Wednesday, December 8, 2021

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केंद्र सरकार की लालच के नतीजे थे पेट्रोल और डीजल पर लगाए गए उच्च कर

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हिमाचल में तीन विधानसभा और एक लोकसभा तथा राजस्थान में दो विधानसभा सीटों के उपचुनाव में कहीं जमानत जब्त करा ली तो कहीं तीसरे-चौथे स्थान पर पहुंच गयी तो अचानक मोदी सरकार कि नींद टूटी और एक्साइज ड्यूटी में पेट्रोल पर पांच रूपये ,डीजल पर 10 रूपये की कटौती कि घोषणा कर दी गयी। भांड़ मीडिया ने बिना देर किये विरदावली गाना शुरू कर दिया कि मोदी सरकार ने देशवासियों को दीपावली गिफ्ट दिया है ,मंहगाई से राहत दी है ,वगैरह-वगैरह।

लेकिन भांड़ मीडिया ने यह नहीं बताया कि वर्ष 2014 में मोदी सरकार के आने के बाद 6 साल में पेट्रोल पर करीब 250 फीसद एक्साइज ड्यूटी बढ़ाई गई है। 2014 में पेट्रोल पर 9.48, 2015 में 19.3, 2020 में 32.90 रुपए एक्साइज ड्यूटी बढ़ते-बढ़ते हो गयी थी। अब 5 फीसद घटाने के बाद 27.9 ₹0हो गई। इसी तरह 2014 में डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 3.5, 2015 में 11.3 और 2020 में 31.80 रुपए हो गयी थी थी ।अब ₹10 घटाने के बाद 21.80 रुपए रह गई है।

भांड़ मीडिया ने यह भी नहीं बताया कि मोदी सरकार के पिछले 5 वर्ष में एक लीटर पेट्रोल कि कीमत 58.6 फीसद तक बढ़ गई है। एक लीटर पेट्रोल की कीमत 1 नवंबर 2017 को ₹69.14 डीजल ₹57.73 पैसे प्रति लीटर था। 1 नवंबर 2018 को पेट्रोल 79.37 और डीजल 73 .78 प्रति लीटर था। एक नवंबर 2019 को पेट्रोल 72.86 और डीजल 65. 80 रूपये प्रति लीटर था। 1 नवंबर 2020 को पेट्रोल 81.06 और डीजल 70.46 रूपये प्रति लीटर था। 1 नवंबर 2021 को पेट्रोल 109.69 और डीजल 98.42 रुपये प्रति लीटर था। भांड़ मीडिया ने यह भी नहीं बताया कि सरकार ने पिछले साल पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी को बढ़ाकर 32.90 रुपए प्रति लीटर और डीजल पर 31.8 रुपए प्रति लीटर कर दिया था। जबकि पेट्रोल की कीमत 76 बार और डीजल की कीमत 73 बार बढ़ाई गई थी।

महंगे पेट्रोल-डीजल की मार से एक तरफ आम आदमी त्रस्त है तो दूसरी तरफ इससे सरकार की जेब भर रही है। सरकार ने लोकसभा में कहा है कि 31 मार्च 2021 को समाप्त हुए पिछले वित्त वर्ष में पेट्रोल-डीजल की एक्साइज ड्यूटी से 3.35 लाख करोड़ रुपए की कमाई हुई है। यह अब तक का रिकॉर्ड है। पूरे वित्त वर्ष 2020-21 में पेट्रोलियम उत्पादों से सरकार का उत्पाद शुल्क कलेक्शन 3.89 लाख करोड़ रुपये रहा था। 2019-20 में यह 2.39 लाख करोड़ रुपये था।पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क कलेक्शन चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही यानी अप्रैल-सितंबर में पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 33 प्रतिशत बढ़ा है।

आधिकारिक आंकड़ों से यह जानकारी मिली है। यदि कोविड-पूर्व के आंकड़ों से तुलना की जाए, तो पेट्रोलियम उत्पादों पर उत्पाद शुल्क कलेक्शन में 79 प्रतिशत की बड़ी वृद्धि हुई है। वित्त मंत्रालय में लेखा महानियंत्रक (सीजीए) के आंकड़ों के अनुसार, चालू वित्त वर्ष के पहले छह माह में पेट्रोलियम उत्पादों पर सरकार का उत्पाद शुल्क कलेक्शन पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि की तुलना में 33 प्रतिशत बढ़कर 1.71 लाख करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। पिछले साल की समान अवधि में यह 1.28 लाख करोड़ रुपये रहा था।यह पैसा टैक्स या एक्साइज ड्यूटी कि अत्यधिक ऊँची दरों से मोदी सरकार ने वसूला था ।

यह अप्रैल-सितंबर, 2019 के 95,930 करोड़ रुपये के आंकड़े से 79 प्रतिशत अधिक है। पूरे वित्त वर्ष 2020-21 में पेट्रोलियम उत्पादों से सरकार का उत्पाद शुल्क कलेक्शन 3.89 लाख करोड़ रुपये रहा था। 2019-20 में यह 2.39 लाख करोड़ रुपये था। माल एवं सेवा कर (जीएसटी) प्रणाली लागू होने के बाद सिर्फ पेट्रोल, डीजल, विमान ईंधन और प्राकृतिक गैस पर ही उत्पाद शुल्क लगता है। अन्य उत्पादों और सेवाओं पर जीएसटी लगता है।

