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प्रशांत भूषण के समर्थन में आयीं पूर्व जज समेत 131 शख्सियतें, कहा-अवमानना की कार्यवाही आलोचना का दम घोटने का प्रयास

ऐसा प्रतीत होता है कि उच्चतम न्यायालय के कामकाज को लेकर कई मुद्दों पर अपनी आवाज बुलंद करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करना आलोचना का दम घोटने का एक प्रयास है। प्रतिशोध या आपराधिक अवमानना की कार्रवाई के डर के बिना एक महत्वपूर्ण संस्थान के रूप में देश के उच्चतम न्यायालय को सार्वजनिक चर्चा के लिए ओपन होना चाहिए।

यह बयान प्रशांत भूषण के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के मामले में उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मदन बी लोकुर, दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एपी शाह, वरिष्ठ अधिवक्ता सुधीर नंदराजोग, वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह, सीयू सिंह, संजय हेगड़े, गोपाल शंकरनारायणन, आनंद ग्रोवर, अमीर सिंह चड्ढा, मिहिर देसाई, अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर, पूर्व नौसेनाध्यक्ष एडमिरल रामदास, सामाजिक कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज, जेएनयू के प्रोफेसर दीपक नैयर, राजनीतिक कार्यकर्ता योगेंद्र यादव, राज्यसभा सांसद मनोज कुमार झा, पूर्व राज्यसभा सांसद डी राजा आदि पूर्व न्यायाधीशों, पूर्व वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों, राजदूतों, कार्यकर्ताओं और शिक्षाविदों सहित 131 लोगों ने उनके पक्ष में एकजुटता दिखाते हुए जारी किया है।

पिछले हफ्ते न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने अधिवक्ता प्रशांत भूषण को नोटिस जारी किया था। जिसमें उनसे पूछा गया था कि न्यायपालिका पर किए गए उनके ट्वीट के मामले में क्यों न उनके खिलाफ अदालती अवमानना की कार्यवाही शुरू की जाए?

इस वक्तव्य के 131 हस्ताक्षरकर्ताओं ने अवमानना की कार्यवाही पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा है कि पिछले कुछ वर्षों में राज्य द्वारा लोगों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करने और सरकारी ज्यादतियों की जाँच करने के मामलों में उच्चतम न्यायालय द्वारा अपनी संवैधानिक रूप से अनिवार्य भूमिका को निभाने में दिखाई गई अनिच्छा पर कई गंभीर सवाल हैं। ये सवाल समाज के सभी वर्गों- मीडिया, शिक्षाविदों, नागरिक समाज संगठनों, कानूनी बिरादरी के सदस्यों और यहां तक कि खुद सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और सेवानिवृत्त न्यायाधीशों द्वारा उठाए गए हैं। हाल ही में, लॉक डाउन के दौरान प्रवासी संकट को रोकने के मामले में उच्चतम न्यायालय  द्वारा उचित समय पर हस्तक्षेप न करना या ऐसा करने की इच्छा न दिखाना भी सवालों के घेरे में आया है या इस पर सवाल उठाए गए हैं।

वहीं कोरोना महामारी की शुरुआत हुए पांच महीने बीत चुके हैं, उसके बावजूद भी सीमित तरीके से, फिजिकल हियरिंग या सुनवाई फिर से शुरू न करने के मामले में भी अदालत के फैसले को लेकर चिंताएं जताई गई हैं। बयान में कहा गया है कि हम उच्चतम न्यायालय के माननीय न्यायाधीशों से इन चिंताओं पर ध्यान देने और जनता के साथ खुले और पारदर्शी तरीके से जुड़ने का आग्रह करते हैं। भूषण के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही की शुरुआत करना (जिन्होंने अपने ट्वीट में इन चिंताओं में से कुछ को स्पष्ट किया था), इस तरह की आलोचना को दबाने का एक प्रयास है।

जबकि इस तरह की आलोचना सिर्फ प्रशांत भूषण द्वारा ही नहीं, बल्कि भारतीय लोकतांत्रिक और संवैधानिक सेटअप के सभी हित धारकों द्वारा की जा रही है। हमारा मानना है कि संस्था को इन वास्तविक चिंताओं को दूर करना चाहिए या इन पर विचार करना चाहिए। बयान में कहा गया है कि भूषण समाज के कमजोर तबके के लोगों के अधिकारों के लिए बिना रुके लड़ते आए हैं और उन्होंने अपना पूरा करियर ऐसे लोगों को मुफ्त लीगल सेवा देने में बिता दिया, जो न्याय नहीं मांग सकते थे। बयान में मांग की गयी है कि उच्चतम न्यायालय  खुले और बिना डर के पब्लिक डिस्कशन के लिए तैयार रहे।

बयान में कहा गया है कि ज्यादातर कार्यशील लोकतंत्र जैसे कि यूएसए और यूके ने आपराधिक अवमानना की अवधारणा को समाप्त कर दिया है। भारत में भी यह सिद्धांत है कि न्यायपालिका की आलोचना को अवमानना की शक्ति का अंधाधुंध उपयोग करके रोकना नहीं चाहिए। वहीं इस सिद्धांत को उच्चतम न्यायालय द्वारा मान्यता दी गई है। हस्ताक्षरकर्ताओं ने उच्चतम न्यायालय  से आग्रह किया है कि न्याय और निष्पक्षता के हित में और उच्चतम न्यायालय की गरिमा को बनाए रखने के लिए प्रशांत भूषण के खिलाफ सू-मोटो अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के निर्णय पर फिर से विचार करे और जल्द से जल्द इसे वापस लिया जाए।

यह आपराधिक अवमानना की कार्यवाही भूषण के 27 जून के ट्वीट को लेकर शुरू की गई है। जिसमें कहा गया था कि जब भविष्य में इतिहासकार पिछले 6 वर्षों में वापस मुड़ कर देखेंगे तो पाएंगे कि कैसे औपचारिक आपातकाल के बिना भी भारत में लोकतंत्र नष्ट हो गया है। उस समय वे विशेष रूप से इस विनाश में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका को चिह्नित करेंगे और विशेष रूप से अंतिम 4 सीजेआई की भूमिका को।

उच्चतम न्यायालय  का कहना है कि उनको एक वकील से शिकायत मिली है,जो भूषण द्वारा 29 जून को किए गए ट्वीट के संबंध में है। इस ट्वीट में भारत के मुख्य न्यायाधीश एसए बोबडे द्वारा हार्ले डेविडसन मोटर बाइक की सवारी करने पर टिप्पणी की गई थी। हाल ही में, ट्विटर ने दोनों ट्वीट्स पर रोक लगा दी है और उन्हें एक संदेश के साथ छुपाया गया कि कानूनी मांग के जवाब में @pbhushan1 के इस ट्वीट को भारत में हटा दिया गया है।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on July 28, 2020 9:41 am

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