ग्राउंड रिपोर्ट: योगी सरकार के कैंप में मिली दवा पिलाने से सैकड़ों भेड़ों की मौत, मुआवजे की मांग

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प्रयागराज। छोटी जोत वाले किसानों और कृषि मजदूरों के लिए पशुधन जीवन के हारे-गाढ़े वक्त में काम आता है। लेकिन एक दिन अचानक अपने ही हाथों पिलाई गई दवा उनके लिए काल बन जाये तो? दुःख दूना हो जाता है। एक हत्या का ग्लानिबोध और दूसरा आर्थिक नुकसान का दुख।

आटा गांव के राम सूरत पाल बताते हैं कि गांव-गांव मुनादी हुई थी। माइक लगाकर अनाउंस किया गया था कि 6 मार्च को सहसों ब्लॉक के चिरौरा बाग में कैंप लगेगा और मवेशियों के लिए मुफ्त दवा दी जाएगी। तो तमाम गांववालों की तरह वो भी उस दिन कैंप में चले गये। वहां से वो अपनी भेड़ों के लिए दवा लेकर वापस चले आये।

राम सूरत पाल की 32 भेड़ों की मौत

राम सूरत पाल के पास छोटी, बड़ी, मझोली, बच्चा, सयान सबको जोड़कर कुल 90 भेड़ें थीं। 7 मार्च को सुबह 8 बजे राम सूरत पाल ने अपनी सभी भेड़ों को दवा पिलाया। 11 बजते-बजते 20 भेड़े गिर पड़ी और अगले दिन यानि 8 मार्च (होली के दिन) तक उनकी कुल 32 भेड़ों की मौत हो गई।

राम सूरत पाल बताते हैं कि जब उनकी भेड़ें मरने लगीं तो उन्होंने प्राइवेट डॉक्टर बुलाया। चार हजार रुपये की सुई दवाई की। सारी भेड़ों को इंजेक्शन लगाये गये। तब जाकर जो भेड़ें जिन्दा थी वो बच पाईं।

राम सूरत पाल उस दिन को याद करके कहते हैं कि दवा पिलाने के बाद जैसे झोंक लग जाता है वैसे चक्कर सा आने लगा और सारी भेड़ें गिरती चली गईं। जब तक वो समझ पाते तब तक 12-14 भेड़ें खत्म हो गईं। डॉक्टर को फोन किया, वो जब तक आते तब तक 14 बच्चों समेत कुल 32 भेड़ें मर गईं। वो बताते हैं कि कैंप में सभी भेड़ों को 5 एमएल दवा पिलाने के लिए कहा गया था।

कैंप में मिली दवा जिसे पिलाने से भेडों की मौत हुई

राम सूरत पाल के भेड़ों का बीमा नहीं था। उनके पिता के नाम 18 बिस्वा खेत है। तीन भाइयों के हिस्से में 6-6 बिस्वा जमीन है। राम सूरत के तीन बेटे हैं। बड़ा बेटा 8 साल का, मझला बेटा 6 साल का और सबसे छोटा चार साल का है। राम सूरत और उनकी पत्नी कृषि मजदूरी भी करते हैं।

भेड़ से कैसे कमाई होती है पूछने पर राम सूरत पाल बताते हैं कि भेड़ का बाल बिकता है 4-7 रुपये किलो। इसके अलावा भेड़ों को उन लोगों से चिकवा खरीदकर ले जाते हैं, भेड़ की साइज के हिसाब से 3 से 5 हजार रुपये मिल जाता है। गोश्त के लिहाज से जैसे बकरा वैसे भेड़।

राम सूरत पाल बताते हैं कि भेड़ों को हर महीने एक या दो बार दवा पिलाना पड़ता है। मौसम के हिसाब से। कभी कैम्प लग गया तो दवा मुफ्त मिल जाती है। वर्ना खरीद कर पिलाना पड़ता है। रामसूरत बताते हैं कि गांव से कई लोग कैंप में गये थे। कई लोग दवा ले भी आये थे, लेकिन सबसे पहले उन्होंने दवा पिलाया था और उनकी भेड़ों की दशा देख बाक़ी लोगों ने दवा नहीं पिलाया।

भेड़ों के मरने के बाद कोई सरकारी अफ़सर आया था क्या? पूछने पर वो बताते हैं कि सरकारी अफ़सर आये थे और जो दवा बची थी, उसे वापस लेकर चले गये, बोले सैम्पल के तौर पर जांच के लिए लैब में भेजेंगे। 

भेड़ों की मौत के बाद से गमगीन हैं दूधनाथ पाल

गोधूलि का समय है। नौकरीपेशा, मजदूर, पंक्षी और मवेशी सब अपने-अपने बसेरों की ओर लौट रहे हैं। हम चिरौड़ा गांव के दूधनाथ पाल के घर पर उनका इंतज़ार कर रहे हैं। दूधनाथ बेटी से सुनते हैं कि पत्रकार आये हैं तो वो घर नहीं लौटते। भेड़ों को बाहर बाड़ में बांधकर वहां से नहर की ओर चले जाते हैं।

