वाराणसी से ग्राउंड रिपोर्ट: ‘लोग हमारा छुआ पानी तक नहीं पीते और हम ही उन्हें दे रहे सदियों से मोक्ष’

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वाराणसी। भारत की आजादी के 75 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में देश में आजादी का अमृतमहोत्सव की धूम है। सत्ता के दावों के बीच जनता तक में आधुनिक यानी मॉडर्न होने की होड़ चल रही है। चिंता वाली बात यह है कि अब भी देश में जाति और भेदभाव की दीवारें ढहने का नाम नहीं ले रही हैं।

इसके चलते रोजाना लाखों लोगों को महज जाति के कारण भेदभाव, अपमान और असमानता का ज़हर पीना पड़ रहा है। बनारस में गंगा नदी के किनारे अनादिकाल से श्मशान घाट पर चिताएं जल रही हैं, यहीं के मीरघाट पर रहने वाले डोम राजा का परिवार मणिकर्णिका घाट पर सदियों से चिताओं को आग देने का काम करते आ रहे हैं।

आज भी गांव, शहर और समाज में हाशिए पर पड़े डोम जाति के लोगों का दो वक्त की रोटी के प्रबंध के लिए अथक परिश्रम करना पड़ता है। श्मशान घाट पर भारतीय हिन्दू समाज में जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्ति देने के वक्त बड़ी भूमिका में होने वाले डोम जाति के लोग उपेक्षा और जातिवाद के जहर से परेशान हैं। विकास के सभी मोर्चे पर उपेक्षित डोम समाज आज भी चिता की लकड़ी पर खाना बनाने को विवश हैं।

डोम बिरादरी साल 2014 में तब राष्ट्रीय फलक पर चर्चा में आया, जब वाराणसी से नरेंद्र मोदी ने डोमराजा जगदीश चौधरी को अपने प्रस्तावक के तौर पर चुना था। इसके बाद से डोम समाज को लगा था कि उनका भी समाज आगामी कुछ वर्षों में तरक्की का रास्ता पकड़ लेगा। महज डोम जाति के होने की वजह से सदियों से चली आ रही उपेक्षा और जाति के जहर से छुटकारा मिल जाएगा।

इनके बच्चों को डोम जाति में जन्म लेने की वजह से स्कूल में अलग नहीं बैठाया जाएगा। कुछ पढ़े-लिखे युवा चिता जलाने के अलावा अन्य काम और रोजी-रोजगार को अपना सकेंगे। किसी भी समाज में आने-जाने और सम्मान के साथ सिर उठाकर जीवन जी सकेंगे।

अफसोस की तब से लेकर अब तक आठ साल से अधिक समय यूं ही गुजर गया, लेकिन डोम जाति की माली हालत में कोई बड़ा फर्क नहीं आया है। हालांकि बाद में नवंबर, वर्ष 2021 में डोमराजा जगदीश चौधरी को मरणोपरांत पद्मश्री सम्मान मिला।

बहुत भेदभाव होता है

मीरघाट के 34 साल के डोम कपिल चौधरी मणिकर्णिका पर अपने शिफ्ट में शवों (चिता) को जलाने के काम पर जाने की तैयारी कर रहे थे। डोम जाति में जन्म लेने की वजह से जातीय उपहास और उपेक्षा से दुःखी कपिल चौधरी “जनचौक” से कहते हैं कि “समाज में कहीं जाओ तो लोग देखकर कहते हैं कि ‘फलनवा’ आया है। घाट पर लाश जलाता है। लोग अपना पानी छूने नहीं देते हैं, और हमारा छुआ पानी नहीं पीते हैं। जबकि हम लोग हिन्दू धर्म के लोगों को सदियों से मोक्ष देते आ रहे हैं। यानी जीवन-मृत्यु के बंधन से मोक्ष दे रहे हैं।

