Monday, October 18, 2021

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व्यक्ति की स्वतंत्रता अहम है,जमानत अर्जियों पर जल्द से जल्द सुनवाई की जाए: सुप्रीम कोर्ट

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उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि व्यक्ति की स्वतंत्रता ‘अहम’है और ज़मानत की अर्ज़ी पर जितनी जल्दी मुमकिन हो सुनवाई की जानी चाहिए। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि गिरफ्तारी पूर्व और गिरफ्तारी के बाद ज़मानत के लिए दायर होने वाले आवेदन के लिए कोई सीमा तय नहीं की जा सकती है लेकिन कम से कम यह आशा की जा सकती है कि ऐसी अर्ज़ियों पर जल्द से जल्द सुनवाई की जाए।

जस्टिस अजय रस्तोगी और जस्टिस एएस ओका की बेंच ने पंजाब के पटियाला जिले में दर्ज एक मामले के सिलसिले में इस साल मार्च में हिरासत में लिए गए एक आरोपी की याचिका का निबटारा करते हुए यह टिप्पणी की। इस याचिका में शीर्ष अदालत से अनुरोध किया गया है कि ज़मानत के लिए दायर उसका आवेदन पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के समक्ष लंबित है, जिस पर शीघ्र सुनवाई की जाए।

पीठ ने हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि याचिकाकर्ता की जमानत की अर्जी पर यथासंभव जल्दी विचार किया जाये। पीठ ने कहा कि सत्र अदालत ने उसकी ज़मानत अर्ज़ी खारिज कर दी थी। इसके बाद उसने 7 जुलाई को ज़मानत के लिए हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। याची के वकील ने पीठ से कहा कि मामले को अदालत में कई बार सूचीबद्ध किया गया लेकिन इस पर सुनवाई नहीं हो सकी।

उच्चतम न्यायालय ने पिछले हफ्ते पारित अपने आदेश में कहा, ‘हम इस समय मामले में हस्तक्षेप नहीं कर रहे हैं, लेकिन व्यक्ति की स्वतंत्रता अहम है और हम उम्मीद करते हैं कि अगर सीआरपीसी की धार 438/439 के तहत आवेदन दायर किया गया है, चाहे गिरफ्तारी से पहले या गिरफ्तारी के बाद में, तो इस पर जितना जल्दी संभव हो, सुनवाई होनी चाहिए।

आपराधिक दंड संहिता प्रक्रिया (सीआरपीसी) की धारा 438 का इस्तेमाल गिरफ्तारी की आशंका वाले व्यक्ति को ज़मानत देने के लिए किया जाता है जबकि सीआरपीसी की धारा 439 ज़मानत के संबंध में हाईकोर्ट या सेशन कोर्ट की विशेष शक्तियों से संबंधित है। याचिकाकर्ता को इस साल 30 मार्च को भारतीय दंड संहिता की धारा 304 (गैर इरादतन हत्या) के तहत दर्ज मामले में हिरासत में लिया गया था।

इस बीच एक अन्य मामले में उच्चतम न्यायालय ने आरोप पत्र दायर होने के बाद जमानत देने के दिशा-निर्देश जारी किए हैं। दरअसल अपराधों को चार श्रेणियों में विभाजित किया गया है। साथ ही यह भी कहा गया है कि जमानत देने में आरोपित के आचरण पर विचार होना चाहिए।

जस्टिस एसके कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश की पीठ ने इस मुद्दे पर अतिरिक्त सालिसिटर जनरल एसवी राजू और वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ लूथरा द्वारा दिए गए सुझावों को स्वीकार कर लिया। पीठ ने कहा कि अपराधों को ए से डी तक चार श्रेणियों में रखा गया है और दिशा-निर्देश संबंधित अदालतों के विवेक को प्रभावित किए बिना तथा वैधानिक प्रावधानों को ध्यान में रखते हुए निर्धारित किए गए हैं। पीठ ने कहा कि हम दिशा-निर्देशों को स्वीकार करने और उन्हें अदालतों के लाभ के लिए आदेश का हिस्सा बनाने के इच्छुक हैं। इसके अलावा, गैर जमानती वारंट को रद्द किया जा सकता है या आरोपित की प्रत्यक्ष उपस्थिति पर जोर दिए बिना जमानती वारंट/समन में परिवर्तित किया जा सकता है, यदि आरोपित की ओर से ऐसा आवेदन गैर जमानती वारंट के निष्पादन से पहले सुनवाई की अगली तारीख को प्रत्यक्ष रूप से उपस्थित होने के वादे के साथ किया जाता है।

एक अन्य मामले में जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ तथा जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने कहा है कि एक बार ट्रायल कोर्ट से दंडित हो जाने के बाद दोषियों को जमानत देन पर विचार नहीं किया जा सकता। ट्रायल में दंडित होने के बाद वे निर्दोष होने की मान्यता खो देते हैं, इस मान्यता का अपील पर सुनवाई करते हुए और जमानत देते हुए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। दंडित ठहराये जाने के बाद निर्दोष होने की मान्यता समाप्त हो जाने को देखते हुए हत्या जैसे गंभीर अपराधों में जमानत देते समय हाईकोर्ट को बेहद धीमा होना चाहिए।

पीठ ने ये सामान्य निर्देश इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा हत्या के चार दोषियों को दी गई जमानत के मामले में दिए। हाईकोर्ट ने इस आधार पर दोषियों को जमानत दे दी थी कि दोषी ठहराए जाने के फैसले के खिलाफ उनकी अपील हाईकोर्ट में लंबित हैं। ट्रायल कोर्ट ने चारों को उम्रकैद की सजा दी थी। इस मामले में हाईकोर्ट ने यह भी नहीं देखा कि दोषी ठहराए जाने के बाद दोषी कुछ ही दिन जेल में रहे थे। वहीं कोर्ट ने यह भी स्पष्ट नहीं किया था कि मामला लंबित रहने के दौरान उन्हें छोड़ा जा रहा है जबकि उन्होंने मुकदमे की जांच के दौरान उसे प्रभावित करने और पटरी से उतारने की कोशिश भी की थी। साथ ही पोस्टमार्टम की रिपोर्ट से छेड़छाड़ की करवाई थी।

हालांकि इससे कुछ दिन पूर्व उच्चतम न्यायालय ने यह भी कहा था कि उन दोषियों को हाईकोर्ट को जमानत पर रिहा करना चाहिए जिन्होंने अपने जुर्म की आधी से ज्यादा सजा जेल में काट ली है। या ऐसे अभियुक्त जो 60 वर्ष से ऊपर के हैं, उन्हें जामनत दी जाए। उच्चतम न्यायालय इस हफ्ते के शुरू में ही आगरा और वाराणसी की जेलों में बंद उम्रकैद की सजा काट रहे 97 दोषियों को रिहा करने का आदेश दिया था। ये दोषी 14 वर्ष से ज्यादा जेल में गुजार चुके थे जबकि आईपीसी, 1860 की धारा 55 के अनुसार उनकी उम्रकैद की सजा 14 साल से ज्यादा नहीं हो सकती। कोर्ट ने यूपी सरकार को आदेश दिया था कि वह 14 साल की सजा काट चुके लोगों को रिहा करने की नीति भी बनाए।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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