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मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह की हत्या से ईरान को कितना नुक़सान?

ईरान के बड़े परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह की इस 27 नवंबर को हत्या कर दी गई। उन्हें ईरान के प्रतिष्ठित रिवॉल्यूशनरी गार्ड में ब्रिगेडियर जनरल का ओहदा हासिल था और वह ईरान के ‘ग्रीन साल्ट प्रोग्राम’ के तहत रक्षा अनुसंधान और अविष्कार संगठन के प्रमुख थे। ज़ाहिर है उनकी हत्या से ईरान को बहुत नुक़सान हुआ है।

ईरान की धार्मिक राजधानी कुम में पैदा हुए मोहसिन ने परमाणु रेडिएशन और किरणों पर डॉक्टरेट किया था। माना जाता है कि वह ईरान के परमाणु कार्यक्रम के तहत संवर्धन के कार्य से जुड़े थे। उनकी हत्या उस वक्त हुई जब वह राजधानी तेहरान के बाहरी इलाके के एक गांव में बुलेट प्रूफ कार से अपनी पत्नी के साथ कहीं जा रहे थे। उनकी हत्या को लेकर भी कई विरोधाभासी ख़बरें आ रही हैं।

उनके तीन अंगरक्षक मारे गए और चार हमलावर भी। सरकारी समाचार एजेंसियों ने हमलावरों की ख़बरों के बजाय यह कहा कि उन पर रिमोट संचालित मशीनगन से गोलियां दाग़ी गईं। बाद में अस्पताल में उन्होंने आख़िरी सांस ली। यह समझने की बात है कि मोहसिन फ़ख़रीज़ादेह ईरान के कई शांतिपूर्ण वैज्ञानिक शोध से जुड़े हुए थे। कोरोना महामारी के समय वह पहली स्वदेशी कोविड-19 परीक्षण किट और वैक्सीन के विकास से जुड़े हुए थे।

उनकी हत्या पर ईरान के सुप्रीम लीडर अली ख़ामनेई ने कहा कि इस आतंकवादी हमले के साजिशकर्ताओं को बख़्शा नहीं जाएगा। भारत में ईरान के दूतावास की ओर से जारी एक प्रेस नोट में इस हमले के लिए इजराइल को जिम्मेदार ठहराया गया है।  पिछले कुछ वर्षों में, कई शीर्ष ईरानी वैज्ञानिकों और राष्ट्रीय नायकों को विभिन्न आतंकवादी हमलों में निशाना बनाया गया और उनकी हत्या की गई।

वरिष्ठ ईरानी परमाणु वैज्ञानिक की हालिया हत्या के लिए ईरान इजरायल को जिम्मेदार मानता आया है, क्योंकि ईरान की सेना और परमाणु कार्यक्रम को वह अपने लिए ख़तरा मानता है। जबकि खाड़ी में परमाणु हथियारों वाला एकमात्र देश इजराइल है। आपको बता दें कि जब डॉनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति चुने गए थे, तब से वाशिंगटन को परमाणु और 5+1 के बीच परमाणु समझौते को छोड़ने के लिए इजराइल ने ही दबाव बनाया था।

ईरान में घरेलू आतंकवाद में अब तक 17 हज़ार लोग मारे गए हैं। ईरान सरकार का आरोप है कि आतंकवादी संगठन ‘पीपुल्स मुजाहिदीन ऑफ ईरान’ उर्फ ‘एमकेओ’ देश में कई आतंकवादी हमलों के लिए ज़िम्मेदार रहा है। इस संगठन को ईरान के अलावा अमेरिका, कनाडा और जापान ने आतंकवादी संगठन घोषित किया था, लेकिन अमेरिका और कनाडा ने 2012 और जापान ने 2013 में यह घोषणा वापस ले ली। ईरान का कहना है कि एमकेओ की यूरोप में होने वाली बैठकों में अमेरिकी चेहरे देखे जाते हैं। 

एमकेओ को सद्दाम हुसैन का बहुत बड़ा समर्थन था और कहने की आवश्यकता नहीं कि इमाम खुमैनी के नेतृत्व में जब ईरान ने अमेरिकी पिट्ठू शाह पहलवी की सरकार उखाड़ फेंकी और सत्ता क़ायम की तो सद्दाम हुसैन ने अमेरिकी हुक्म से ईरान के साथ एक दशक तक सशस्त्र संघर्ष किया। इराक़ में पनाह लेने और सद्दाम का साथ देने की वजह से ही एमकेओ ने ईरान की जनता के बीच अपना विश्वास खो दिया है।

खुमैनी के सत्ता में आने के बाद ईरान में कई आतंकवादी हमलों के लिए एमकेओ को जिम्मेदार माना गया। इराक़ में सद्दाम की सरकार जाने के बाद एमकेओ को भी इराक़ छोड़कर अल्बानिया में पनाह लेनी पड़ी। वर्ष 2013 में इसका अंतिम कार्यालय भी कैंप अशरफ़, इराक़ में बंद हो गया। एमकेओ का मुख्यालय अल्बानिया के मनेज़ शहर में है। एमकेओ को इजराइल का भी समर्थन प्राप्त है।

