प्रदेश के एक राज्य मंत्री के नज़दीकी हैं, उन्होंने इन तीनों मित्रों की अलग-अलग समय में मदद की थी। आज उन्हें बदले में मानवता का व्यवहार नहीं मिल रहा था। कोविड ने मानव संबंधों को विकृत कर दिया और दोस्ती को बेमानी बना दिया था।

मंत्री की मदद से उन्हें एम्स में पत्नी के लिए बेड मिल गया, क्योंकि इलाहाबाद के जिला अस्पताल के कोविड वार्ड में उन्हें भरती कराने का मतलब था-मौत, क्योंकि यहां ऑक्सीजन की किल्लत हो गई थी। निहाल को अपने बच्चों को किसी पड़ोसी के जिम्मे छोड़कर जाना पड़ा; वे उनसे दिन में चार बार बात करते।

‘‘पापा, पाण्डेयजी के यहां का खाना अच्छा नहीं लगता’’, उनकी 12-वर्षीय बेटी ने खाने की शिकायत की थी। 6 साल का बेटा बहन की घुड़कियों से परेशान हो रहा था। 15 दिनों के बाद पत्नी का कोविड रिलैप्स हो गया। उसी समय बेटी की ऑनलाइन परीक्षा की घोषणा हो गई और उसे पढ़ाई में भारी दिक्कत हो रही थी। इतनी दूर से वे उसे समझा भी नहीं पा रहे थे। कोविड-19 ने परिवारों को छिन्न-भिन्न कर दिया और सामान्य जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया था। राजनीतिक संबंध और अच्छे बैंक बैलेंस से भी कोई लाभ नहीं हुआ।आज उनकी पत्नी की स्थिति नाजुक है। 

एक वरिष्ठ पत्रकार और हमेशा हंसते-मुस्कुराते रवि राय की नौकरी पिछले साल एक टीवी चैनेल से खत्म हुई थी और उन्होंने अपना यूट्यब चैनेल शुरू कर दिया था। उनकी पत्नी रमा महामारी की खबरें सुन-सुनकर दहशत में आ चुकी थीं। उनके विरोध के बावजूद रवि दिल्ली के किसान आन्दोलन को कवर करने गए, फिर पश्चिम बंगाल में चुनाव के कवरेज के लिए भी गए-ठीक उसी समय जब दूसरी लहर तीव्र थी। वे कोविड लेकर वापस आए।

‘‘घर में ही देखभाल कर लेंगे’’, रमा जोर डाल रही थीं। पर रवि के भाइयों को लगा कि अस्पताल में बेहतर इलाज होगा, और उन्हें भर्ती कराया गया। 6 डोज़ रेमडेसिविर के लिए करीब 3 लाख रुपये लग गए पर कोई फायदा नहीं हुआ। शुरुआती लाभ के बाद फिर सांस की दिक्कत आई, तो एक बड़े अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा। पर वहां रक्तचाप तेज़ी से बढ़ने लगा।

रमा को ऊंचे ब्याज दर पर 5 लाख रुपये कर्ज लेना पड़ा ताकि इलाज हो सके। पहले भी दिल्ली में मकान बनाने के लिए रवि 30 लाख कर्ज ले चुके थे, जो चुकता नहीं हुआ था। उन्हें बेंगलुरु में रह रही अपनी बेटी के सुरक्षा की भी चिंता सता रही थी। 1 मई, 2021 को रवि को दिल का दौरा पड़ा और उन्हें बचाया न जा सका। बाहर से देखें तो लगेगा कि मध्यम वर्ग संकट से बेहतर निपट पा रहा है। पर स्टेटस जितना ऊंचा होता है, उतना ही अधिक प्रभावित करता है कोविड-19 संकट। आज रमा का भविष्य अंधकारमय लग रहा है क्योंकि उनके पास आय का स्रोत नहीं है। उन्हें निम्न मध्यम वर्गीय जीवन गुज़ारना पड़ सकता है और रिश्तेदारों व मित्रों के सामने अपना सम्मान घटता हुआ लग सकता है। 