बहुत भेदभाव होता है डोम कास्ट को लेकर। हम लोगों का कोई काम सफल नहीं होता है। समाज के साथ थाना-प्रशासन के लोग भी हम लोगों को कमतर समझते हैं। हम लोगों की सुनवाई नहीं होती है। क्या किया जाए, हम लोग किसी तरह से जीवन की गाड़ी खींच रहे हैं। मोदी जी पर भरोसा था, लेकिन आज भी हम लोगों को समाज में भेदभाव का सामना करना पड़ता है”।

वाराणसी मणिकर्णिका घाट

‘डोम राजा’ को धरती का यमराज कहा जाता है, जो शवों का दाह-संस्कार करके मृत आत्माओं को मोक्ष का रास्ता दिखाते हैं। वाराणसी में हरिश्चंद्र, मीरघाट और मणिकर्णिका घाट पर तकरीबन आठ सौ डोम रहते हैं, जबकि वाराणसी जिले में उनकी बिरादरी में सात हजार से ज्यादा लोग हैं। बाद में यहीं से चंदौली, गाजीपुर, जौनपुर, मिर्जापुर, सोनभद्र और बलिया के अलावा अन्य जगहों पर चले गए और दाह संस्कार करा रहे हैं।

आखिर क्यों नहीं मिल पा रहा डोम समाज को सम्मान

चौधरी ने आगे बताया कि “हमारे बड़े-बुजुर्गों को छोड़िये, डोम समाज के नए पीढ़ी के बच्चे अपने ही मोहल्ले के बच्चों के साथ खेलते हैं तो अन्य समाज के लोग अपने बच्चों को भगा देते हैं, और कहते हैं “डोमवां” के बच्चों के साथ क्यों खेल रहे हो? कहने को तो ये पढ़े-लिखे और सामाजिक रूप से आगे बढ़े लोग होते हैं, जो बच्चों के खेल में भी जाति घुसेड़ देते हैं”।

ये लोग तो बोलते ही हैं, साथ ही साथ अपने बच्चों के दिमाग में भी जाति का जहर घोलते हैं। अब तो इनके बच्चे भी कहने और कटने लगे हैं। हमारे समाज के बच्चों को स्कूल में अलग बिठाते हैं। हम लोग यानी डोम समाज रोजाना ऐसी स्थिति को झेलता है।

तमाम सरकारें आईं और गईं, लेकिन डोम समाज को अभी तक वह सम्मान नहीं मिल पाया है, जो मिलना चाहिए था। यह आधुनिक भारत की एक कड़वी सच्चाई है। महंगाई बढ़ रही है, हम लोगों की कमाई बहुत सीमित है। दिनभर में लाश को जलाकर जितना कमाते हैं। वह घर के दैनिक जरूरत के लिए भी कम पड़ जाता है। ऐसे में बचाएंगे क्या?  और क्या भविष्य के बारे में सोचेंगे?

मीरघाट के निवासी कपिल चौधरी

शिव और शव के बीच की कड़ी हैं डोम  

देश आजादी का अमृत-महोत्सव मना रहा है। बनारस भी सरकारी दस्तावेजों के हिसाब से स्मार्ट शहर बन गया है। इतना ही नहीं यह शहर कई शिक्षा, चिकित्सा और धार्मिक सुधार आदि का केंद्र भी है।

वर्तमान समय में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी से सांसद भी हैं। लेकिन, इसी बनारस में आज भी आदिम जमाने की रूढ़ि और जाति-व्यवस्था ने इस कदर जहर घोला हुआ है कि सुधार व बदलाव का सकारात्मक ठोस असर नहीं दिख रहा है।

कितने दशक गुजर गए, लेकिन बनारस में जाति व्यवस्था, गैर-बराबरी, अमीरी-गरीबी, वैमनस्य और भेदभाव (किसी का, किसी भी जाति के लिए ) की बेड़ियां टूटने का नाम ही नहीं ले रहीं। हिन्दू धर्म ग्रंथ के पन्ने डोम समाज के महत्त्व और पुनीत कर्म को लेकर अटे-पड़े हैं। इन ग्रंथों की मान्यता है। काशी में शिव और शव के बीच की कड़ी है डोम राजा।