अब तक ईरान के छह बड़े वैज्ञानिकों की हत्या हो चुकी है। वर्ष 2007 में अर्देशीर हुसैनपुर, 2010 में मसूद अलमुहम्मदी, माजिद शहरीयारी, 2011 में दरयूश रज़ाईनिज़ाद, 2012 में मुस्तफ़ा अहमदी रोशन और इस वर्ष 2020 में मोहसिन फ़ख़रिज़ादेह की हत्या कर दी गई। वर्ष 2010 में फ़रदून अब्बासी पर भी हमला हुआ था, लेकिन उनकी जान बचा ली गई। जब 2007 में अर्देशीर की हत्या की गई, इसके बाद अमेरिका की निजी खुफिया एजेंसी ‘स्टार्टफॉर’ ने कहा था कि वह इजराइली खुफिया एजेंसी मोसाद के निशाने पर थे। मसूद अलमुहम्मदी की हत्या मोटरसाइकिल पर बारूद में विस्फोट से की गई। हत्यारे माजिद जमाली फाशी को पकड़ लिया गया और उसने माना कि इजराइल के शहर तेल अबीब में उसने प्रशिक्षण लिया और मोसाद के कहने पर ही उसने ईरानी वैज्ञानिक मसूद की हत्या की है।

परमाणु वैज्ञानिक माजिद शहरीयारी की हत्या कार में विस्फोट से की गई। अमेरिकी पत्रिका ‘टाइम’ ने शक जताया कि यह इजराइली खुफिया एजेंसी मोसाद ने हत्या करवाई है। मात्र 35 साल के परमाणु भौतिकी वैज्ञानिक दरयूश को उस वक्त सीने में पांच गोलियां मारी गईं, जब वह स्कूल से अपनी बेटी को लेने गए थे।

मोसाद के उस वक्त के नए प्रमुख तामिर प्राडो ने उनकी हत्या करवाई। वैज्ञानिक मुस्तफ़ा अहमदी रोशन की कार से विस्फोटक बांध के उन्हें मार डाला गया। हत्यारे अराश केरहदकिश ने पूछताछ में बताया कि इजराइल के कहने पर यह हत्या उसने की। बताना महत्वपूर्ण है कि ईरानी रिवॉल्यूशनरी गार्ड के प्रमुख कासिम सुलेमानी की भी इराक़ में सीरिया सरहद के नज़दीक ड्रॉन से इसी वर्ष जनवरी में हत्या कर दी गई थी।

वर्ष 2015 में मक्का में क्रेन गिरने से 111 लोग मारे गए थे। इसमें ईरान और भारत के 11-11 हाजी मारे गए थे। महत्वपूर्ण है कि इन 11 में ईरान के अंतरिक्ष शोध संस्थान के प्रमुख डॉ. अहमद हातमी की भी मौत हो गई। आज भी कई ईरानी विद्वान मक्का क्रेन हादसे को हातमी की हत्या के लिए रचा गया सऊदी प्लान बताते हैं, जिसे इजराइल की मोसाद के कहने पर अंजाम दिया गया।

इतने झंझावत के बावजूद ईरान एक मज़बूत देश बनकर खड़ा है। कभी इजराइल की हिम्मत नहीं हुई कि जिस तरह वह इराक़, सीरिया, लेबनान, फिलस्तीन, मिस्र और सऊदी अरब में बिना इजाज़त घुस कर सैनिक कार्रवाई कर देता है, कभी ईरान में प्रविष्ठ हो पाए। इजराइल जानता है कि इस क्षेत्र की असली ताक़त ईरान के पास है। ईरान ने 1979 की ख़ुमैनी क्रांति के बाद से प्रतिबंध झेलने के बावजूद कभी समझौता नहीं किया। ईरान ने सैनिक, कृषि, शिक्षा, अनुसंधान और व्यापार में महत्वपूर्ण प्रगति की है।

कुल एक लाख 70 हज़ार सैनिकों और साढ़े चार लाख रिज़र्व फोर्स के लिए इजराइल साढ़े बीस अरब अमेरिकी डॉलर खर्च कर देता है, जबकि ईरान के पास सवा पांच लाख सैनिक हैं और साढ़े तीन लाख रिज़र्व फोर्स है। ईरान सालाना अपने रक्षा बजट पर साढ़े सत्रह अरब अमेरिकी डॉलर खर्च करता है। कम पैसे ख़र्च करने के बावजूद ईरान पूरे अरब जगत की सबसे बड़ी सेना का नेतृत्व करता है, जिससे सीधे टकराने की हिम्मत इजराइल की क्या, अमेरिका की भी नहीं है।

(लेखक कूटनीतिक मामलों के जानकार हैं)

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This post was last modified on December 3, 2020 3:33 pm

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