वित्त मंत्रालय में लेखा महानियंत्रक (सीजीए) के अनुसार, 2018-19 में कुल उत्पाद शुल्क कलेक्शन 2.3 लाख करोड़ रुपये रहा था। इसमें से 35,874 करोड़ रुपये राज्यों को वितरित किए गए थे। इससे पिछले 2017-18 के वित्त वर्ष में 2.58 लाख करोड़ रुपये में से 71,759 करोड़ रुपये राज्यों को दिए गए थे। वित्त वर्ष 2020-21 की पहली छमाही में पेट्रोलियम उत्पादों पर बढ़ा हुआ (इंक्रीमेंटल) उत्पाद शुल्क कलेक्शन 42,931 करोड़ रुपये रहा था। यह सरकार की पूरे साल के लिए बॉन्ड देनदारी 10,000 करोड़ रुपये का चार गुना है। ये तेल बॉन्ड पूर्ववर्ती कांग्रेस की अगुवाई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार में जारी किए गए थे।ज्यादातर उत्पाद शुल्क कलेक्शन पेट्रोल और डीजल की बिक्री से हासिल हुआ है।

पेट्रोल और डीजल पर सबसे अधिक उत्पाद शुल्क जुटाया जा रहा है। नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले साल वाहन ईंधन पर कर दरों को रिकॉर्ड उच्चस्तर पर कर दिया था। पिछले साल पेट्रोल पर उत्पाद शुल्क को 19.98 रुपये से बढ़ाकर 32.9 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया था। इसी तरह डीजल पर शुल्क बढ़ाकर 31.80 रुपये प्रति लीटर किया गया था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें सुधार के साथ 85 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गई हैं और मांग लौटी है, लेकिन सरकार ने उत्पाद शुल्क नहीं घटाया है। इस वजह से देश के सभी बड़े शहरों में पेट्रोल 100 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच गया है। वहीं डेढ़ दर्जन से अधिक राज्यों में डीजल शतक लगा चुका है। सरकार ने पांच मई, 2020 को उत्पाद शुल्क में बढ़ोत्तरी कर इसे रिकॉर्ड स्तर पर कर दिया था। उसके बाद से पेट्रोल के दाम 37.38 रुपये प्रति लीटर बढ़े हैं। इस दौरान डीजल कीमतों में 27.98 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोत्तरी हुई है।

भारत उन देशों में शामिल है जहाँ ईंधनों पर सबसे ज़्यादा टैक्स लिया जा रहा है। आर्थिक मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर संतोष मेहरोत्रा ने सत्य हिंदी के एक कार्यक्रम में कहा कि जर्मनी, इटली, जापान जैसे देशों में पेट्रोलियम पदार्थों पर 65 फ़ीसदी से ज़्यादा टैक्स नहीं लगाया जाता है, लेकिन भारत में यह 260 फ़ीसदी लगाया जा रहा है और इसी वजह से पेट्रोल-डीजल इतना महंगा है।

अभी तक सरकार कहती थी कि कांग्रेस द्वारा जारी बॉन्डों के भुगतान के लिए पेट्रोलियम पदार्थों पर ऊँची दरों से टैक्स लिया जा रहा है तो सवाल उठ रहा है कि क्या इसका भुगतान मोदी सरकार ने कर दिया है ? दरअसल मोदी सरकार ने उत्पाद शुल्क में कटौती का यह फ़ैसला तब लिया है जब एक दिन पहले ही 13 राज्यों में हुए उपचुनाव के नतीजों ने भाजपा को तगड़ा झटका दिया है। ऐसा इसलिए कि असम को छोड़कर अन्य सभी राज्य में भाजपा के लिए निराशाजनक स्थिति रही है। पश्चिम बंगाल में 4 में से 3 सीटों पर जमानत जब्त हो गई। चौथी सीट पर भी बड़े अंतर से हार हुई। हिमाचल में कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन किया और एक विधानसभा की सीट पर भाजपा कि जमानत जब्त हो गयी।

राजस्थान में भी बीजेपी की हालत बेहद ख़राब रही, कहीं तीसरे पर तो कहीं चौथे स्थान पर रही। कर्नाटक में बीजेपी-कांग्रेस को 1-1 सीट मिलीऔर मुख्यमंत्री के जिले में कांग्रेस को विजय मिली । मध्य प्रदेश में बीजेपी की अपेक्षाकृत अच्छी स्थिति रही, लेकिन उसके गढ़ में भी जीत का मार्जिन काफ़ी कम हो गया है।हरियाणा में भाजपा की हार हुई और चौटाला के लोकदल को विजय मिली। इन सभी जगहों पर किसान आन्दोलन और अन्य कारणों के साथ महंगाई को सबसे बड़ा मुद्दा माना गया। इसमें भी पेट्रोल और डीजल के महंगे होने का मुद्दा तो सबसे अहम रहा। हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने तो कह दिया कि पार्टी को जनता ने नहीं, बल्कि महंगाई ने हराया है। अब चूंकि पांच महीने में ही पाँच राज्यों में चुनाव होने हैं तो सरकार के लिए यह एक निर्णायक वक़्त है।

जिस तरह से ऊंट के मुंह में जीरे की तरह राहत है उससे यह भी साफ हो गया है कि पेट्रोल और डीजल की आसमान छूती कीमतें उच्च करों का परिणाम थीं और हैं। यही नहीं उच्च कर केंद्र सरकार की “लालच” का परिणाम थे और हैं।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजकल इलाहाबाद में रहते हैं।)

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