Wed. Jan 29th, 2020

जनता तो जिंदा रह लेगी, सरकार का क्या होगा?

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प्रतीकात्मक ग्राफ।

GST कल से 18% की जगह 40% होने की संभावना है।
आप सोच रहे हो सरकार प्याज के दाम 150 रूपये से 40 रूपये किलो कर दे, तो हफ्ते में आप भी 2 किलो प्याज खरीद लें।
लेकिन वो तो अंदरखाने कुछ और ही गुल खिलाने में लगी है, इसलिये बहुत जरूरी है कि आपको कल सुबह से ही नागरिकता संशोधन विधेयक का मोर्फीन का डोज मिले।
कल संसद शुरू होगी, तो जो हिन्दू हैं, उनकी छाती दर्द से भर दी जायेगी पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान में एक के बाद एक हिन्दुओं के खिलाफ हो रही क्रूरताओं की दास्ताँ सुना-सुना के।
आप रो पड़ेंगे, और चीख चीख के कहेंगे यह बिल पास होना ही चाहिए.
लेकिन होगा क्या?

कुछ नहीं। उल्टा इन सभी देशों को लहकाया जा रहा है, और अधिक कट्टरपंथी बनने के लिए। पाकिस्तान में वैसे भी कट्टरपंथी लोग इमरान को हटाना चाहते हैं, अब उन्हें भारत से डोज मिलेगा।
उसी तरह शेख हसीना का हाल होगा। बड़ी मुशिकल से वहां पर अर्थव्यवस्था तेजी की ओर गई है, और लोग अपने भविष्य को संवारने की ओर कदम बढ़ा रहे हैं।
लेकिन भारत जिसे इस दक्षिण एशिया का सिरमौर कहा जाता था आज तक। और पड़ोसी देशों की लोकतान्त्रिक जनता अपने शासकों के लिए दुआ करती थीं, कि काश इनके भेजे में भारत वाली बात घुसा दे अल्लाह। आज वे शुक्र मनाएंगे।

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अब सरकार भी मजबूर है, करे तो क्या करे?
देश में इनकम टैक्स कोई जमा ही नहीं कर रहा। सब कह रहे हैं कि उनकी इनकम ही नहीं है, पेट की ऑटोप्सी करा लो, एक प्याज का छिलका तक नहीं मिलेगा।
अब ले दे के GST ही है। यानि जो भी उत्पादन होगा, उस पर टैक्स की दर डबल कर टैक्स वसूली होगी। तभी तो सांसद महोदय, तनख्वाह, टेलीफोन, हवाई यात्रा और बड़े नेता दुनिया में घूम-घूम कर मित्रों के लिए नए-नए समझौते कर सकेंगे, मन की बात होगी।
भूखे पेट हम और आप तो कुछ महीनों जिन्दा रह सकते हैं, लेकिन सरकार बेचारी तो मर ही न जायेगी।

वो बेचारी अभावों में एक पल भी जिन्दा नहीं रह सकती।
अब मुझे ही देख लें।
पिछले 4 महीने से बिना रोजगार के हूं, लेकिन जितना झेल रहा हूं, उतना ही अनुभव गहरा होता जा रहा है।
लेकिन सरकार बेचारी ऐसा नहीं कर पाएगी, वो गश खाकर गिर जाती है, उसके साथ वाले ही उसे पकड़ कर गिरा देते हैं, उसका गला घोंट देते हैं।
जबकि हमारे साथ उल्टा होता है। लोग सहानुभूति दिखाते हैं। सुझाव देते हैं। और दुआ करते हैं।

लेकिन GST में रेट डबल करने का मतलब हार्ड वर्क सरकार को न तब पता था, न अब पता है, और शायद जिन्दगी में कभी समझ में भी नहीं आए।  इस अप्रत्यक्ष टैक्स का कितना गहरा असर उस देश की अर्थव्यवस्था, गरीबी बढ़ाने पर पड़ता है, इसका अहसास होता तो ऐसा करने की वह सोचती भी नहीं। सोचिये अगर टैक्स दर बढ़ेगी, तो लागत बढ़ेगी। लागत बढ़ेगी मतलब हमारा माल देश में तो महंगा होगा ही, लेकिन सबसे पहले हम दुनिया के बाजार से दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल बाहर फेंक दिए जायेंगे। एक भी देश पलट कर नहीं देखेगा। पेट्रोल, डीजल और गैस पर सेल्स टैक्स और एक्लाइज की मार लगाकर वैसे ही मोदी सरकार ने इस देश के हर उत्पाद को पहले ही चीन और अन्य एशिया के देशों से महंगा कर रखा था, अब कोढ़ में खाज ऊपर से। दूसरा, इसका असर अम्बानी को कम और मुर्दे के लिए लकड़ी, और कफन खरीदने वाले पर अधिक पड़ता है।

अम्बानी जी कमाते हैं 5000 करोड़ रूपये महीने और एक भीख मांगने वाला कमाता है 100 रूपये रोज का। लेकिन दिन में टाटा का नमक दोनों ही खाते हैं। GST दोनों को एक सामान भुगतनी पड़ेगी। 3000 रूपये महीना कमाने वाले को जो पहले 500 रूपये के करीब GST भुगतनी पडती थी, अब उतना ही कमाने पर उसे 1000 रूपये देने होंगे।  इसलिये GST की दर में अगर इजाफ़ा होता है, तो यह सीधा-सीधा सरकार के उन मित्रों पर हमला है, जो उसके मित्र नहीं शत्रु होने चाहिए। और जिनके खिलाफ हमारी प्यारी सरकार काला धन निकालने, इनकम टैक्स के छापे मारने के दावे कर पहली बार सराकर में आई थी, उहें तो कॉर्पोरेट टैक्स में पहले ही 1.70 लाख करोड़ के गिफ्ट दे चुकी है। पूरी तरह से उनके चरणों में है।  

नोट: सभी किसान भाइयों और शहरी भाइयों से। paytm, बैंकिंग और रूपये वाले सिस्टम को छोड़कर आपको अगर अब भी जिन्दा रहने की कला सीखनी है तो इस समय में बार्टर सिस्टम की ओर लौट चलने का समय आ गया है। बाल बनवाने जायें अगर कोई सब्जी वाला तो पैसे के बदले 2 किलो टमाटर दे दें। उसी तरह दुकान पर आटा चावल के बदले, उसके मालिक के गदहिया गोल बच्चे को ट्यूशन पढ़ाने की पेशकश करें, बाकी किसान अपना माल सीधा शहर में लाने की व्यवस्था करें, गांव में दो तीन नौजवानों को सारा माल देकर।

इससे वे भी कुछ कमाएंगे और बेकार में गौ रक्षक, और गांव की बहू-बेटियों पर नजर रखने के गांव और शहर को जोड़ने, भाईचारे में बदलेंगे। ये सरकार तो सुधरने से रही, और विपक्ष खाट बिछाकर आम रस टपकने के इन्तजार से बाहर आने से रहा। क्या पता कोमा में न चला गया हो।

(रविंद्र सिंह पटवाल स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं और आजकल दिल्ली में रहते हैं।)

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