Monday, October 25, 2021

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इलाहाबाद हाईकोर्ट के स्टे के बावजूद बाराबंकी में 100 साल पुरानी मस्जिद ढहाई

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इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर ने बार एंड बेंच को दिए साक्षात्कार में कहा है कि उत्तर प्रदेश राज्य की नौकरशाही अदालतों द्वारा दिए गए निर्देशों को स्वीकार नहीं करती है। मुझे नहीं पता कि राज्य सरकार न्यायपालिका को प्रतिद्वंद्वी क्यों मानती है। न्यायपालिका राज्य का दूसरा चेहरा है। पूर्व मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर के इस कथन को एक बार फिर नौकरशाही ने सही सिद्ध कर दिया है।इलाहाबाद हाईकोर्ट के स्थगनादेश के बावजूद उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के राम सनेही घाट तहसील परिसर में स्थित मस्जिद को प्रशासन ने 17 मई की शाम को ढहा दिया है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 24 अप्रैल को सुनाए गए एक आदेश में कहा था कि हाईकोर्ट, जिला न्यायालय या सिविल न्यायालय द्वारा पहले से ही पास बेदखली या विध्वंस का कोई भी आदेश यदि इस आदेश के पारित होने की तारीख तक निष्पादित नहीं किया जाता है तो यह 31 मई, 2021 तक की अवधि के लिए स्थगित रहेगा।कार्यवाहक चीफ जस्टिस संजय यादव और जस्टिस प्रकाश पाडिया की पीठ ने एक जनहित याचिका के जवाब में आदेश पारित करते हुए कहा था कि यह आवश्यक है, क्योंकि सभी स्तरों पर अदालतें कम क्षमता के साथ काम कर रही हैं।

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी के रामसनेही घाट तहसील परिसर में स्थित मस्जिद को प्रशासन ने 17 मई की शाम को ढहा दिया है। रामसनेही घाट तहसील के आवासीय परिसर में स्थित मस्जिद और उससे सटे कमरों को तहसील प्रशासन ने 17 मई की शाम को ढहाकर उसका मलबा जगह-जगह फिकवा दिया था। प्रशासन ने ढहाए गए भवन और मस्जिद को ‘अवैध आवासीय परिसर’ करार देते हुए कहा कि संयुक्त मजिस्ट्रेट की अदालत के आदेश पर यह कार्रवाई की गई है। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड ने एक सदी पुरानी मस्जिद को ढहाए जाने पर नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए सरकार से इस वारदात के ज़िम्मेदार अफसरों को निलंबित कर मामले की न्यायिक जांच कराने और मस्जिद के पुनर्निर्माण की मांग की है।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के कार्यवाहक महासचिव मौलाना खालिद सैफुल्लाह रहमानी ने एक बयान जारी कर कहा है कि बोर्ड ने इस बात पर नाराजगी का इजहार किया है कि रामसनेही घाट तहसील में स्थित गरीब नवाज मस्जिद को प्रशासन ने बिना किसी कानूनी औचित्य के सोमवार रात पुलिस के कड़े पहरे के बीच शहीद कर दिया है।यह मस्जिद 100 साल पुरानी है और उत्तर प्रदेश सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड में इसे सूचीबद्ध भी किया गया है।इस मस्जिद के सिलसिले में किसी किस्म का कोई विवाद भी नहीं है। मार्च के महीने में रामसनेही घाट के उप-जिलाधिकारी ने मस्जिद कमेटी से मस्जिद के कागजात मांगे थे।

मौलाना सैफुल्लाह ने कहा है कि इस नोटिस के खिलाफ मस्जिद प्रबंधन कमेटी ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी और अदालत ने समिति को 18 मार्च से 15 दिन के अंदर जवाब दाखिल करने की मोहलत दी थी, जिसके बाद एक अप्रैल को जवाब दाखिल कर दिया गया, लेकिन इसके बावजूद बगैर किसी सूचना के एकतरफा तौर पर जिला प्रशासन ने मस्जिद शहीद करने का जालिमाना कदम उठाया है।

मौलाना सैफुल्लाह ने बयान में कहा है कि हमारी मांग है कि सरकार हाईकोर्ट के किसी सेवारत न्यायाधीश से इस वाकये की जांच कराए और जिन अफसरों ने यह गैरकानूनी हरकत की है उनको निलंबित किया जाए। साथ ही मस्जिद के मलबे को वहां से हटाने की कार्रवाई को रोककर और ज्यों की त्यों हालत बरकरार रखे। मस्जिद की जमीन पर कोई दूसरी तामीर करने की कोशिश न की जाए।यह हुकूमत का फर्ज है कि वह इस जगह पर मस्जिद तामीर कराकर मुसलमानों के हवाले करे।

जिलाधिकारी आदर्श सिंह ने मस्जिद और उसके परिसर में बने कमरों को ‘अवैध निर्माण’ करार देते हुए एक बयान में कहा कि इस मामले में संबंधित पक्षकारों को पिछली 15 मार्च को नोटिस भेजकर स्वामित्व के संबंध में सुनवाई का मौका दिया गया था, लेकिन परिसर में रह रहे लोग नोटिस मिलने के बाद फरार हो गए, जिसके बाद तहसील प्रशासन ने 18 मार्च को परिसर पर कब्जा हासिल कर लिया।

उन्होंने कहा कि इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने इस मामले में दायर की गई याचिका पर सुनवाई करते हुए गत दो अप्रैल को उसे निस्तारित कर दिया। इससे यह साबित हुआ कि वह निर्माण अवैध है। इस आधार पर रामसनेही घाट उप जिला मजिस्ट्रेट की अदालत में न्यायिक प्रक्रिया के तहत वाद दायर किया गया। इस प्रकरण में न्यायालय द्वारा पारित आदेश का 17 मई को अनुपालन करा दिया गया। रामसनेही घाट के उप जिलाधिकारी दिव्यांशु पटेल ने दावा किया कि तहसील परिसर में स्थित उस भवन को हाईकोर्ट के आदेश पर अपराध प्रक्रिया संहिता की धारा 133 के तहत ढहाया गया है।

हालांकि 18 मार्च की सुनवाई मस्जिद द्वारा दायर एक याचिका पर हुई थी, जिसमें कहा गया था कि नोटिस दिनांक 3जून2016 के निर्णय के पैरा 8(iii) में निहित निर्देशों का पालन सुनिश्चित किए बिना मस्जिद को ध्वस्त करने के इरादे से जारी किया गया था।

सरकार का प्रतिनिधित्व करने वाले वकील ने अदालत को सूचित किया था कि उप-संभागीय मजिस्ट्रेट के निर्देश पर मस्जिद की प्रबंध समिति के सदस्य मोहम्मद नसीम को नोटिस दिया गया था, जिसमें उन्हें मस्जिद पर दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करने की आवश्यकता थी और इसका इरादा विध्वंस का नहीं था।जस्टिस देवेंद्र कुमार उपाध्याय और मनीष कुमार की पीठ ने याचिका का निपटारा करते हुए कहा कि मस्जिद पर नोटिस केवल दस्तावेजी सबूत मांगने के उद्देश्य से दिया गया था, न कि विध्वंस के लिए।

यूपी सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने कहा है कि वह जल्द ही इस सप्ताह की शुरुआत में ढहाई गई एक मस्जिद की बहाली और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ उच्च स्तरीय न्यायिक जांच और कार्रवाई की मांग के संबंध में इलाहाबाद उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाएगा।

(वरिष्ठ पत्रकार जेपी सिंह की रिपोर्ट।)

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