‘‘देख रहे हो ना बिज़नेस 70 प्रतिशत डाउन हो गया है, बेटा। पैसा नहीं है अभी”, रमेश कुशवाहा अपने बेरोज़गार बेटे से कह रहे थे, जो फोटोग्राफी-वीडियोग्राफी का स्टूडियो खोलना चाह रहा था। रमेश की किसी उद्योग में नौकरी आर्थिक मंदी की वजह से जा चुकी थी। उन्होंने गांव में अपनी खेती के 2 एकड़ जमीन में से एक एकड़ बेच दिये और 8 लाख का निवेश करके परचून की दुकान खोल ली थी। कोविड-19 इन पर बम जैसा गिरा। लॉकडाउन की वजह से वे चार महीने बिज़नेस नहीं कर सके और जब उन्होंने पुनः दुकान खोली, वे कोरोना-संक्रमित हो गए। उनसे उनकी पत्नी, बेटे और बेटी तीनों को संक्रमण हुआ। पहले ठीक हुआ तो बेटा दुकान संभालने के लिए रुक गया। बाकी परिवार रमेश जी के साथ उनके ससुराल के गांव चले गए।

‘‘ हम लोगों को भी कोरोना देने आ गए यहां ?’’ रिश्तेदारों की तंज भरी बातें सुननी पड़ीं। गांव मे मेडिकल सुविधा नहीं थी तो पास से डॉक्टर बुलाने के लिए 5000 रुपये प्रति विजिट देने पड़ते। उन्होंने परेशान होकर 20-30 मित्रों को फोन कर डाला ताकि डॉक्टर की लिखी दवाएं उपलब्ध हो सकें। शहर में उनका बैंक खाता खाली हो रहा था और बचत नहीं रह गई। उन्हें अपने दो-पहिया वाहन और पत्नी के कुछ गहने सस्ते में बेचने पड़े। दुकान में बिक्री 75 प्रतिशत घट गई थी क्योंकि लोग सामान ऑनलाइन मंगाने लगे थे। उनका परिवार कोविड से तो उबर गया पर हाल में आई गरीबी से उबरने में उन्हें कई साल लगेंगे। 

‘‘अरे, ये कोरोना-वोरोना सब बकवास है’’, इलाहाबाद महापालिका के सफाईकर्मी शहाब अपने दोस्तों के सामने बांगते रहे थे…जब तक खुद उनकी पत्नी को कोविड नहीं हो गया। पहले से ही उसे स्तन कैंसर था। काफी लम्बे समय के इंतजार के बाद उसे शहर के बेली अस्पताल में दाखिला मिला, पर रोज़ डाक्टर पार्च बना कर दे देते और शहाब को बाहर से दवा खरीदनी पड़ती। सीटी स्कैन भी बाहर से करवाना पड़ा। कई साथियों ने चंदा दिया, पर 100-200 रुपये से अधिक नहीं, क्योंकि वे भी गरीब थे। एक सीटी स्कैन का ही 5000 रुपये लगता है और दवा के लिए पैसे ही नहीं बचते। शहाब ने कभी खाना नहीं पकाया था, तो तीन छोटे बच्चे कई बार भूखे ही रह जाते।

शहाब ने उन सभी से पैसे मांगे जिन्हें वह जानता था, पर खाली हाथ लौटा क्योंकि उसकी सामाजिक स्थिति में रह रहे सभी को महामारी ने तबाह कर रखा था। पत्नी दर्द से कराहती रहती क्योंकि दर्द-निवारक दवाएं नहीं मिलतीं; 8 दवाखानों में वह ढूंढ चुका था। वह खुद ज्यादा परेशान हो जाता तो 76 रुपये पाउच वाला देशी दारू पीकर सुकून पा जाता।

‘‘योगी जी ने अच्छा किया…..दारू की दुकानें खुलवा दीं’’, वह योगी जी की तारीफ ही कर रहा था जब उसे यह दुखद खबर मिली कि उसकी पत्नी भारी रक्तस्राव के कारण मर गई थी। उसके पास शव को दफनाने के लिए पैसा तक नहीं था, पर स्थानीय जमात के लोगों ने मदद की। पत्नी की मौत के साथ ही शहाब के सामान्य जीवन जीने के सपने भी मर गए थे।

नोटः ये चार केस सच्ची कहानियों पर आधारित हैं। निजता की रक्षा हेतु नाम बदल दिये गए हैं।

(बी. सिवरामन स्वतंत्र शोधकर्ता हैं।  sivaramanlb@yahoo.com पर उनसे संपर्क किया जा सकता है।)

सौजन्य: कोविड रिस्पांस वॉच 

This post was last modified on May 28, 2021 4:49 pm

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