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हरियाणाः 44 बंधुआ मजदूरों को कराया गया मुक्त, बच्चों तक से कराया जाता था 14 घंटे काम

बंधुआ मुक्ति मोर्चा के समन्वयक निर्मल गोराना की एक जनहित याचिका (सिविल नंबर 18257/2020, संतराम लहरे बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा और अन्य) पर दो नवंबर को सुनवाई करते हुए पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने 44 बंधुआ मजदूरों को ‘मुक्ति प्रमाण पत्र’ जारी करने का आदेश दिया है।

10 फरवरी 2020 के दिन दो मजदूरों ने ईंट भट्ठे से भागकर ‘बंधुआ मुक्ति मोर्चा’ के महासचिव निर्मल गोरोना से संपर्क किया। निर्मल गोरोना मजदूरों, प्रवासी श्रमिकों, बाल श्रमिकों के अधिकारों और हितों के लिए लंबे अरसे से काम करते आ रहे हैं। इसके बाद बंधुआ मुक्ति मार्चा की ओर से 12 फरवरी, 2020 को सब डिवीजनल मजिस्ट्रेट हथीन तहसील, पलवल हरियाणा को 44 बंधुआ मजदूरों को छुड़ाने के लिए एक ई-मेल भेजा गया। तदनुसार SDM द्वारा एक टीम का गठन किया गया और बंधुआ मुक्ति मोर्चा की एक टीम ने साथ मिलकर सभी 44 बंधुआ मजदूरों को 13 फरवरी 2020 को मुक्त करा लिया। यह सभी भट्ठा मालिक के यहां बंधुआ बनाकर रखे गए थे।

इसके बाद कई पत्र इन 44 बंधुआ मजदूरों की ‘मुक्ति प्रमाण पत्र’ और ‘अंतरिम राहत’ के संदर्भ में डिप्टी कमिश्नर और सब डिवीजनल मजिस्ट्रेट को भेजा गया, लेकिन उनकी तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। 30 अक्तूबर 2020 को एक जनहित याचिका सिविल नंबर 18257/2020, संतराम लहरे बनाम स्टेट ऑफ हरियाणा और अन्य, चंडीगढ़ स्थित पंजाब और हरियाणा के हाई कोर्ट के सामने एडवोकेट ओसबर्ट खालिंग और जोसी द्वारा फाइल की गई। मामला 2 नवंबर, 2020 को कोर्ट द्वारा सूचीबद्ध किया गया और सुना गया था। इसके साथ ही नोटिस जारी किया गया। उत्तरदाता ने हाईकोर्ट को आश्वासन दिया कि सभी 44 बंधुआ मजदूरों को 24 घंटे के भीतर ‘मुक्ति प्रमाण पत्र’ जारी करने की कोशिश की जाएगी।

गरीबों को ‘बंधुआ मजदूर’ बनाने की कहानी
जांगिड़ चंपा, छत्तीसगढ़ निवासी 13 परिवारों के 44 मजदूरों को, जिनमें स्त्रियां, गर्भवती और बच्चे थे, को प्रति एक हजार ईंटों की पथाई पर 550 रुपये कमाने का लालच देकर तमाम ईंट भट्टों पर ले जाया गया और ईंट भट्ठों पर बंधुआ मजदूर बनाकर शोषण किया गया। इस दर्मियान उन्हें लगातार एक जगह से दूसरे जगह ले जाया जाता रहा।

रेस्क्यू किए जाने से पहले पांच विभिन्न स्थानों पर उन्हें बंधुआ मजदूर बनाकर रखा गया। इस अमानवीय प्रक्रिया की शुरुआत मई 2018 से हुई, जब तस्करों द्वारा इन 44 लोगों को पीके 2 भट्टा, चतरा गोवा खजुराह, श्रीनगर, जम्मू-कश्मीर ले जाया गया और जुलाई 2018 तक पूरे दो महीने उन्हें लगातार 14 घंटे काम करने के लिए मजबूर किया गया, जबकि इस दौरान तमाम बुनियादी सुविधाएं जैसे कि सैनिटाइज, उचित भोजन, पानी और चिकित्सा आदि नहीं प्रदान की गई। इस दौरान भट्टा मालिक द्वारा इन 44 बंधुआ मजदूरों की गतिविधियों पर सख्त प्रतिबंध लगाकर और सख़्त निगरानी में रखा गया।

अगस्त 2018 के महीने में इन 44 लोगों को चतरा गोवा खजुराह, श्रीनगर, जम्मू कश्मीर से भट्टा (एमबीसी) बल्लभगढ़ तहसील, फरीदाबाद, हरियाणा में तस्करी करके लाया गया, जहां उन्हें अप्रैल 2019 तक काम कराया गया। फिर वहां से मई 2019 में उन्हें PBC भट्टा, गांव बांगर डांगर, उधमपुर, जम्मू कश्मीर लाया गया और जुलाई 2019 तक बंधुआ बनाकर काम कराया गया।  अगस्त 2019 में इन 44 बंधुआ मजदूरों को फिर से वापिस भट्टा, चतर गोआ खजुराह, पंथा चौक, श्रीनगर, तस्करी करके लाया गया और तीन महीने तक काम करने के लिए मजबूर किया गया।

फिर इन बंधुआ मजदूरों को नवंबर 2019 में राम भट्टा (FBK) हथीन तहसील, पलवल, हरियाणा में तस्करी करके ले आया गया। बंधुआ मजदूर के साथ जिस अमानवीय तरीके से व्यवहार किया गया, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता है। गर्भवती महिलाओं और तीन वर्ष से कम उम्र के बच्चों को काम करने के लिए मजबूर किया जाता था। तस्करी उत्पीड़न और यातना के दंश झेलते इन मजदूरों को बिना मेहनताना और अन्य बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति किए 14 घंटे काम कराया गया। उनकी जिंदगी तस्कर के रहम-ओ-करम पर थी जो अक्सर उनके संग गाली-गलौच, शारीरिक यातनाएं (मारपीट) देता था। क्रूरता का आलम ये था कि वे महिलाओं, गर्भवती महिलाओं और बच्चों को भी नहीं बख्शते थे।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on November 5, 2020 9:10 pm

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