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हाथरस: प्रशासन ने बनाया पीड़िता के परिजनों को बंधक, डीएम ने मारी ताऊ की छाती पर लात

सवर्ण वर्चस्वशाली प्रशासन समाजिक, आर्थिक, राजनीतिक रूप से सबल सवर्ण समुदाय के पक्ष में खड़ा होकर किस तरह पीड़ित पक्ष को प्रताड़ित करता है, इसकी बानगी है हाथरस का पीड़ित परिवार। हाथरस के जिलाधिकारी प्रवीण कुमार पीड़ित परिवार को धमका कर अपनी और सरकार की सुविधा वाला बयान चाहते हैं। खाकी वर्दी का आतंक इतना है कि दलित पिछड़े समुदाय की वैसे ही घिग्घी बंध जाती है उनके सामने। ऐसे में जिलाधिकारी प्रवीण कुमार का सीधे-साधे मजदूर पीड़ित पिता को धमकाकर कहना कि ‘कोरोना से मर जाती तो एक पैसा न मिलता’। या फिर ये कहना कि ‘आधी मीडिया चली गई है, आधी कल सुबह तक चली जाएगी। रहेंगे हम ही तुम्हारे साथ’ के क्या मायने हैं।

दरअसल जिलाधिकारी सवर्ण मानसिकता और सवर्ण हितों के मुताबिक काम कर रहे हैं। ये सवर्ण मानसिकता ही है जो हर एक बात का, तथ्य, व्यक्ति, जिंदगी की कीमत लगाती है। जाहिर है जिलाधिकारी मुआवजे के सरकारी पैसे से पीड़ित परिवार को उसकी बेटी की कीमत दे रहे हैं। उनके बयान का अभिप्राय देखिए कि कोरोना से मरती तो कुछ न मिलता ऐसे मर गए तो 10 लाख मिल रहे हैं, चुपचाप ले लो और बयान मत बदलो।

वायरल वीडियो में जिलाधिकारी प्रवीण कुमार लक्षकार पीड़िता के पिता से कथित तौर कह रहे हैं, “क्या वह बयान पर कायम रहना चाहते हैं, या उसे बदलना चाहते हैं, इस बारे में एक बार फिर से सोंचे। आप अपनी विश्वसनीयता खत्म मत करिए। मीडिया वाले (के बारे में), मैं आपको बता दूं कि आज अभी आधे चले गए, कल सुबह तक आधे और निकल जाएंगे और… हम ही बस खड़े हैं आपके साथ में, ठीक है। अब आपकी इच्छा है, नहीं बदलना है…।”

पीड़ित के पिता को धमकाने वाला जिलाधिकारी का वीडियो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है। इस वीडियो को प्रियंका गांधी वाड्रा ने भी ट्वीट किया है और लिखा है, “यूपी सरकार किसी को पीड़िता के गांव जाने से क्यों रोक रही है उसका जवाब यहां है।”

धारा 144 लगाकर लोगों को दूर किया जा रहा
पीड़ितों को भयभीत किया जा रहा है। वहीं धारा 144 लगाकार पत्रकारों और विपक्षी नेताओं को पीड़ित से दूर रखा जा रहा है, जबकि यूपी में दहशत का दूसरा नाम खाकी वर्दी दिन रात पीड़ित के सिर पर सवार हैं। सवर्ण जिलाधिकारी प्रवीण कुमार पहले पीड़िता को ‘दस लाख’ के मुआवजे का डंका बजाते हैं मीडिया में। ऐसा करना वो तब भी जारी रखते हैं जब पीड़िता की मौत हो जाती है।

बेशक पीड़िता की जीभ न भी काटी गई हो, लेकिन जिस तरह एक ओर पीड़िता की मौत की ख़बर आती है और दूसरी ओर हाथरस के जिलाधिकारी पीड़िता की ‘जीभ न काटे जाने’ का बयान प्रेस कान्फ्रेंस करके जारी करते हैं वो अजीब लगता है। जाहिर है ऐसा उन्होंने जनाक्रोश को डायल्यूट करने के लिए किया और पूरी प्रेस कान्फ्रेंस में 10 लाख के मुआवजे पर ज़्यादा ज़ोर दिया।