उनकी मां मूर्तिदेवी उदास हो जाती हैं। हमारे साथ वह बड़ी देर तक बेटे के लौटने की राह देखते बैठी रहीं कि उनके पीड़ित बेटे से भी हमारी मुलाकात हो जाये। लेकिन समझ सकते हैं कि वह अपनी पीड़ा को बार-बार बताकर उस दर्द से गुजरना नहीं चाहते।

दूधनाथ पाल की मां मूर्ति देवी

दूधनाथ तो नहीं लौटे पर उनके बड़े भाई नंदलाल अपनी भेड़ों के झुंड लिये लौटे। सारा दिन खेत-खेत मेड़-मेड़ भेड़ों के पीछे डह-डहाने के बाद थके मांदे सिर से लेकर पांव तक धूल-धूसरित। दुबले पतले (सींकिया) शरीर में नीली चेकदार लुंगी, मटमैला चीकट टीशर्ट और गले में गमछा और खिचड़ी दाढ़ी-बाल।

उनकी जीवन संगिनी दौड़कर पड़ोसी के कुंए से पानी भर लायीं। भेड़ों ने बारी-बारी से पानी पिया। लगे हाथ नंदलाल और उनकी संगिनी ने बच्चों को मां के थनों से लगा दिया। फिर दूध पीने के बाद बच्चों को बारी-बारी से पकड़कर खांचा के भीतर बंद कर दिया। और भेड़ों को बाड़े के भीतर हांक दिया।       

इन सबसे फारिग होकर नंदलाल हमसे मुखातिब हुए। वो बताते हैं कि तीन भाई हैं। सबसे बड़े नंदलाल और सबसे छोटे दूधनाथ ने भेड़ें पाली हैं जबकि मझले भाई संतलाल ने बकरियां पाल रखी हैं। तीनों भाइयों के हिस्से में 10 बिस्वा जमीन है। लेकिन अपना खुद का सिंचाई का साधन न होने के चलते केवल धान-गेहूं-सरसों बोते हैं। बाक़ी चीजें मोल लेकर खाते हैं।

नंदलाल बताते हैं कि 6 मार्च को तीनों भाई दूधनाथ, संतलाल और नंदलाल कैंप में दवा लेने गये थे। दूधनाथ को तो दवा मिल गई लेकिन संतलाल और नंदलाल का नंबर आते-आते दवा खत्म हो गई। तो उन लोगों को दवा पर्ची पर लिख दिया गया कि मेडिकल स्टोर से लेकर 5-5 एमएल पिला देना। नंदलाल बताते हैं कि उन लोगों की भेड़ बकरियों का बीमा नहीं है।

इससे पहले मां मूर्ति देवी हमसे बताती हैं कि दूधनाथ पाल के पास छोइया-पोइया लेकर कुल 42 भेड़ें थीं। 8 मार्च को होली थी। सुबह 8-9 बजे के बीच उन्होंने भेड़ों को दवा पिलाया था। दो घंटे बाद धूप लगते ही भेड़ें एक-एक करके लटपटाकर गिरने लगीं। तो उन लोगों ने उन्हें माठा पिलाया। फिर गुड़ घोलकर पिलाया। इलाके के प्राइवेट डॉक्टर चंद्रबली को फोन करके बुलाया। वो आये सुई-दवाई किये। लेकिन तब तक 3 बच्चों समेत 9 भेड़ें मर चुकी थीं।

मूर्ति देवी बताती हैं कि हादसे के बाद पूरे तीन दिन तक उनका बेटा न कुछ खाया न पिया। बस मुवाई मारे गमग़ीन बैठा रहा। उनका खुद का गला भर आया। आंखों में आंसू छलक आये। भर्राये गले से बोलीं कि उन्हें लगातार डर बना रहा कि बेटा कहीं कोई ग़लत कदम न उठा ले।

दूधनाथ बेहद गरीब हैं। भेड़ें और 10 बिस्वा खेत ही उसके परिवार के रोटी-रोजी का जरिया है। बावजूद इसके उसको किसी भी सरकारी योजना का लाभ नहीं मिला है। न तो उनका राशन कार्ड बना है। न ही उन्हें कॉलोनी या शौचालय मिला है। दूधनाथ के दो बच्चे हैं एक बेटा (6 साल) और बेटी (11 साल)। दोनों बच्चे कुपोषित हैं और सरकारी स्कूल में पढ़ने जाते हैं।

