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सीएजी रिपोर्टः ओएनजीसी के खजाने पर सरकार का डाका, कंपनी का पैसा डाला अपनी जेब में

आपको याद होगा वर्ष 2017 में अख़बारों और इलेक्ट्रानिक मीडिया में सुर्ख़ियां थीं, ‘एचपीसीएल और ओएनजीसी मिलकर बनेंगी देश की सबसे बड़ी तेल कंपनी, कैबिनेट ने दी हिस्सेदारी बेचने को मंजूरी’ लेकिन संसद में पेश नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (सीएजी) की रिपोर्ट से मोदी सरकार की बाजीगरी का पर्दाफाश हुआ है। मोदी सरकार ने ‘वर्टिकल मर्जर’  के नाम पर ओएनजीसी की बैलेंस शीट से कैश निकाल कर अपने खजाने में डाल दिया था। यूपीए-2 सरकार के कार्यकाल में जिस तरह यूपीए-1 के कारनामों का खुलासा सीएजी की रिपोर्टों से हो रहा था ठीक उसी तरह मोदी-2 में मोदी-1 के कार्यकाल की एक-एक कर के पोल-पट्टी खुल रही है, लेकिन एक फर्क है तब मीडिया इसे सुर्ख़ियों में प्रकाशित-प्रसारित कर रहा था आज इसे दबाने में लगा है।

नियंत्रक और महालेखापरीक्षक (सीएजी) ने केंद्र सरकार के ‘विनिवेश’ कार्यक्रम पर सवाल उठाए हैं। सार्वजनिक क्षेत्र की एक कंपनी दूसरे को रणनीतिक रूप से बेचे  जाने की कवायद को सीएजी ने बेकार करार दिया है। सीएजी ने संसद में पेश रिपोर्ट में कहा है कि ऐसे विनिवेशों से केवल संसाधनों का स्‍थानांतरण हुआ जो कि पहले से ही सार्वजनिक क्षेत्र में मौजूद थे। इससे विनिवेशित पीएसयू में सार्वजनिक क्षेत्र/सरकार की हिस्‍सेदारी में कोई बदलाव नहीं हुआ। साल 2018-19 के बीच, इन ‘रणनीतिक विनिवेशों’ का कुल विनिवेश (72,620 करोड़ रुपये) में 1/5 हिस्‍सा था।

सरकार ने 2018-19 में रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉर्पोरेशन-पीएफसी को, ड्रेजिंग कॉर्पोरेशन-पोर्ट ट्रस्‍ट्स को, नेशनल प्रोजेक्‍ट्स कंस्‍ट्रक्‍शन कंपनी-वापकाश कॉर्पोरेशन को तथा एचएससीसी (इंडिया)-एनबीसीसी को बेचा था। इससे पहले, सरकार ने तेल कंपनी हिंदुस्‍तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) को ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ओएनजीसी) को बेच दिया था। केंद्र सरकार के रणनीतिक बिक्री कार्यक्रम को खास सफलता नहीं मिली तो निवेश और लोक परिसंपत्ति प्रबंधन विभाग ने एक पीएसयू दूसरे को बेचना शुरू कर दिया। मगर केंद्रीय कैबिनेट ने जिन बीमारी कंपनियों को बेचने की मंजूरी दी, उसमें से कई का निपटारा विभाग नहीं कर सका।

स्‍पेसिफाइड अंडरटेकिंग ऑफ यूटीआई (एसयूयूटीआई) के शेयरों की बिक्री पर भी सीएजी की नजर टेढ़ी हुई है। एसयूयूटीआई को पहले से मौजूद यूटीआई के शेयर टेकओवर करने के लिए बनाया जाता है। सीएजी का कहना है कि केंद्र के खातों में एसयूयूटीआई की ही परिसंपत्तियां और देनदारियां नहीं  दिखाई गई हैं। साल 2018-19 के दौरान, एसयूयूटीआई ने कुछ शेयर बेचकर सरकार को लगभग 12,426 करोड़ रुपये ट्रांसफर किए थे।

इस वर्गीकरण को ‘विविध पूंजी प्राप्तियों’ की तरह बताने को भी सीएजी ने ‘गलत’ करार दिया है। सीएजी का कहना है कि एसयूयूटीआई सरकारी संस्‍था नहीं है और शेयरों की बिक्री की प्राप्तियां गैर-कर राजस्‍व की तरह ही ली जानी चाहिए, न कि पूंजी प्राप्तियों की तरह। सीएजी ने कहा, “गलत वर्गीकरण की वजह से, इस साल के लिए सरकार की पूंजी प्राप्तियां ज्‍यादा रहीं और राजस्‍व प्राप्तियां कम।”

इसके पहले जुलाई 2017 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सार्वजनिक क्षेत्र की तीसरी सबसे बड़ी तेल मार्केटिंग कंपनी हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड में सरकार की हिस्‍सेदारी तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम को बेचने वाले प्रस्‍ताव को आज मंजूरी दे दी है। इस सौदे का मूल्‍य लगभग 28,000 करोड़ रुपये आंका गया था। इसके तहत ओएनजीसी ने हिंदुस्तान पेट्रोलियम में सरकार की 51.11 प्रतिशत हिस्सेदारी खरीदी थी। ओएनजीसी के हिंदुस्तान पेट्रोलियम में हिस्सेदारी खरीदने के बाद वह उसकी अनुषंगी कंपनी बन गई।

तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने अपने बजट भाषण में एकीकृत पेट्रोलियम कंपनी बनाने की घोषणा की थी। एचपीसीएल का ओएनजीसी में विलय नहीं किया गया था। यह ओएनजीसी की अनुषंगी के रूप में एक अलग इकाई के तौर पर काम कर रही है।

गिरीश मालवीय ने अपनी फेसबुक वाल पर लिखा है कि नोटबंदी और जीएसटी और बढ़ते एनपीए के बाद सरकार की आर्थिक स्थिति डावांडोल होने को आई थी, उसे ज्यादा पैसे की जरूरत थी। वर्ष 2017-18 में सरकार ने 72,500 करोड़ रुपये के विनिवेश लक्ष्य के मुकाबले 11 जनवरी तक 54,337 करोड़ रुपये का विनिवेश लक्ष्य ही हासिल किया था, जब वित्त वर्ष खत्म होने में सिर्फ 50 दिन बचे थे, लेकिन उस वक्त मोदी सरकार ने ग़जब की बाजीगरी दिखाई, जिसे देख कर बड़े-बड़े अर्थशास्त्रियों ने भी अपना सर पीट लिया उसने अपनी ही कंपनी की हिस्सेदारी अपनी ही किसी दूसरी कंपनी के हाथों बेचने की योजना बना ली।

मोदी सरकार ने डूबती हुई हिंदुस्तान पेट्रोलियम कारपोरेशन लिमिटेड यानी एचपीसीएल में अपनी कुल 51 फीसदी हिस्सेदारी ओएनजीसी को बेच दी। दूसरी तरह से कहा जाए तो मोदी सरकार ने खुलेआम मनमानी करते हुए ओएनजीसी की बैलेंस शीट से कैश निकालकर अपने खजाने में डाल दिया था, इस सौदे को ‘वर्टिकल मर्जर’ कहा गया। तीन साल बाद अब सीएजी की रिपोर्ट से इस जेब से निकलकर उस जेब में पैसा रखने के सरकारी खेल का पर्दाफाश हुआ है।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं और वह इलाहाबाद में रहते हैं।)

This post was last modified on September 27, 2020 1:30 pm

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