डीएम प्रेशर डाल रहे हैं
मरहूम पीड़िता की भाभी का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है, जिसमें वो जिलाधिकारी हाथरस द्वारा पीड़ित परिवार को धमकाने का आरोप लगाती हैं। वीडियो में वो कह रही हैं कि डीएम प्रवीण कुमार तरह-तरह की बातें करके समझाने के अंदाज में धमका रहे हैं। कह रहे हैं, “जो मिल रहा है उसे ले लो। लड़की अगर कोरोना से मर जाती तो क्या मिलता।”

वीडियो में महिला आगे कह रही हैं, “उन लोगों ने मम्मी के उल्टे-सीधे वीडियो बना रखे हैं, उस टाइम हालात ऐसे थे कि जिसके जो मुंह में आ रहा था वो हम लोग बोले जा रहे थे… अब ये लोग (प्रशासन) हमें यहां रहने नहीं देंगे। ये डीएम ज्यादा ही चालबाजी कर रहे हैं, प्रेशर डाल रहे हैं जबरदस्ती… कह रहें कि तुम लोगों की बातों का भरोसा नहीं है, जबरदस्ती बयान बदल रहे। पापा को बुलवा रहे, कह रहे हैं कि बयान बदलने से तुम्हारी विश्वसनीयता खत्म हो जाएगी, हम लोग दूसरी जगह चले जाएंगे।”

पिता का दावा थाने ले जाकर जबर्दस्ती कागजों पर हस्ताक्षर करवाए
पीड़िता के पिता का कहना है कि पुलिस थाने जाने के लिए उन पर दबाव डाला गया, जहां जिलाधिकारी और पुलिस अधिकारियों ने उनके परिवार के तीन सदस्यों से कुछ कागजात पर हस्ताक्षर कराए। गौरतलब है कि बुधवार को परिवार ने यह आरोप भी लगाया था कि पीड़िता के शव का प्रशासन ने रातों-रात जबरन अंतिम संस्कार कर दिया। तो क्या जिलाधिकारी पीड़ित परिवार से जबर्दस्ती साइन करवाए गए बयान पर बने रहने के लिए परिजनों को धमका रहे हैं?

क्या देश में किसी पीड़िता का बयान उसकी मर्जी से लिखा जाता है या पुलिस प्रशासन अपनी और सरकार की सुविधा से उसमें जोड़-घटाव कर लेती है। 6 सितंबर को रविवार को ग्रेटर नोएडा के बादलपुर में कैब ड्राईवर आफ़ताब की हत्या कर दी गई थी। आफ़ताब का आखिरी फोन कॉल रिकॉर्ड करके परिजन उनकी सांप्रदायिक हत्या की एफआईआर दर्ज करवाने पर डटे रहे, लेकिन यूपी पुलिस ने उनकी एक न सुनी और हत्या और लूटपाट का केस ही दर्ज किया था। जाहिर है हाथरस केस में भी पुलिस ने अपनी और सरकार की सुविधा के मुताबिक ही केस दर्ज किया था। और अब किसी न किसी तरह पीड़ित परिवार को डरा धमका कर अपनी सुविधा वाले केस पर ही बने पीड़ित परिवार का बयान चाहते हैं।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने लिया स्वतः संज्ञान
इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने स्वतः संज्ञान लेते हुए अपर मुख्य सचिव गृह, पुलिस महानिदेशक, अपर पुलिस महानिदेशक कानून व्यवस्था, जिलाधिकारी हाथरस और पुलिस अधीक्षक हाथरस को 12 अक्टूबर को तलब कर लिया है। न्यायालय ने इन अधिकारियों को मामले से संबंधित दस्तावेज इत्यादि लेकर उपस्थित होने का आदेश दिया है। साथ ही विवेचना की प्रगति भी बताने को कहा है।

हाई कोर्ट ने मृतक लड़की के मां-पिता और भाई को भी 12 अक्टूबर को आने को कहा है। हाथरस के जनपद न्यायाधीश को उनकी उपस्थिति सुनिश्चित करने का आदेश दिया है। साथ ही हाईकोर्ट ने जिला और राज्य सरकार के अधिकारियों को उनके आने-जाने, खाने, ठहरने और सुरक्षा का आदेश दिया है। हाई कोर्ट ने अधिकारियों को यह चेतावनी भी दी है कि मृतका के परिवार पर कोई दबाव न बनाया जाए। ये आदेश न्यायमूर्ति राजन रॉय और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने दिया है।

