Tuesday, March 5, 2024

बिलकिस बानो मामले में सुनवाई जुलाई तक टली, जस्टिस जोसेफ के सामने सुनवाई नहीं चाहते थे दोषी और सरकारी वकील

जस्टिस केएम जोसेफ ने बिलकिस बानो मामले में प्रक्रियागत आधार पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई में देरी होने पर नाराजगी व्यक्त की। प्रतिवादियों के वकीलों को संबोधित करते हुए जस्टिस जोसेफ ने कहा कि यह स्पष्ट है कि यहां क्या प्रयास किया जा रहा है। मैं 19 जून को सेवानिवृत्त हो जाऊंगा। चूंकि वह दिन छुट्टी के दौरान है, मेरा अंतिम कार्य दिवस शुक्रवार 19 मई है। यह स्पष्ट है कि आप नहीं चाहते कि यह पीठ मामले की सुनवाई करे। लेकिन, यह मेरे लिए उचित नहीं है। हमने यह बिल्कुल स्पष्ट कर दिया था कि मामले को निस्तारण के लिए सुना जाएगा। आप अदालत के अधिकारी हैं। आप उस भूमिका को मत भूलना। आप मुकदमा जीत सकते हैं, या हार सकते हैं। लेकिन, इस अदालत के प्रति अपने कर्तव्य को मत भूलिए।

जस्टिस केएम जोसेफ ने खुली अदालत में टिप्पणी की कि वह समझते हैं कि यह उनके सेवानिवृत्ति के समय का इंतजार करने का निरा प्रयास था। सुपीम कोर्ट के न्यायाधीश ने कहाकि हम समझते हैं कि वे नहीं चाहते कि यह पीठ मामले की सुनवाई करे।

दरअसल बिलकिस बानो के मामले में सुप्रीम कोर्ट में मंगलवार को अंतिम सुनवाई निर्धारित समय के अनुसार नहीं हो सकी। कुछ दोषियों के वकीलों ने नोटिस की तामील के संबंध में बानो के हलफनामे पर सवाल खड़ा किया। बिलकिस बानो ने 2002 के गुजरात दंगों के दौरान सामूहिक बलात्कार और हत्याओं के लिए उम्रकैद की सजा पाने वाले दोषियों की समय से पहले रिहाई की अनुमति देने के गुजरात सरकार के फैसले पर याचिका दाखिल की है।

जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस बीवी नागरत्ना की बेंच ने मामले को 2 मई, 23 दोपहर 2 बजे अंतिम सुनवाई के लिए पोस्ट किया था, लेकिन कोई प्रभावी सुनवाई नहीं हुई। कुछ दोषियों की ओर से पेश वकीलों ने बानो की ओर से दायर एक हलफनामे पर इस आधार पर डीम्ड सर्विस घोषित करने की मांग करते हुए आपत्ति जताई कि कुछ उत्तरदाताओं ने नोटिस लेने से इनकार कर दिया था। उन्होंने तर्क दिया कि बानो ने हलफनामे में उत्तरदाताओं द्वारा सर्विस स्वीकार करने से इनकार करने के बारे में झूठा दावा किया था, क्योंकि डाक रिकॉर्ड से पता चलता है कि सेवा पूरी नहीं की जा सकी थी, क्योंकि पार्टियां शहर से बाहर थीं।

यह दावा करते हुए कि बानो ने अदालत में धोखाधड़ी की है, दोषियों के वकील ने उनके खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग की। बानो की वकील एडवोकेट शोभा गुप्ता ने इन आरोपों का खंडन किया और कहा कि हलफनामा पोस्टल एंडॉर्समेंट के आधार पर दायर किया गया था। दोषियों के वकीलों को अपनी आपत्तियों को दर्ज करने के लिए जवाबी हलफनामा दायर करने का समय देने के लिए पीठ को सुनवाई स्थगित करनी पड़ी। बेंच को एक और कठिनाई का सामना करना पड़ा, क्योंकि सभी उत्तरदाताओं पर तामील पूर्ण नहीं थी। इसलिए, खंडपीठ ने सेवा से वंचित प्रतिवादियों पर सेवा पूरी करने का निर्देश दिया और इसे संबंधित पुलिस स्टेशन के माध्यम से तामील कराने की अनुमति दी।