हवा में धूल और राख

17 फरवरी, शुक्रवार को दिन में घाट किनारे कुछ ज्यादा ही गर्मी का एहसास हो रहा था। कुछ ही दूरी पर मणिकर्णिका घाट है, जहां 20 से अधिक चिताएं जल रही थीं, और तकरीबन 40 से अधिक शवों को जलाने के लिए लोग प्रतीक्षा में धुंए और आंच में खड़े थे। चिताओं के जलने से आसपास के वातावरण में धुंआ और राख के कण हवा तैर रहे हैं।

डोम मुहल्ला मीरघाट,वाराणसी

इस राख के कण मणिकर्णिका घाट से प्रतिपल गुजरने वाले सैकड़ों की तादात में सैलानियों व श्रद्धालुओं के सिर, बदन, कपड़ों और सामान पर आकर स्थिर होते हैं। मणिकर्णिका घाट के सामने गंगा का पानी काला और कीचड़मय है। कुछ सफाईकर्मी घाट को साफ़ करने में जुटे हुए थे।

यहां शव जलाने का काम करने वाले डोम समाज के 23 वर्षीय कमलेश मिले। जो लकड़ी लेकर शव को जलाने में जुटे हुए थे। कमलेश सर्दी के मौसम भी पसीने से तर-बतर थे और लगातार आंच के पास खड़े रहने से चेहरा और बदन काला हो गया था।

दिनभर में जलाता हूं पांच शव

कमलेश बताते है कि “मीरघाट पर 25 से 30 डोम परिवार रहते हैं। वाराणसी जनपद में तकरीबन पांच हजार से अधिक डोम समाज की आबादी है। मणिकर्णिका घाट पर एक शव को तीन घंटे की मेहनत कर जलाने पर ढाई सौ रुपए मिलते हैं। दिनभर में पांच या छह चिताओं को जलाता हूं।

इस दौरान धुंआ और आग की तपिश से बदन झुलस जाता है। सर्दी में कुछ राहत रहती है, लेकिन गर्मियों के दिन में हालत पस्त हो जाती है। कम पैसे मिलने की वजह से चाहकर भी डोम समाज तरक्की नहीं कर पा रहा है। यह काम ही ऐसा है कि कुछ लोग कभी-कभार नशे का भी सहारा लेते हैं। लोग शिफ्टों में काम करते हैं”। कमलेश अभी इतना ही बता पाए थे कि चिता को जल्दी-जल्दी जलाने के लिए एक व्यक्ति ने उन्हें बुला लिया।

अपने घर पर खड़े सुमित चौधरी

तुम लोग डोम हो अलग बैठो पीछे जाओ

गोदौलिया चौक स्थित ‘रामप्यारी शिक्षा सेवा सदन’ विद्यालय में 15 वर्षीय सुमित चौधरी कक्षा छह के छात्र हैं। इस स्कूल में डोम समाज के सुमित समेत तीन छात्र पढ़ते हैं। सुमित ‘जनचौक’ से कहते हैं कि “हम लोगों के घर में आज भी चिता की बची हुई अधजली लकड़ी पर खाना बनता है, पानी गर्म होता है और चाय आदि बनता है। घर में रसोई गैस सिलिंडर भी है, लेकिन रुपए नहीं होने के चलते लकड़ी पर ही खाना बनाता है।

स्कूल में भी भेदभाव होता है। ब्राह्मण समाज का एक शिक्षक हम लोगों को पढ़ाता है। जब हम लोग कक्षा में आगे बैठते हैं, तो यह शिक्षक कहता है कि तुम लोग डोम हो अलग बैठो, पीछे जाओ”।

बदले नजरिया तो बने बात

दिवंगत डोमराजा पद्मश्री जगदीश चौधरी के परिवारजनों में से एक उमेश की स्नातक की पढ़ाई मैदागिन स्थित हरिश्चंद्र पीजी कॉलेज से हुई है। वह कहते हैं “पहले हम लोगों को लोग अछूत मानते थे।