हाई कोर्ट ने हाथरस में युवती के साथ हुए सामूहिक दुराचार और उसकी मृत्यु के पश्चात जबरन अंतिम संस्कार किए जाने की मीडिया रिपोर्टों पर स्वतः संज्ञान लिया है। न्यायालय ने ‘गरिमापूर्ण ढंग से अंतिम संस्कार के अधिकार’ टाइटिल से स्वतः संज्ञान याचिका को दर्ज करने का भी आदेश दिया है।

हाई कोर्ट ने कहा कि एक तरफ एसपी हाथरस कहते हैं कि हमने डेड बॉडी परिवार के हवाले कर दी थी और प्रशासन ने अंतिम संस्कार में मात्र सहयोग किया था। वहीं मृतका के पिता और भाई का मीडिया में बयान है कि इस संबंध में प्रशासन से कोई बात नहीं हुई थी। पुलिस ने बल प्रयोग करते हुए यह कृत्य किया है। न्यायालय ने अंतिम संस्कार के संबंध में मीडिया में चल रहे पुलिस की कथित मनमानी के वीडियो का भी हवाला दिया। न्यायालय ने कहा कि मीडिया रिपोर्टों के अनुसार रातों-रात हुए इस अंतिम संकार के दौरान डीम प्रवीण कुमार, एसपी विक्रांत वीर, एएसपी प्रकाश कुमार, सादाबाद सीओ भ्राम सिंह, रम्शाबाद सीओ सिटी सुरेंद्र राव, सीओ सिकन्दर राव और संयुक्त मजिस्ट्रेट प्रेम प्रकाश मीणा 200 पीएसी जवानों और 11 थानों की पुलिस फोर्स के साथ उपस्थित थे।

हाई कोर्ट ने जबर्दस्ती पीड़िता की लाश जलाने को मौलिक अधिकारों का हनन कहा
हाई कोर्ट ने आगे कहा कि यह राज्य के आला अधिकारियों द्वारा मनमानी करते हुए मानवीय और मौलिक अधिकारों के घोर हनन का मामला है। इस मामले में न सिर्फ मृत पीड़िता के बल्कि उसके परिवार के भी मानवीय और मौलिक अधिकारों का उल्लंघन किया गया है। उन्होंने कहा कि पीड़िता के साथ अपराधियों ने बर्बरता की और यदि आरोप सही हैं तो उसके बाद उसके परिवार के जख्मों पर नमक रगड़ा गया है।

हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि वह इस मामले का परीक्षण करेगा कि क्या मृत पीड़िता और उसके परिवार के मौलिक अधिकारों का हनन हुआ है और क्या अधिकारियों ने मनमानी करते हुए उक्त अधिकारों का हनन किया है। यदि यह सही है तो न सिर्फ जिम्मेदारी तय करनी पड़ेगी बल्कि भविष्य के दिशा निर्देश के लिए कठोर कार्रवाई की जाएगी। न्यायालय ने यह भी कहा कि हम यह भी देखेंगे कि क्या पीड़िता के परिवार की गरीबी और सामाजिक स्थिति का फायदा उठाते हुए राज्य सरकार के अधिकारियों ने उन्हें संवैधानिक अधिकारों से वंचित किया। न्यायालय ने कहा कि यह कोर्ट पीड़िता के साथ हुए अपराध की विवेचना की भी निगरानी कर सकता है और जरूरत पड़ने पर स्वतंत्र एजेंसी से जांच का आदेश भी दे सकता है।

आदेश देते हुए हाई कोर्ट ने महात्मा गांधी के कोट को उद्धृत करते हुए कहा, कल माहात्मा गांधी की जयंती है जिनका दिल कमजोरों के लिए धड़कता था। वे कहते थे कि जो सबसे गरीब और कमजोर आदमी तुमने देखा हो उसकी शक्ल याद करो और अपने दिल से पूछो कि जो कदम उठाने का तुम विचार कर रहे हो वह उस आदमी के लिए कितना उपयोगी होगा। क्या उससे उसे कुछ लाभ पहुंचेगा।

(जनचौक के विशेष संवाददाता सुशील मानव की रिपोर्ट।)

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This post was last modified on October 4, 2020 12:06 pm

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