चूंकि जस्टिस जोसेफ 16 जून को सेवानिवृत्त होने वाले हैं और 19 मई छुट्टियों से पहले उनका आखिरी कार्य दिवस है, उन्होंने इस मामले की सुनवाई के लिए छुट्टियों के दौरान बैठने की पेशकश की। हालांकि याचिकाकर्ता सुझाव से सहमत थे, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और प्रतिवादियों के वकील तैयार नहीं थे। अंतत: पीठ ने सुनवाई को जुलाई तक के लिए स्थगित करने और सेवा पूरी होने का पता लगाने के लिए मामले को 9 मई को सूचीबद्ध करने का फैसला किया। सुनवाई जुलाई में होगी।

दोषियों के वकीलों ने शुरुआत में ही यह आरोप लगाया गया था कि भले ही दो प्रतिवादी स्टेशन से बाहर थे, बानो द्वारा एक हलफनामा दायर किया गया था जिसमें यह संकेत दिया गया था कि उन्होंने नोटिस को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। बिलकिस बानो ने इस अदालत के साथ धोखाधड़ी की है। उन्होंने यह कहते हुए याचिकाकर्ताओं के वकील को अपनी दलीलें शुरू कर देने पर कड़ी आपत्ति जताई कि उन्हें अपनी प्रतिक्रिया दर्ज करने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया है।

आप आज अदालत में उपस्थित हैं। आप नोटिस लेंगे या नहीं? जस्टिस नागरत्ना से पूछा, यह देखते हुए कि संबंधित जनहित याचिकाओं में वकील उसी दोषी के लिए पेश हो रहे हैं। मैं नोटिस लूंगा, लेकिन मुझे अपना जवाब दाखिल करने के लिए समय की आवश्यकता होगी। अदालत को इस तथ्य को भी ध्यान में रखना चाहिए कि उसने अदालत को गुमराह करने की कोशिश की है। मैं दिखा सकता हूं कि यह पहली बार नहीं है कि याचिकाकर्ता ऐसा कर रही है। वकील ने जवाब दिया। उन्होंने यह भी जोर दिया कि आरोपी के खिलाफ दंड प्रक्रिया संहिता के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए।

पीड़िता की ओर से पेश एडवोकेट शोभा गुप्ता ने इस आरोप का कड़ा विरोध किया। उन्होंने कहा कि संबंधित जनहित याचिकाओं में दोषियों की ओर से पेश होने वाले अधिवक्ताओं को भी ई-मेल के माध्यम से नोटिस भेजा गया था। जस्टिस नागरत्ना से पूछा कि क्या उन्हें ईमेल के माध्यम से नोटिस देने की अनुमति ली गई थी? गुप्ता ने बताया कि अदालत ने इसके लिए अनुमति दी थी, लेकिन स्पष्ट किया था कि प्रतिवादियों के पास इलेक्ट्रॉनिक रूप से दिए गए नोटिस को स्वीकार करने का विवेक होगा। केवल दो वकीलों ने यह कहते हुए जवाब दिया कि उनके पास अपने मुवक्किलों से निर्देश नहीं थे। लेकिन, सभी ने संबंधित मामलों में जवाब दाखिल किए हैं।

जस्टिस जोसेफ ने बहस करने वाले वकील से पूछा कि आपने वकालतनामा कब दाखिल किया? उन्होंने जवाब दिया कि बिलकिस बानो की याचिका के संबंध में वकालतनामा दायर नहीं किया गया था। जस्टिस जोसेफ ने कहा कि आपको कैसे पता चला कि यह मामला आज दायर किया गया था? वकील ने जवाब दिया कि क्योंकि जुड़े मामले आज सूचीबद्ध हैं। जस्टिस जोसेफ ने पूछा कि आप आज अदालत में इस जागरूकता के साथ हैं कि संबंधित मामले आज सूचीबद्ध हैं। हालांकि, आप इस विशेष याचिका का नोटिस प्राप्त करने से इनकार करते हैं, यह सही है या नहीं? वकील ने जवाब दिया, हां। जस्टिस जोसेफ ने कहा कि ठीक है। हम आपको सुनेंगे। हम आपकी दलील को स्वीकार कर रहे हैं और आपको जवाब दाखिल करने के लिए समय मिलेगा।