जब से डोम समाज के जगदीश जी को पद्मश्री मिला है तब से समाज में थोड़ा मान-सम्मान बढ़ा है और हमारे समाज के प्रति लोगों का नजरिया कुछ बदलने लगा है”।

डोमराजा के परिवार के एक सदस्य उमेश

कुछ लोग नगर निगम में चतुर्थ श्रेणी में नौकरी करते हैं। डोम समाज के लोग लाश जलाने के अलावा व्यापारियों की दुकानों पर काम करते हैं। वाराणसी में डोम समाज की तीन शख्सियतों का नाम बड़ा है।

जिनमें पहले पद्मश्री जगदीश चौधरी,  दूसरे भारतीय सेना के जवान रहे चंदू और सेन्ट्रल जेल के जेलर रहे राम आधार चौधरी शामिल हैं। डोम समाज ने पहले से कुछ विकास किया है। लड़कों के साथ लड़कियां भी पढ़ाई-लिखाई कर रही हैं।

सुबह-सुबह डोम का मुंह देखना पड़ता है

उमेश ने इस संवाददाता से बताया कि ‘वाराणसी से सटे चंदौली के चकिया में कुछ वर्ष पहले मुझे आधा बिस्वा जमीन खरीदनी थी। इसकी जानकारी होने पर आसपास के ब्राह्मण और अन्य जाति के लोगों ने मेरे खिलाफ मोर्चा खोल दिया और इस जमीन के खरीदने का विरोध करने लगे।

उनका कहना था कि एक डोम कैसे हम लोगों की कॉलोनी में रह सकता है? जाति का डोम होने भर से यह भेदभाव सहना पड़ा। जातिवादियों के कड़े विरोध को सहते हुए पहले अपने मित्र के नाम पर जमीन को करवाया। फिर मित्र ने जमीन को मेरे नाम पर किया।

श्मशान से लायी लकड़ियों से घर पर बनता है खाना

इसमें मेरा तकरीबन एक लाख रुपए अतिरिक्त खर्च हुआ। आज भी मोहल्ले के सामान्य वर्ग की महिलाएं आते-जाते कहती हैं कि सुबह-सुबह डोम का मुंह देखना पड़ता है’।

जहां हम पहले खड़े थे, आज भी वहीं हैं

स्वच्छकार समाज बौद्धिक संस्थान वाराणसी के प्रवक्ता व सामाजिक कार्यकर्ता रामचंद्र त्यागी कहते हैं कि “बीजेपी ने जिस चुनावी नारे के साथ मोदी जी को चुनाव में उतारा और बंपर जीत हासिल की। इसमें डोम समाज भी ‘सबका साथ और सबका विकास’ के नारे से जुड़कर आशान्वित था कि अब उनके दुःख के दिन जल्द ही बीतने वाले हैं।

हमने सोचा समाज में जात-पात और भेदभाव की खाई पटेगी तो हम लोगों का समाज भी मुख्यधारा में शामिल हो जायेगा। समय तो बीत गया लेकिन आज भी डोम समाज जहां का तहां पड़ा है। मोदी सरकार ने तकरीबन 12 हजार करोड़ रुपए देश में स्वच्छता के नाम पर विज्ञापन में खर्च कर दिया। इससे क्या हासिल हुआ?

यदि सरकार चाहती तो स्वच्छकार समाज यानी डोम, वनवासी, खटीक और नट अन्य हाशिए के समाज के शिक्षा और मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए योजना आदि जारी कर सकती थी। बनारस शहर, गांव और अन्य स्थानों पर हम लोगों यानी बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों के साथ जातिगत भेदभाव आज भी जारी है।

डोम समाज के लिए रोजगार और शिक्षा के लिए केंद्र और राज्य सरकार ने बहुत ही कम काम किया है। हमारे समाज के लोग अब भी अन्य समाज की तरह दूसरे पेशे या रोजगार को नहीं अपना पा रहे हैं। शिक्षा और जागरूकता के अभाव में बहुत से युवा बेरोजगार हैं।” क्या किया जाए?

(वाराणसी से पत्रकार पवन कुमार मौर्य की ग्राउंड रिपोर्ट। )

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