Monday, October 18, 2021

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‘सरकार को हठधर्मिता छोड़ किसानों का दर्द सुनना पड़ेगा’

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जुलाना/जींद। पूर्व विधायक परमेंद्र सिंह ढुल ने जुलाना में कार्यकर्ताओं की मासिक बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीनों ही अध्यादेश अपने वर्तमान स्वरूप में किसानों को तबाह कर देने वाले हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को अड़ियल रवैया अपनाना छोड़कर किसानों की बात सुनकर उनकी शंकाओं को दूर करना ही होगा। आज देश की 76 प्रतिशत आबादी सीधे तौर पर कृषि से जुड़ी है। जहां दूसरे देशों में कृषि व्यवसाय है, वहीं हमारे यहां कृषि दैनिक जीवन है। ऐसे में किसानों की मांगों को अनसुना नहीं किया जा सकता।

उन्होंने कहा कि हरित क्रांति की शुरुआत हरियाणा और पंजाब के क्षेत्र से ही हुई थी। मंडी व्यवस्था को वर्तमान स्वरूप तक पहुंचाने में सर छोटूराम जी का अग्रणी योगदान रहा है। आज जरूरत देश भर में मंडी व्यवस्था को बढ़ावा देने की है, ताकि किसान अपनी फसलों की उचित कीमत पा सकें। आज देश भर में लगभग सात हज़ार के करीब मण्डियां हैं, जहां फसल खरीद होती रही है। वहीं जरूरत 42 हज़ार और अतिरिक्त मण्डियों को स्थापित किए जाने की है। इसके साथ ही न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद सुनिश्चित की जानी होगी।

अध्यादेशों के बारे में विस्तृत जानकारी देते हुए परमेंद्र सिंह ने कहा कि बिल में न्यूनतम समर्थन मूल्य की बाध्यता का न होना, खरीददार से विवाद होने की स्थिति में किसानों को न्यायालय में जाने का प्रावधान न दिया जाना, कंपनियों को आवश्यक वस्तुओं के भंडारण की छूट दिया जाना आदि कुछ फैसले हैं जो किसानों के मन में शंका पैदा करते हैं तथा निर्णयकर्ताओं की मंशा पर सवाल खड़े करते हैं।

उन्होंने कहा इन अध्यादेशों ने स्पष्ट तौर पर स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को अनसुना कर दिया है। सरकार अन्य फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य देने की घोषणा करने के बजाय ऐसे-ऐसे कानून बना रही है, जिसने मंडी व्यवस्था को, न्यूनतम समर्थन मूल्य व्यवस्था को, न्यायिक प्रणाली को और साथ ही स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को भी बाईपास कर दिया है। इसे किसी भी कीमत पर स्वीकार नहीं किया जा सकता है।

उन्होंने कहा की इन नए कानूनों के अंतर्गत किसानों की फसल की पहले ग्रेडिंग होगी और न्यूनतम समर्थन मूल्य बाध्यकारी न होने की वजह से खरीददार या बड़ी-बड़ी कंपनियां अपनी सुविधा के अनूरूप प्रत्येक ग्रेड की अलग-अलग कीमत तय करेगी। इसका हक भी किसान को नहीं दिया गया है। उन्होंने कहा की इन किसान विरोधी कानूनों को वापस लिए जाने को लेकर वे निर्णयकर्ताओं पर प्रजातांत्रिक दबाव बनाने के लिए हर दरवाजे पर दस्तक देंगे। उन्होंने कहा कि स्वर्गीय चौधरी दलसिंह जी के चरणों में बैठकर लोगों के लिए लड़ना सीखा है तथा वे अब पीछे हटने वाले नहीं हैं।

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