एक वकील ने आपत्ति जताई कि लिफाफे पर सुप्रीम कोर्ट की मुहर नहीं थी और इसलिए नोटिस को स्वीकार नहीं करने के लिए पार्टी को दोष नहीं दिया जा सकता। हालांकि, जस्टिस नागरत्ना ने डाक रिकॉर्ड की जांच के बाद इस दावे को सच नहीं पाया। गलत बयान देने के लिए वकील की खिंचाई करते हुए, न्यायाधीश ने कहा, “बयान देने से पहले, आपको हमारा समय बर्बाद करने के बजाय रिकॉर्ड के खिलाफ उन्हें सत्यापित करने के लिए पर्याप्त जिम्मेदार होना चाहिए। प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है। वे सभी भेज दिए गए हैं।” ये सर्वोच्च न्यायालय के रिकॉर्ड हैं, और फिर भी, आपको यह कहने का साहस है कि कोई प्रक्रिया शुरू नहीं की गई है और कुछ भी नहीं किया गया है।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि नोटिस की तामील सुनिश्चित करने के लिए ही इस मामले को दो सप्ताह के बाद लिया जाएगा, और यह अवकाश के बाद ही इस पर सुनवाई जारी रखेगी।

गुप्ता, एडवोकेट वृंदा ग्रोवर, और सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह सहित याचिकाकर्ताओं के वकील ने भी न्याय को बाधित करने के लिए एक ज़बरदस्त तंत्र के रूप में वर्णित करने पर कड़ी आपत्ति जताई। जयसिंह ने सुझाव दिया कि याचिकाओं के बैच को गर्मी की छुट्टी के दौरान सुना जा सकता है, जो सोमवार, 22 मई से शुरू होगा। उन्होंने कहा कि आपका कार्यकाल जुलाई तक है। सुनवाई छुट्टियों के दौरान हो सकती है।

जस्टिस जोसेफ ने कहा कि हम छुट्टियों के दौरान बैठने के लिए तैयार हैं । हालांकि, इस सिफारिश को सॉलिसिटर-जनरल तुषार मेहता (केंद्र और गुजरात राज्य के लिए उपस्थित) और सीन‌ियर एडवोकेट ऋषि मल्होत्रा का साथ नहीं मिला, जो दोषियों में से एक की ओर से पेश हो रहे थे। सॉलिसिटर-जनरल ने तुरंत स्पष्ट किया कि ऐसा नहीं है कि हम केवल इस मामले के संबंध में ही उपलब्ध नहीं होंगे, लेकिन सभी मामलों के लिए। एक बार जब मैं एक के लिए अपवाद बना देता हूं, तो मैं जल्द ही सभी के लिए अपवाद बना दूंगा। जस्टिस जोसेफ ने स्वीकार किया कि हम उन्हें मजबूर नहीं कर सकते।

बिलकिस बानो केस में 11 दोषियों की रिहाई के खिलाफ दायर याचिका पर सुप्रीम कोर्ट में 2 मई को सुनवाई होनी थी। गुजरात सरकार को वो दस्तावेज पेश करने थे, जिनके आधार पर इस गंभीर मामले के दोषियों को रिहा कर दिया गया। 27 मार्च को हुई सुनवाई में कोर्ट ने गुजरात सरकार से दोषियों की रिहाई का फैसला करने से जुड़े दस्तावेज मांगे थे। इसके बाद इस मामले की सुनवाई 18 अप्रैल को हुई थी, लेकिन 18 अप्रैल को भी सरकार दस्तावेज कोर्ट में पेश नहीं कर पाई थी।

दरअसल मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि गुजरात सरकार के दस्तावेज में बिलकिस बानो के खिलाफ हुए संगीन अपराध के नेचर को छिपा लिया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, बिलकिस बानो की साढ़े तीन साल की बच्ची को पत्थर पर पटक-पटकर मौत के घाट उतारने, 1 दिन की एक बच्ची के कत्ल और गर्भवती बिलकिस बानो के सामूहिक बलात्कार जैसी डीटेल्स का जिक्र दस्तावेज में है ही नहीं। इस घटना में एक नाबालिग लड़की के साथ गैंगरेप भी हुआ था। दस्तावेज में कहा गया है कि फैसले कॉपी के अनुसार, गोधरा में कारसेवकों से भरी साबरमती एक्सप्रेस गाड़ी जलने के बाद सांप्रदायिक दंगे हुए। पीड़ित और उनका परिवार हिंसा से बचने के लिए रंधीकपुर गांव से दूसरी जगह जा रहे थे। उन पर हिंदू भीड़ ने केसरबाग के जंगल में हमला कर दिया। इस दौरान पीड़ित के साथ रेप हुआ और दूसरी मुसलमान औरतों की हत्या हो गई।