पीड़ित परिवार

इनके अलावा खोदायपुर गांव के धर्मराज पाल के 2 बकरे, अरशद अहमद के 5 बकरे, देवीदीन पाल की 2 बकरियां, धुर्रवा गांव के भुल्लर पाल की 9 भेड़ें, मियापट्टी गांव के अमरनाथ, राजनाथ व रामचंद्र पाल की भी कई भेड़ें दवा पिलाने के बाद मर गईं।

दो लोगों की 80 भेड़ों की मौत

वहीं रहिमापुर में कीड़े की दवा पिलाने के बाद 10 और 11 मार्च को पशुपालक बद्री प्रसाद और आनंदी पाल की करीब 80 भेड़ों की मौत हो गई। जबकि 200 भेड़ें गंभीर रूप से बीमार हुईं। हालांकि मामला जिलाधिकारी के संज्ञान में आया तो 24 घंटे बाद पशु चिकित्सा विभाग ने मौके पर पहुंचकर बीमार भेड़ों का इलाज शुरू किया, जिससे कई बीमार भेड़ों की जान बची।

आनंदी पाल व बद्री प्रसाद कहते हैं कि सूचना के 24 घंटे बाद पशु चिकित्सा विभाग की टीम उनके घर आयी। अगर डॉक्टरों का दल समय रहते आ जाता तो इतनी भेड़ों की मौत न होती। बाद में पशुधन विभाग के अपर निदेशक-2 राजेंद्र प्रसाद राय भी भी मौके पर हालात का जायजा लेने पहुंचे।

प्रशासन ने सारा दोष पीड़ितों पर मढ़ा

कीड़े की दवा पिलाने से भेड़ों की मौत मामले की जांच करने के लिए एक टीम 11 मार्च को राम सूरत पाल समेत तमाम पीड़ितों के यहां पहुंची। उप मुख्य चिकित्साधिकारी के नेतृत्व में पहुंची इस टीम ने सारा दोष पीड़ितों पर मढ़ते हुए कहा कि पशु पालकों द्वारा अधिक मात्रा में दवा की डोज देने से ही भेड़ों-बकरियों की मौत हुई है। प्रभारी पशु चिकित्साधिकारी डॉ अनिल कुमार का कहना है कि सभी जानवरों की मौत दवा के ओवरडोज से हुई है। 

वहीं पीड़ित राम सूरत पाल का कहना है कि वो लोग हर महीने अपनी भेड़ों को दवा पिलाते आ रहे हैं और वो इतने नासमझ नहीं हैं कि जानवरों को अधिक दवा पिला देंगे। जब कैम्प में कहा गया कि 5 एमएल पिलाना है तो उन लोगों ने 5 एमएल ही दवा पिलाया।

बता दें कि 6 मार्च को सहसों ब्लॉक के चिरौड़ा बाग में सरकार की ओर से जिला स्तरीय पशु नियंत्रण मेला लगाकर पशु पालकों को कीड़े की दवा मुफ्त वितरित की गयी थी। जिसे पिलाने के बाद कई पशु पालकों की भेड़ों और बकरियों की मौत हो गई।

बाद में एक जांच दल पीड़ित पशुपालकों के घर जांच करने पहुंचा। इस जांच दल में उप मुख्य पशु चिकित्साधिकारी सदर, पशु चिकित्साधिकारी झूंसी, पशु चिकित्साधिकारी जीरो रोड, पशु चिकित्साधिकारी थरवईं, पशु चिकित्साधिकारी बहादुरपुर और पशुधन विभाग के चिकित्साधिकारी शामिल थे।

इलाज के बाद बचे भेड़ के बच्चे

बता दें कि भारतीय समाज की जातिवादी व्यवस्था में भेड़ पालन सिर्फ़ पाल जाति के लोग करते हैं। ये जाति आर्थिक और समाजिक रूप से बेहद पिछड़ी हुई है। इसकी एक उपजाति धनगर को अनुसूचित जाति का दर्ज़ा मिला हुआ है। पाल समाज के लोग भी लम्बे समय से अनुसूचित जाति का दर्जा दिये जाने की मांग करते आ रहे हैं।

ग्राम समाज में पशुपालन को कृषि का अनुपूरक माना जाता है। लेकिन चूंकि गरड़िया समाज के पास जमीन नाममात्र की होती है, भेड़-बकरियां ही उनके जीवन-यापन का प्रमुख साधन हैं। ऐसे में सरकार को चाहिए कि वो पाल समाज के मवेशियों को बीमा सुरक्षा प्रदान करे ताकि उन्हें इस तरह की होने वाली बड़ी आर्थिक क्षति से बचाया जा सके।

साथ ही इस मामले में जिन पशुपालकों की बड़ी संख्या में भेड़ों की मौत हुई है उन्हें सरकार की ओर से मुआवज़ा दिया जाए ताकि पीड़ित पशुपालक आर्थिक क्षति से उबर सकें।

(प्रयागराज से सुशील मानव की ग्राउंड रिपोर्ट)

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