रिपोर्ट में जो खुलासा हुआ है, उसमें दूसरी सबसे अहम बात क्या है? दरअसल कानून के अनुसार, गुजरात सरकार को दोषियों की रिहाई के लिए 5 स्टेकहोल्डर्स से राय लेना जरूरी था। रिपोर्ट के मुताबिक, 5 में से 3 स्टेकहोल्डर्स ने इस संगीन अपराध के दोषियों की रिहाई की मंजूरी दी, लेकिन दो ने अपराध के नेचर को देखते हुए समय से पहले रिहा न करने की राय दी। पांच स्टेकहोल्डर्स में पहला सुपरिन्टेंडेंट ऑफ पुलिस, जहां की विक्टिम यानी बिलकिस है, दूसरा इन्वेस्टिगेटिंग एजेंसी यानी सीबीआई, तीसरा डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट, चौथा जिस कोर्ट ने सजा सुनाई और 5वां स्टेकहोल्डर वह जेल है, फिलहाल जिस जेल में दोषी बंद थे।

सुपरिन्टेंडेंट ऑफ पुलिस स्पेशल क्राइम ब्रांच और सीबीआई ने दोषियों की रिहाई न होने के पक्ष में राय दी थी। सीबीआई ने अपने जवाब में कहा था कि अपराध इतना गंभीर और कुत्सित है कि बिना किसी दया के हम इस मामले में अपनी ओपिनियन नेगेटिव देते हैं। सीबीआई ने कहा था कि अपराधी को समय से पहले रिहा नहीं किया जाना चाहिए। वहीं, मुंबई सेशन कोर्ट ने सरकार के नियमों का हवाला देते हुए कहा कि हत्या और गैंगरेप के संगीन अपराध की सजा काट रहे कैदियों को आजीवन कारावास मिला है। सरकार के नियमों के अनुसार, कैदी किसी भी हालत में रिहा नहीं किए जाने चाहिए।

बिलकिस बानो के इलाके के सुपरिन्टेंडेंट ऑफ पुलिस, डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट और जेल ने दोषियों की रिहाई के पक्ष में अपनी राय दी। गौर करने वाली बात यह है कि एक दोषी जिसका नाम राधेश्याम शाह है, उसकी रिहाई के लिए डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट ने भी सिफारिश नहीं की थी।

मुंबई सेशन कोर्ट ने कैदियों को सभी गवाहों-सबूतों को परखने के बाद सजा दी थी। सेशन कोर्ट की सजा को हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी बरकरार रखा था। यानी सेशन से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक इस अपराध में कम से कम उम्रकैद के पक्ष में थे। गुजरात पुलिस ने बिलकिस की एफआईआर को क्लोज कर दिया था। यहां तक कि क्लोजर रिपोर्ट भी सौंप दी थी। बिलकिस ने इस केस को महाराष्ट्र में ट्रांसफर करने के लिए कोर्ट में अर्जी दी और वह मंजूर भी हुई। इसी के बाद ये केस सीबीआई के पास आया।

सीबीआई ने छानबीन में बिलकिस के परिवारवालों की लाशें ढूंढ निकालीं, जिन्हें नमक डालकर गलाने और खत्म करने के लिए गाड़ दिया गया था। उनकी मेडिकल जांच हुई। सेशन कोर्ट ने CBI के सबूतों को आधार बनाया और सजा सुनाई। हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट ने भी यकीनन दस्तावेजों को जांचने के बाद इस सजा को बरकरार रखा।

बिलकिस के केस में गुजरात पुलिस पर न सिर्फ आरोप लगे, बल्कि उनकी क्लोजर रिपोर्ट के उलट सीबीआई को सबूत मिले। इस केस में उन दोनों संस्थाओं ने रिहाई के खिलाफ निगेटिव ओपिनियन दी, जो इस केस के हर तथ्य और सबूत को गहराई से जानते थे। बाकी तीनों संस्थाएं उसी राज्य की हैं, जिस राज्य की पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट सौंपी थी।

11 कैदियों को उम्रकैद और 6000 रुपए के जुर्माने की सजा सुनाई गई थी। यह रकम भले ही छोटी हो, लेकिन कैदी इसे नहीं चुकाता है, तो उसे इसके एवज में कुछ महीने या साल की सजा काटनी होती है। दस्तावेज में जुर्माना न देने का जिक्र है, लेकिन इसके एवज में उन्हें क्या सजा मिली ये नहीं है। साथ ही जेल में व्यवहार पर इससे क्या असर पड़ा, ये भी नहीं है।

(जेपी सिंह वरिष्ठ पत्रकार और कानूनी मामलों के जानकार हैं।)

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